मौत के समय में अनिश्चितता ‘लास्ट सीन टुगेदर’ की कड़ी को तोड़ती है; सुप्रीम कोर्ट ने हत्या के मामले में दो आरोपियों को बरी किया

सुप्रीम कोर्ट ने साल 2012 के एक हत्या के मामले में दो आरोपियों की दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा को रद्द करते हुए उन्हें बरी कर दिया है। अदालत ने फैसला सुनाया कि अभियोजन पक्ष परिस्थितियों के आधार पर अपराध की पूरी कड़ी को साबित करने में विफल रहा।

जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ ने कहा कि ‘लास्ट सीन टुगेदर’ (आखिरी बार साथ देखे जाने) का सिद्धांत तब लागू नहीं किया जा सकता, जब मृतक को आखिरी बार आरोपियों के साथ देखे जाने और उसकी अनुमानित मृत्यु के समय के बीच एक लंबा और अनिश्चित समय अंतराल हो। इसके साथ ही, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी आरोपी द्वारा खुद को बचाते हुए सह-आरोपियों पर दोष मढ़ने वाले बयान को एक विश्वसनीय अतिरिक्त-न्यायिक स्वीकारोक्ति (extra-judicial confession) नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 के तहत पुलिस द्वारा की गई हथियारों की बरामदगी को भी कानूनन अमान्य करार दिया।

इस मामले में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने बरी किए गए दो आरोपियों की अपील पर फैसला सुनाने के साथ-साथ जेल में बंद तीसरे आरोपी (जिसने कोई अपील दायर नहीं की थी) की मदद के लिए राष्ट्रीय कानूनी सेवा प्राधिकरण (NALSA) को उसे कानूनी सहायता प्रदान करने का निर्देश दिया है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 30 अक्टूबर 2012 को पश्चिम बंगाल में हुई एक घटना से संबंधित है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, शिकायतकर्ता (PW1) का बेटा शाम करीब 4:00 बजे अपने पिता की मोटरसाइकिल पर तीन साथियों—पापन सरकार उर्फ प्रणब (आरोपी 1), आरोपी 2 और आरोपी 3 के साथ निकला था, जो खुद एक अन्य मोटरसाइकिल पर आए थे।

जब पीड़ित रात 8:00 बजे तक घर नहीं लौटा, तो उसके पिता ने अन्य लोगों (PW3 और PW8) के साथ उसकी तलाश शुरू की। अगली सुबह, एक खेत के गड्ढे से पीड़ित का शव बरामद हुआ, जिसका सिर नीचे की ओर और पैर ऊपर की तरफ थे। मृतक के शरीर पर गंभीर चोटें थीं, चेहरा झुलसा हुआ था, खोपड़ी टूटी हुई थी और उसकी बाईं आंख गायब थी।

शव मिलने के बाद स्थानीय ग्रामीणों ने आरोपी 1 (A1) और आरोपी 2 (A2) को पकड़ लिया। अभियोजन पक्ष का पूरा मामला परिस्थितियों के साक्ष्यों पर आधारित था, जिसमें शामिल थे:

  1. ‘लास्ट सीन टुगेदर’ (आखिरी बार साथ देखे जाने) का सिद्धांत।
  2. ग्रामीणों द्वारा पकड़े जाने पर आरोपियों द्वारा की गई कथित अतिरिक्त-न्यायिक स्वीकारोक्ति।
  3. हत्या में प्रयुक्त हथियार (पत्थर और कांच का टुकड़ा) और मृतक की मोटरसाइकिल की बरामदगी।
  4. गवाहों के मौखिक बयान, जिसमें एक महिला गवाह (PW11) का बयान शामिल था, जिसने चारों को शाम को एक साथ शराब पीते देखने का दावा किया था।

ट्रायल कोर्ट ने तीनों आरोपियों को दोषी ठहराया था, जिसे बाद में हाईकोर्ट ने भी बरकरार रखा। इसके बाद, तीन में से दो आरोपियों (A1 और A2) ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की, जबकि तीसरे आरोपी ने कोई अपील दायर नहीं की थी।

