मोटर दुर्घटना दावों में ‘संदेह से परे सबूत’ की जरूरत नहीं, ‘संभाव्यता की प्रबलता’ ही काफी: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट किया है कि मोटर दुर्घटना मुआवजा दावों (Motor Accident Claims) को आपराधिक मामलों की तरह ‘संदेह से परे सबूत’ (Proof beyond reasonable doubt) के पैमाने पर नहीं, बल्कि ‘संभाव्यता की प्रबलता’ (Preponderance of probability) के आधार पर तय किया जाना चाहिए।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि मोटर वाहन अधिनियम, 1988 एक कल्याणकारी कानून है। ऐसे में केवल मामूली दस्तावेजों की विसंगतियों और तकनीकी कमियों को आधार बनाकर पीड़ितों को उनके कानूनी अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपने असाधारण अधिकारों का उपयोग करते हुए, 2004 में सड़क हादसे में पूरी तरह से अपाहिज हुए एक ईंट-भट्टा मजदूर के परिजनों को 14.9 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है।

क्या था पूरा मामला?

घटना 21 मई 2004 की है। करीब शाम 5:00 बजे, राज कुमार दास (मूल याचिकाकर्ता) मोंडलपारा बस स्टॉप के पास एक रिक्शे से उतर रहे थे, तभी एक तेज रफ्तार लॉरी (निबंधन संख्या: WB-41-3999) ने उन्हें टक्कर मार दी। इस हादसे में उन्हें बेहद गंभीर चोटें आईं और वे बेहोश हो गए। इलाज के बाद डॉक्टरों ने उन्हें ‘ट्रॉमेटिक पैराप्लेजिया’ (दोनों पैरों का लकवा) से पीड़ित घोषित कर दिया, जिससे वे हमेशा के लिए 100% दिव्यांग हो गए। हादसे से पहले राज कुमार एक ईंट-भट्ठे में मजदूर के रूप में काम करते थे।

9 फरवरी 2005 को उन्होंने मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (MACT) के समक्ष अधिनियम की धारा 163A के तहत 3,50,000 रुपये के मुआवजे का दावा किया।

  • सितंबर 2007: न्यायाधिकरण (Tribunal) ने याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि याचिकाकर्ता यह साबित नहीं कर पाया कि चोटें इसी दुर्घटना के कारण लगी थीं।
  • सितंबर 2022: कलकत्ता हाई कोर्ट ने भी न्यायाधिकरण के फैसले को बरकरार रखा और कहा कि मामले के रिकॉर्ड में विरोधाभास बहुत बड़े हैं।
  • लंबी कानूनी लड़ाई: इस 22 साल लंबी कानूनी लड़ाई के दौरान मूल याचिकाकर्ता राज कुमार दास का निधन हो गया, जिसके बाद उनके कानूनी वारिसों (पत्नी और बच्चों) ने इस मामले को आगे बढ़ाया।
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तथ्यों के विरोधाभास पर सुप्रीम कोर्ट का रुख

निचली अदालतों ने जिन ‘कमियों’ को आधार बनाकर दावा खारिज किया था, सुप्रीम कोर्ट ने विधिक सिद्धांतों के आधार पर उन्हें पूरी तरह से खारिज कर दिया:

1. एमआरआई (MRI) रिपोर्ट में “लॉरी से गिरना” दर्ज होना

अदालतों ने इस बात पर जोर दिया था कि अस्पताल के रिकॉर्ड में ‘लॉरी से गिरना’ लिखा था। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर टिप्पणी की:

“आमतौर पर आपातकालीन इलाज के समय मेडिकल इतिहास मरीज के साथ आए तीमारदारों द्वारा दी गई जानकारी पर आधारित होता है। इसका एकमात्र उद्देश्य त्वरित इलाज शुरू करना होता है, न कि दुर्घटना की सटीक जांच करना। एफआईआर, चार्जशीट और पीड़ित के खुद के बयान स्पष्ट करते हैं कि उसे रिक्शे से उतरने के बाद लॉरी ने टक्कर मारी थी। केवल मेडिकल पर्चे पर लिखे एक शब्द से पूरे पुलिस रिकॉर्ड को खारिज नहीं किया जा सकता।”

