अरावली पर्वतमाला: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, परिभाषा तय करने वाले पैनल में जनता और विशेषज्ञों की सलाह होगी जरूरी

दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखला ‘अरावली’ को बचाने की दिशा में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक बेहद महत्वपूर्ण निर्देश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि अरावली पहाड़ियों और पर्वत श्रृंखलाओं की अंतिम परिभाषा तय करने के लिए जो विशेषज्ञ समिति बनाई जा रही है, वह मनमाने ढंग से काम नहीं करेगी। इस पैनल को पर्यावरण विशेषज्ञों, संबंधित पक्षों और आम जनता के साथ अनिवार्य रूप से विचार-विमर्श करना होगा ताकि हर वर्ग की आवाज सुनी जा सके।

प्रशासनिक और व्यावहारिक देरी से बचने के लिए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पांचोली की तीन सदस्यीय पीठ ने समिति के आकार को भी सीमित रखने का फैसला सुनाया।

सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा, “हम इस समिति में $30$ लोगों को शामिल नहीं कर सकते, क्योंकि इतने बड़े समूह के साथ काम करना बेहद मुश्किल और अव्यवस्थित (unmanageable) हो जाएगा। समिति में केवल $5$ से $7$ सदस्य होने चाहिए, जो ऑर्डर के अनुसार बाहरी विशेषज्ञों और जनता से राय लेंगे।”

जनहित और प्रशासनिक सूझबूझ में संतुलन

सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश पर्यावरण संरक्षण की प्रक्रिया में जनभागीदारी सुनिश्चित करने की कोशिश है। सुनवाई की शुरुआत में केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी ने पीठ को बताया कि ‘केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति’ (CEC) और एमिकस क्यूरी (न्यायालय मित्र) ने इस पैनल के संभावित सदस्यों के कुछ साझा नाम तय कर लिए हैं, जिन्हें जल्द ही अंतिम रूप दिया जा सकता है।

वहीं, मामले के न्याय मित्र और वरिष्ठ अधिवक्ता के. परमेश्वर ने पुरजोर ढंग से पैरवी की कि समिति को जमीनी हितधारकों (stakeholders) के विचारों को प्राथमिकता देनी चाहिए, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि इस ऐतिहासिक धरोहर के भविष्य को लेकर जनता की राय अनदेखी न हो।

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परिभाषा का गणित और पर्यावरण पर मंडराता खतरा

अरावली रेंज का दायरा दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात तक फैला हुआ है। इस विशाल श्रृंखला को कानूनी सुरक्षा देने के लिए इसकी एक सटीक परिभाषा का होना बेहद जरूरी है।

इससे पहले, $20$ नवंबर $2025$ को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) की एक समिति द्वारा सुझाए गए फॉर्मूले को स्वीकार किया था। उस प्रस्तावित परिभाषा के मुख्य बिंदु इस प्रकार थे:

  • अरावली पहाड़ी: चिन्हित अरावली जिलों में स्थित कोई भी ऐसा भूभाग, जिसकी ऊंचाई उसके स्थानीय धरातल से $100$ मीटर या उससे अधिक हो।
  • अरावली रेंज: ऐसे दो या दो से अधिक पहाड़ों का समूह, जो एक-दूसरे से महज $500$ मीटर के दायरे में स्थित हों।
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इस फॉर्मूले को स्वीकार करते हुए अदालत ने विशेषज्ञों की अंतिम रिपोर्ट आने तक इन क्षेत्रों में नए खनन पट्टे जारी करने पर पूरी तरह से रोक लगा दी थी।

क्यों पीछे हटना पड़ा सुप्रीम कोर्ट को?

मंत्रालय की यह परिभाषा सामने आते ही पर्यावरणविदों और जनता में भारी आक्रोश फैल गया। इस फॉर्मूले में कई गंभीर खामियां थीं। लोगों को आशंका थी कि $100$ मीटर की न्यूनतम ऊंचाई और पहाड़ियों के बीच $500$ मीटर की अधिकतम दूरी जैसी सख्त और तकनीकी शर्तों के कारण अरावली का एक बहुत बड़ा और बेहद संवेदनशील हिस्सा पर्यावरण संरक्षण के कानूनी दायरे से बाहर हो जाएगा।

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जनता की इस भारी चिंता और “महत्वपूर्ण अस्पष्टताओं” को स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल $29$ दिसंबर को एक कड़ा रुख अपनाया। कोर्ट ने अपने $20$ नवंबर के निर्देशों को फिलहाल स्थगित (abeyance) कर दिया। इसके साथ ही, अरावली के पर्यावरण को किसी भी तत्काल नुकसान से बचाने के लिए पूरी पर्वतमाला में चल रही सभी तरह की सक्रिय खनन गतिविधियों (mining operations) पर पूरी तरह से रोक लगा दी।

अब, $5$ से $7$ सदस्यों वाले इस नए छोटे पैनल के गठन के बाद, सुप्रीम कोर्ट एक ऐसी सर्वमान्य परिभाषा तैयार करना चाहता है जो वैज्ञानिक रूप से सटीक हो और जिसे जनसमर्थन भी प्राप्त हो।

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