सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881 (एनआई एक्ट) की धारा 141 के तहत किसी व्यक्ति पर केवल इसलिए आपराधिक दायित्व (प्रतिनिहित दायित्व) नहीं डाला जा सकता क्योंकि वह किसी सोसाइटी में किसी आधिकारिक पद या ओहदे पर है। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की खंडपीठ ने मद्रास हाईकोर्ट के एक आदेश को आंशिक रूप से खारिज करते हुए यह निर्णय सुनाया। कोर्ट ने उन तीन पदाधिकारियों के खिलाफ चेक बाउंस के मामले को बहाल कर दिया जिनके हस्ताक्षर मूल वित्तीय दस्तावेजों पर थे, जबकि उस कार्यकारिणी सदस्य (एग्जीक्यूटिव मेंबर) के खिलाफ कार्यवाही रद्द रखने के फैसले को बरकरार रखा जिसकी लेनदेन में कोई विशिष्ट भूमिका नहीं थी।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद चेन्नई की एक फाइनेंस कंपनी, एम/एस मानसी फाइनेंस (चेन्नई) लिमिटेड द्वारा अपने मैनेजर और पावर ऑफ अटॉर्नी धारक ए. रमेश के माध्यम से दायर एक निजी शिकायत से शुरू हुआ। यह शिकायत कोर्ट ऑफ IV एफटीसी मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट, जॉर्ज टाउन, चेन्नई में एस.टी.सी. नंबर 1980/2023 के रूप में दर्ज की गई थी।
इस शिकायत में मुख्य आरोपी ‘एम/एस रवींद्र भारती एजुकेशनल सोसाइटी’ है, जो सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1860 के तहत पंजीकृत है। दूसरे आरोपी एम. सुब्रमण्यम सोसाइटी के अध्यक्ष हैं और उन्होंने ही विवादित चेक पर हस्ताक्षर किए थे। इसके अलावा, सोसाइटी के अन्य पदाधिकारियों को उनकी पदवी के आधार पर आरोपी बनाया गया था: एम. ललिता (उपाध्यक्ष – प्रतिवादी नंबर 1), एम. रेखा (कोषाध्यक्ष – प्रतिवादी नंबर 2), आर. बाबू राव (कार्यकारिणी सदस्य – प्रतिवादी नंबर 3), और आर. मुरुगन (मैनेजर – प्रतिवादी नंबर 4)।
शिकायत के अनुसार, 2 जुलाई 2018 से 27 जुलाई 2018 के बीच इन आरोपियों ने सोसाइटी की तरफ से एक शैक्षणिक संस्थान के विकास के लिए मानसी फाइनेंस से कई किस्तों में कुल 4,50,00,000/- रुपये का कर्ज लिया। इस कर्ज के एवज में प्रॉमिसरी नोट्स लिखे गए, जिन पर अध्यक्ष के साथ-साथ उपाध्यक्ष (प्रतिवादी 1) और मैनेजर (प्रतिवादी 4) के भी हस्ताक्षर थे। इसके बाद, 31 जुलाई 2018 को दोनों पक्षों के बीच एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) हुआ, जिस पर अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के हस्ताक्षर थे। इस कर्ज पर 30% वार्षिक ब्याज तय किया गया था।
बकाया राशि और ब्याज के भुगतान के लिए अध्यक्ष एम. सुब्रमण्यम के हस्ताक्षर वाला एक चेक (नंबर 003109, राशि 5,12,61,500/- रुपये) जारी किया गया। जब मानसी फाइनेंस ने इस चेक को आईडीबीआई बैंक, चेन्नई में जमा किया, तो 19 नवंबर 2019 को यह “अकाउंट ब्लॉक” (खाता बंद/अवरुद्ध) होने के कारण वापस आ गया। कानूनी नोटिस भेजने के बाद भी जब आरोपियों ने भुगतान नहीं किया, तो शिकायत दर्ज कराई गई।
आरोपियों ने मद्रास हाईकोर्ट में धारा 482 सीआरपीसी के तहत याचिका दायर की थी। 28 जून 2024 को हाईकोर्ट ने चारों प्रतिवादियों के खिलाफ मामला इस आधार पर रद्द कर दिया कि शिकायत में उनके खिलाफ विशिष्ट आरोप नहीं थे। इसके खिलाफ मानसी फाइनेंस ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता (मानसी फाइनेंस) के वरिष्ठ वकील ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट ने मामला रद्द करने में गलती की। शिकायत में स्पष्ट तौर पर कहा गया था कि प्रतिवादी सोसाइटी के दैनिक कामकाज और वित्तीय प्रबंधन के प्रभारी थे। प्रतिवादी 1 से 3 प्रबंध समिति के सदस्य थे, जो बैंक खातों के संचालन और फंड की निकासी से जुड़े थे। प्रॉमिसरी नोट्स और एमओयू पर उनके हस्ताक्षर उनकी सक्रिय भागीदारी को साबित करते हैं, और उनके वास्तविक रोल का निर्धारण ट्रायल के दौरान ही हो सकता है।