2. एफआईआर दर्ज कराने में देरी

हादसा 21 मई 2004 को हुआ, जबकि एफआईआर 8 अगस्त 2004 को दर्ज की गई। कोर्ट ने रवि बनाम बद्रीनारायण (2011) मामले का हवाला देते हुए कहा कि गंभीर रूप से घायल व्यक्ति के लिए कानूनी औपचारिकताओं से पहले अपनी जान बचाना और अस्पताल में इलाज कराना पहली प्राथमिकता होती है। चूंकि पीड़ित महीनों अस्पताल में भर्ती था, इसलिए एफआईआर में देरी के कारण दावे पर संदेह नहीं किया जा सकता।

3. गाड़ी के नंबर में मामूली अंतर

पीड़ित ने अपने बयान में लॉरी का नंबर WB-41-2999 बताया था, जबकि पुलिस चार्जशीट और क्लेम याचिका में यह नंबर WB-41-3999 था। कोर्ट ने कहा कि इतनी गंभीर शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना झेलने वाले व्यक्ति से सालों बाद गवाही के दौरान सटीक नंबर याद रखने की उम्मीद करना व्यावहारिक नहीं है, खासकर तब जब पुलिस चार्जशीट में गाड़ी का नंबर स्पष्ट रूप से दर्ज हो।

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4. चश्मदीद गवाहों की कमी

इस मुद्दे पर कोर्ट ने सुनीता एवं अन्य बनाम राजस्थान राज्य सड़क परिवहन निगम (2020) का हवाला देते हुए कहा कि दुर्घटना दावों की जांच करते समय कोर्ट को यह नहीं देखना चाहिए कि ‘सबसे अच्छा गवाह’ क्यों नहीं पेश किया गया, बल्कि यह देखना चाहिए कि उपलब्ध सबूत हादसे को साबित करने के लिए पर्याप्त हैं या नहीं।

संविधान के अनुच्छेद 142 का उपयोग और न्याय

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि धारा 163A के तहत पुराने नियमों के अनुसार गणना करने पर पीड़ित परिवार को बेहद मामूली राशि मिलती, जो उनके साथ अन्याय होता। कोर्ट ने यू.पी. स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन बनाम त्रिलोक चंद्र (1996) और नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम प्रणय सेठी (2017) का हवाला देते हुए पुराने मुआवजे के नियमों की कमियों को स्वीकार किया।

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न्यायालय ने कहा:

“पीड़ित परिवार के हालात और न्याय के सिद्धांतों को देखते हुए, हम संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का उपयोग कर रहे हैं। हम धारा 166 के सिद्धांतों का पालन करते हुए पीड़ित को उचित और वास्तविक मुआवजा प्रदान कर रहे हैं।”

मुनावजे का विवरण

अदालत ने पीड़ित की उम्र (37 वर्ष) और मासिक आय (2,500 रुपये) को आधार मानकर सरला वर्मा (2009) और प्रणय सेठी (2017) मामलों के दिशानिर्देशों के अनुसार निम्नलिखित मुआवजा निर्धारित किया:

मुआवजे का मद (Head)गणना का आधार (Calculation)राशि (रुपये में)
मासिक आय2,500
भविष्य की संभावनाएं (Future Prospects)2,500 का 40%1,000
वार्षिक आय3,500 x 1242,000
गुणक (Multiplier)42,000 x 156,30,000
कमाने की क्षमता का नुकसान6,30,000 का 100%6,30,000
मानसिक आघात, दर्द और पीड़ा2,00,000
सुविधाओं का नुकसान1,00,000
सहायक/अटेंडेंट का खर्च3,60,000
परिवहन और इलाज का खर्च (भविष्य सहित)2,00,000
कुल मुआवजा14,90,000

अंतिम निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने न्यायाधिकरण और कलकत्ता हाई कोर्ट के फैसलों को खारिज करते हुए याचिका को स्वीकार कर लिया। बीमा कंपनी (नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड) को निर्देश दिया गया है कि वह 14,90,000/- (चौदह लाख नब्बे हजार रुपये) की पूरी राशि याचिका दायर होने की तारीख से 6% वार्षिक ब्याज के साथ तीन महीने के भीतर न्यायाधिकरण के पास जमा कराए, जिसे तुरंत पीड़ित के परिजनों को सौंप दिया जाएगा।

मामले का विवरण

  • केस का शीर्षक: राज कुमार दास (मृत) कानूनी वारिसों के माध्यम से बनाम नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड
  • केस संख्या: सिविल अपील संख्या… 2026 (एसएलपी (सी) संख्या 3585/2023 से उत्पन्न)
  • माननीय पीठ: जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता
  • फैसले की तारीख: 25 मई, 2026

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