वोटर लिस्ट में ‘SIR’ सुधार अभियान को सुप्रीम कोर्ट की हरी झंडी, लेकिन कहा- नागरिकता तय करने का अधिकार सिर्फ केंद्र सरकार के पास

सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसले में चुनाव आयोग (ECI) द्वारा मतदाता सूची को दुरुस्त करने के लिए चलाए गए विवादित ‘विशेष गहन समीक्षा’ (SIR) अभियान को कानूनी रूप से सही ठहराया है। हालांकि, इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने चुनाव आयोग की शक्तियों की एक सख्त संवैधानिक सीमा भी खींच दी है। कोर्ट ने साफ तौर पर कहा है कि चुनाव आयोग के पास किसी भी व्यक्ति की भारतीय नागरिकता पर अंतिम मुहर लगाने का कोई अधिकार नहीं है।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की खंडपीठ ने आदेश दिया कि ‘संदिग्ध नागरिकता’ के आधार पर जिन भी लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए हैं, उनकी सूची चार सप्ताह के भीतर केंद्रीय गृह मंत्रालय को भेजी जाए, ताकि वहां उनकी नागरिकता की स्वतंत्र और विस्तृत जांच की जा सके।

‘SIR’ अभियान पूरी तरह कानूनी और न्यायसंगत: सुप्रीम कोर्ट

शीर्ष अदालत ने इस साल 29 जनवरी को लंबी सुनवाई के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। बुधवार को फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने उन सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया, जिनमें चुनाव आयोग के इस विशेष अभियान (SIR) की वैधानिकता को चुनौती दी गई थी।

याचिकाकर्ताओं की दलील थी कि यह अभियान संविधान के अनुच्छेद 326, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम (RPA) 1950 और इसके नियमों के तहत चुनाव आयोग को मिली शक्तियों का उल्लंघन करता है। वहीं, चुनाव आयोग ने बचाव में तर्क दिया कि फर्जी और दोहरे वोटों को हटाने तथा मतदाता सूची की शुद्धता बनाए रखने के लिए यह सख्त कदम उठाना अनिवार्य था।

सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के रुख का समर्थन करते हुए अपने फैसले में कहा:

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“एसआईआर (SIR) अभियान आनुपातिकता के सिद्धांत के अनुकूल है और यह किसी भी तरह से अत्यधिक या मनमाना नहीं है। इसका मुख्य उद्देश्य मतदाता सूची की शुद्धता को बहाल करना था। इसलिए चुनाव आयोग द्वारा अपनाए गए इन उपायों को अनुचित नहीं ठहराया जा सकता।”

अदालत ने स्पष्ट किया कि बिहार में इस अभियान की शुरुआत करके चुनाव आयोग ने किसी भी कानून का उल्लंघन नहीं किया है। कोर्ट के अनुसार, केवल इस आधार पर इस विशेष अभियान को अवैध या ‘अल्ट्रा वायर्स’ (अधिकार क्षेत्र से बाहर) नहीं माना जा सकता कि यह सामान्य समीक्षा प्रक्रियाओं से अलग है। स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए ऐसी कड़ियां जोड़ना पूरी तरह कानूनी रूप से वैध है।

नागरिकता के मुद्दे पर कोर्ट ने खींची लक्ष्मण रेखा

भले ही सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को अपनी मतदाता सूचियों को साफ-सुथरा बनाने की प्रशासनिक छूट दे दी हो, लेकिन नागरिकता जैसे संवेदनशील मुद्दे पर आयोग के अधिकारों को सीमित कर दिया है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने की प्रक्रिया के दौरान चुनाव आयोग द्वारा नागरिकता को लेकर लिया गया कोई भी निर्णय केवल तात्कालिक (temporary) माना जाएगा। इस पर अंतिम फैसला लेने का अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में रेखांकित किया:

“मतदाता सूची में शामिल करने के लिए चुनाव आयोग द्वारा नागरिकता का किया गया निर्धारण अंतिम नहीं है। वोटर लिस्ट से हटाए गए संदिग्ध नागरिक को अपनी बात रखने का पूरा और उचित अवसर देने के बाद, केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा इस मामले की गहनता से जांच की जानी चाहिए।”

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नागरिकों को बिना ठोस आधार के मताधिकार से वंचित होने से बचाने के लिए, सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि वह चार सप्ताह की तय समयसीमा के भीतर ऐसे सभी हटाए गए संदिग्ध नागरिकों का पूरा विवरण केंद्रीय गृह मंत्रालय को सौंपे। इसके बाद, गृह मंत्रालय एक विस्तृत और निष्पक्ष जांच प्रक्रिया के तहत उनकी नागरिकता का निर्धारण करेगा।

क्या था पूरा विवाद और क्यों खड़े हुए थे सवाल?

इस कानूनी लड़ाई की शुरुआत पिछले साल जून में हुई थी, जब चुनाव आयोग ने बिहार से इस ‘विशेष गहन समीक्षा’ (SIR) अभियान की शुरुआत की थी। बाद में इस प्रक्रिया का दायरा पश्चिम बंगाल, केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों तक फैलाया गया। इससे पहले पंजाब में किए गए एक पायलट प्रोजेक्ट में लगभग 20% मतदाताओं के डेटा में विसंगतियां पाई गई थीं, जिसके बाद आयोग ने यह बड़ा कदम उठाया था।

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इस पूरे विवाद के केंद्र में चुनाव आयोग की एक बेहद कड़ी शर्त थी। आयोग ने निर्देश दिया था कि जिन मतदाताओं के नाम साल 2002 (या कुछ राज्यों में 2003) की वोटर लिस्ट में नहीं दर्ज थे, उन्हें उन पुरानी सूचियों में शामिल किसी व्यक्ति के साथ अपने पैतृक या पारिवारिक संबंध (Ancestral Linkage) साबित करने वाले दस्तावेज पेश करने होंगे।

याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाते हुए कहा था कि इस कठोर नियम से देश के लाखों असली नागरिक भी वोट देने के अधिकार से वंचित हो जाएंगे। विशेष रूप से गरीब, मजदूर और प्रवासी समुदायों के पास ऐसे पुख्ता दस्तावेज मिलना नामुमकिन के बराबर है जिससे वे 20 साल पुराने पारिवारिक संबंधों को साबित कर सकें।

मामले की गंभीरता को देखते हुए सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बीच में हस्तक्षेप किया था। आयोग ने शुरुआत में सत्यापन के लिए केवल 11 चुनिंदा दस्तावेजों को ही मंजूरी दी थी, लेकिन शीर्ष अदालत ने आम लोगों की सहूलियत के लिए निर्देश जारी किया कि इस प्रक्रिया में ‘आधार कार्ड’ को भी एक वैध अतिरिक्त दस्तावेज के रूप में स्वीकार किया जाए।

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