दूसरी ओर, प्रतिवादियों के वकील ने कहा कि शिकायत में कोई भी विशिष्ट आरोप नहीं लगाया गया था कि वे दैनिक कामकाज के लिए किस तरह जिम्मेदार थे। उनके अनुसार, शिकायत में केवल “सामान्य और घिसे-पिटे आरोप” लगाए गए थे और धारा 141 की शर्तों का पालन नहीं किया गया था। उनका मुख्य तर्क था कि केवल पद पर होना आपराधिक दायित्व के लिए पर्याप्त नहीं है।
कोर्ट का कानूनी विश्लेषण और पूर्ववर्ती निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने एनआई एक्ट की धारा 141 के दंडात्मक प्रावधानों का विश्लेषण करते हुए कहा कि यह धारा एक ऐसा दंडात्मक नियम है जिसका कड़ाई से अर्थ निकाला जाना चाहिए। इस सिद्धांत को स्पष्ट करने के लिए कोर्ट ने निम्नलिखित पूर्ववर्ती मामलों का संदर्भ लिया:
- एस.एम.एस. फार्मास्यूटिकल्स लिमिटेड बनाम नीता भल्ला (2005) 8 एससीसी 89: कोर्ट ने इस तीन-न्यायाधीशों की पीठ के निर्णय का हवाला देते हुए उद्धृत किया:
“संक्षेप में, लगभग सर्वसम्मत न्यायिक राय है कि किसी व्यक्ति को आपराधिक प्रक्रिया के अधीन करने से पहले शिकायत में आवश्यक आरोप होने चाहिए… केवल किसी कंपनी का निदेशक होना ही उस व्यक्ति को अधिनियम की धारा 141 के तहत उत्तरदायी बनाने के लिए पर्याप्त नहीं है।”
- नेशनल स्मॉल इंडस्ट्रीज कॉरपोरेशन लिमिटेड बनाम हरमीत सिंह पेंटल (2010) 3 एससीसी 330: कोर्ट ने इस निर्णय को उद्धृत करते हुए स्पष्ट किया:
“धारा 141 एक दंडात्मक प्रावधान है जो प्रतिनिहित दायित्व बनाता है, और स्थापित कानून के अनुसार, इसका कड़ाई से अर्थ निकाला जाना चाहिए। इसलिए, किसी शिकायत में केवल एक सामान्य या सतही बयान देना कि (आरोपी के रूप में नामित) निदेशक कंपनी के व्यवसाय के संचालन के लिए कंपनी का प्रभारी और जिम्मेदार है, पर्याप्त नहीं है, जब तक कि निदेशक की भूमिका के बारे में अधिक स्पष्टता न हो।”
- एचडीएफसी बैंक लिमिटेड बनाम महाराष्ट्र राज्य (2025) 9 एससीसी 653: कोर्ट ने कहा कि यदि शिकायत को समग्र रूप से पढ़ने पर आवश्यक तथ्य सामने आते हैं, तो उसमें यांत्रिक रूप से धारा 141 की कानूनी शब्दावली को दोहराना जरूरी नहीं है।
- अशोक शेवकरामनी बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (2023) 8 एससीसी 473 और एस.पी. मणि एंड मोहन डेयरी बनाम डॉ. स्नेहलता इलांगोवन (2023) 10 एससीसी 685 के सिद्धांतों को दोहराते हुए कोर्ट ने कहा कि शिकायत को व्यावहारिक दृष्टिकोण से पढ़ा जाना चाहिए।
प्रतिवादियों की भूमिका में कानूनी अंतर
इन सिद्धांतों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिवादियों के बीच एक स्पष्ट कानूनी अंतर रेखांकित किया।
प्रतिवादी नंबर 1 (एम. ललिता), 2 (एम. रेखा) और 4 (आर. मुरुगन) के संबंध में कोर्ट ने पाया कि उनका दायित्व केवल “पद” के कारण नहीं, बल्कि लेनदेन में उनकी सीधे तौर पर प्रमाणित सक्रिय भागीदारी के कारण बनता है। कोर्ट ने कहा:
