अंतर-धार्मिक विवाह के बाद पारसी महिला के अधिकार: सुप्रीम कोर्ट 29 मई को करेगा अहम सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट आगामी 29 मई को एक बेहद महत्वपूर्ण संवैधानिक याचिका पर सुनवाई के लिए तैयार हो गया है। इस याचिका में यह मांग की गई है कि गैर-पारसी व्यक्ति से विवाह करने के बाद भी पारसी महिलाओं को उनके पुरुष समकक्षों के समान ही धार्मिक अधिकार और पहचान मिलनी चाहिए।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की तीन सदस्यीय पीठ इस मामले की सुनवाई करेगी। कोर्ट ने संकेत दिया है कि वह याचिकाकर्ता दीना बुधराजा (Dina Budhraja) को तत्काल राहत देने के लिए एक अंतरिम आदेश पारित कर सकता है, जिन्हें साल 2024 में उनकी दादी के अंतिम संस्कार के समय मंदिर में प्रवेश करने से रोक दिया गया था।

विवाद की जड़: नागपुर पारसी पंचायत का ‘नियम 5(2)’ और लैंगिक भेदभाव

यह पूरा कानूनी विवाद ‘नागपुर पारसी पंचायत’ के संविधान के नियम 5(2) के इर्द-गिर्द घूमता है। इस नियम के अनुसार, यदि कोई पारसी महिला किसी गैर-पारसी व्यक्ति से शादी करती है, तो उससे उसकी धार्मिक पहचान छीन ली जाती है। साथ ही, उसे अग्यारी (पारसी अग्नि मंदिर) जैसे पवित्र धार्मिक स्थलों में प्रवेश करने से भी रोक दिया जाता है। हैरान करने वाली बात यह है कि यही प्रतिबंध उन पारसी पुरुषों पर लागू नहीं होता जो समुदाय से बाहर शादी करते हैं।

याचिकाकर्ता दीना बुधराजा ने एक हिंदू पुरुष से शादी की है, लेकिन उन्होंने अपना पारसी धर्म बनाए रखा। साल 2024 में उनकी दादी के निधन के बाद उन्हें नागपुर की अग्यारी में अंतिम संस्कार की प्रार्थनाओं में शामिल होने की अनुमति नहीं दी गई थी।

इस भेदभाव के खिलाफ बुधराजा ने वकील रोहित अनिल राठी के माध्यम से संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। याचिका में नियम 5(2) को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की गई है। याचिका में तर्क दिया गया है कि यह नियम सीधे तौर पर निम्नलिखित मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है:

  • अनुच्छेद 14: कानून के समक्ष समानता का अधिकार
  • अनुच्छेद 21: जीवन और व्यक्तिगत सम्मान का अधिकार
  • अनुच्छेद 25: धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार
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याचिका के जरिए मांग की गई है कि नागपुर पारसी पंचायत को यह आदेश दिया जाए कि वह महिलाओं और पुरुषों को समान दर्जा दे, ताकि शादी के बाद भी पारसी महिला की धार्मिक पहचान सुरक्षित रहे।

कोर्ट में तीखी बहस और अंतरिम राहत की मांग

शुरुआती अदालती कार्यवाही के दौरान, चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने ध्यान दिलाया कि सुप्रीम कोर्ट की एक बड़ी नौ-न्यायाधीशों की पीठ ने हाल ही में सबरीमाला मंदिर सहित विभिन्न धर्मों में महिलाओं के खिलाफ होने वाले भेदभाव से जुड़े बड़े मुद्दों पर अपना फैसला सुरक्षित रखा है। सीजेआई ने सुझाव दिया कि इस मामले की सुनवाई के लिए उस ऐतिहासिक फैसले का इंतजार किया जाना चाहिए।

हालांकि, याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने तुरंत अंतरिम राहत दिए जाने पर जोर दिया। उन्होंने दलील दी कि पारसी महिलाओं के अधिकारों की यह लड़ाई एक बार-बार सामने आने वाली समस्या है और याचिकाकर्ता को तुरंत न्याय की आवश्यकता है।

इस पर चीफ जस्टिस ने सहमति जताते हुए कहा, “पारसी महिला बनाम पारसी पुरुष के अधिकारों से जुड़े इस मामले पर हमारे सामने पहले भी बहस हो चुकी है।” पीठ ने नागपुर पारसी पंचायत के वकील को निर्देश दिया कि वे अगली सुनवाई तक याचिकाकर्ता के लिए “अंतरिम व्यवस्था” के संबंध में उचित निर्देश लेकर कोर्ट में उपस्थित हों।

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दीना बुधराजा ने अंतरिम राहत के तौर पर मांग की है कि मुख्य याचिका पर अंतिम फैसला आने तक उन्हें नियमित रूप से नागपुर अग्यारी में जाकर प्रार्थना करने, अपने प्रियजनों के निधन पर आयोजित सभाओं और समय-समय पर होने वाली ‘मुक्ताद’ (Muktad) प्रार्थनाओं में शामिल होने की अनुमति दी जाए।

देश के धार्मिक कानूनों पर पड़ सकता है बड़ा असर

इससे पहले, इसी साल 23 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने धार्मिक व्यक्तिगत कानूनों (Religious Personal Laws) के भीतर लैंगिक भेदभाव से जुड़े इस गंभीर संवैधानिक मुद्दे की विस्तार से जांच करने का निर्णय लिया था। उस समय देश की शीर्ष अदालत ने याचिका पर प्रतिक्रिया मांगते हुए कई प्रमुख पक्षों को नोटिस जारी किए थे, जिनमें शामिल हैं:

  • केंद्र सरकार
  • केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय
  • महाराष्ट्र राज्य सरकार
  • चैरिटी कमिश्नर
  • नागपुर पारसी पंचायत
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आगामी 29 मई को होने वाली सुनवाई इस बात पर केंद्रित होगी कि क्या याचिकाकर्ता को अस्थायी रूप से धार्मिक अधिकारों के इस्तेमाल की छूट दी जा सकती है। यह फैसला भविष्य में अंतर-धार्मिक विवाह करने वाली देश की सभी पारसी महिलाओं के अधिकारों के लिए एक बड़ा नजीर साबित हो सकता है।

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