“वर्तमान मामला, जहाँ तक प्रतिवादी नंबर 1 (एम. ललिता – उपाध्यक्ष), 2 (एम. रेखा – कोषाध्यक्ष) और 4 (आर. मुरुगन – मैनेजर) का संबंध है, एक मौलिक रूप से भिन्न धरातल पर खड़ा है। शिकायत में पूर्ववर्ती ऋण लेने, प्रॉमिसरी नोट निष्पादित करने और दायित्व को स्वीकार करने तथा पुनर्भुगतान की शर्तों को निर्धारित करने वाले एमओयू का उल्लेख है। ये पूर्ववर्ती लेनदेन उस कानूनी रूप से लागू करने योग्य ऋण का आधार (substratum) हैं जिसके खिलाफ विवादित चेक जारी किया गया था।”
दस्तावेजों का विश्लेषण करते हुए कोर्ट ने पाया:
“एमओयू पर प्रतिवादी नंबर 1 के हस्ताक्षर हैं। विवादित चेक पर स्वयं प्रतिवादी नंबर 2 के हस्ताक्षर हैं। प्रॉमिसरी नोट और संबंधित भुगतान दस्तावेज प्रतिवादी नंबर 1, 2 और 4 की भागीदारी को दर्शाते हैं। ये केवल पद के मामले नहीं हैं, बल्कि उनके अंतर्निहित लेनदेन से जुड़े होने का प्रथम दृष्टया आधार प्रदान करते हैं।”
इसके विपरीत, प्रतिवादी नंबर 3 (आर. बाबू राव – कार्यकारिणी सदस्य) के मामले में कोर्ट ने कहा:
“शिकायत में इस सामान्य दावे के अलावा कि वह सोसाइटी के पदाधिकारी थे और इसके मामलों के लिए जिम्मेदार थे, विवादित लेनदेन में उन्हें कोई विशिष्ट भूमिका नहीं सौंपी गई है। विशेष रूप से, किसी भी प्रॉमिसरी नोट, चेक, एमओयू या संबंधित वित्तीय दस्तावेज पर उनके हस्ताक्षर नहीं हैं और न ही यह उनकी किसी भागीदारी को दर्शाता है।”
अपीलकर्ता के इस तर्क को खारिज करते हुए कि कार्यकारिणी सदस्य होने के नाते उन्हें जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए, खंडपीठ ने कहा:
“एनआई एक्ट की धारा 141 से संबंधित कानून स्पष्ट है कि किसी कंपनी या सोसाइटी में केवल कोई पद या औहदा संभालने के कारण कोई स्वतः मान लिया गया दायित्व (deemed liability) नहीं बनता है… इसलिए, केवल उनका पद एनआई एक्ट की धारा 141 के तहत दायित्व तय करने के लिए पर्याप्त नहीं होगा।”
अंत में, धारा 482 सीआरपीसी के तहत हाईकोर्ट की शक्तियों पर कोर्ट ने स्पष्ट किया:
“कार्यवाही को रद्द करने के चरण में, न्यायालय आरोपों की सत्यता पर फैसला नहीं करता है और न ही साक्ष्यों के मूल्यांकन में जाता है। क्या प्रतिवादी संख्या 1, 2 और 4 वास्तव में सोसाइटी के मामलों के संचालन के प्रभारी और जिम्मेदार थे, यह अंततः मुकदमे (trial) के दौरान स्थापित किया जाने वाला साक्ष्य का विषय है…”
निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए मद्रास हाईकोर्ट के 28 जून 2024 के उस फैसले को रद्द कर दिया जिसके तहत प्रतिवादी नंबर 1 (एम. ललिता), 2 (एम. रेखा), और 4 (आर. मुरुगन) के खिलाफ कार्यवाही समाप्त की गई थी। हालांकि, कोर्ट ने प्रतिवादी नंबर 3 (आर. बाबू राव) के खिलाफ कार्यवाही रद्द रखने के फैसले को पूरी तरह सही ठहराया।
इसके परिणामस्वरूप, चेन्नई की निचली अदालत (IV एफटीसी मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट) के समक्ष लंबित शिकायत (एस.टी.सी. नंबर 1980 / 2023) को प्रतिवादी नंबर 1, 2 और 4 के खिलाफ बहाल कर दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मामले के गुण-दोष पर कोई अंतिम टिप्पणी नहीं की गई है और सभी कानूनी विकल्प ट्रायल कोर्ट के समक्ष खुले रहेंगे।
केस विवरण
- केस का शीर्षक: एम/एस मानसी फाइनेंस (चेन्नई) लिमिटेड बनाम एम. ललिता एवं अन्य
- केस नंबर: आपराधिक अपील नंबर 2849 / 2026 (एस.एल.पी. (क्रिमिनल) नंबर 13907 / 2024 से उत्पन्न)
- पीठ: जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा, जस्टिस एन.वी. अंजारिया
- दिनांक: 26 मई, 2026