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पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ताओं की ओर से: वकील सुश्री आशिमा मंडला ने दलील दी कि परिस्थितियों की कड़ी पूरी तरह से टूटी हुई थी। उन्होंने कहा कि मृतक को आरोपियों के साथ आखिरी बार देखे जाने और उसकी मौत के संभावित समय के बीच का अंतर बहुत अधिक था, जिससे कोई भी प्रतिकूल निष्कर्ष निकालना संभव नहीं था। उन्होंने कथित स्वीकारोक्ति के बयानों में भारी अंतर्विरोधों की ओर इशारा किया और बरामदगी की वैधता पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि बरामद किए गए हथियारों को न तो कभी कोर्ट में पेश किया गया और न ही पोस्टमॉर्टम करने वाले डॉक्टर को दिखाया गया।

प्रतिवादी (पश्चिम बंगाल राज्य) की ओर से: राज्य की वकील सुश्री श्रद्धा चिरानिया ने निचली अदालतों के फैसलों का समर्थन किया। उन्होंने दलील दी कि आखिरी बार साथ देखे जाने की थ्योरी को पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट से बल मिलता है, जिसमें मृतक के पेट से शराब की मौजूदगी पाई गई थी, जो PW11 के इस बयान की पुष्टि करती है कि उन्होंने साथ में शराब पी थी। उन्होंने यह भी कहा कि भले ही बरामदगी स्थल (धान का खेत) एक खुला स्थान था, लेकिन धान के घने पौधों के कारण वहां हथियारों को छुपाना संभव था, जिससे साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 के तहत की गई बरामदगी पूरी तरह वैध थी।

Court का विश्लेषण और महत्वपूर्ण टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट ने अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत की गई कड़ियों का गहराई से मूल्यांकन किया:

1. ‘लास्ट सीन टुगेदर’ सिद्धांत और मौत का समय

अभियोजन पक्ष ने PW1 और PW14 के बयानों पर भरोसा किया था, जिन्होंने 30 अक्टूबर 2012 को शाम 4:00 से 5:00 बजे के बीच चारों को साथ देखने का दावा किया था। शव अगले दिन सुबह करीब 10:00 बजे मिला और पोस्टमॉर्टम दोपहर 2:10 बजे हुआ।

डॉक्टर (PW10) द्वारा दी गई पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में मौत का समय बेहद लचीला था, जिसमें लिखा था कि “मृतक की मृत्यु के बाद परीक्षण के दौरान 24 घंटे नहीं बीते थे।”

खंडपीठ ने इस बात पर जोर दिया कि मौत के समय की इतनी लंबी अवधि का मतलब यह है कि मौत रात या सुबह के किसी भी समय हो सकती थी। कोर्ट ने स्टेट ऑफ गोवा बनाम संजय ठाकरान और अन्य (2007) 3 SCC 755 मामले का हवाला देते हुए टिप्पणी की:

“आरोपी और मृतक को आखिरी बार साथ देखे जाने के बाद कम समय के भीतर मौत होना सबसे महत्वपूर्ण है, ताकि इस तथ्य को आरोपी के खिलाफ एक आपत्तिजनक परिस्थिति के रूप में माना जा सके। जब समय का अंतराल बड़ा होता है तो बीच में अन्य परिस्थितियां आ सकती हैं, जो इस कड़ी को तोड़ देती हैं और केवल इस कारण से कि आरोपी ने मृतक का साथ कब छोड़ा इसका स्पष्टीकरण नहीं दिया, उसके खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।”

इस आधार पर कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि “समय का दायरा काफी बड़ा होने के कारण मौत को तत्काल बाद की घटना नहीं माना जा सकता, इसलिए इस मामले में ‘लास्ट सीन टुगेदर’ सिद्धांत के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती।”

इसके अलावा, कोर्ट ने PW11 के उस बयान को भी संदेहास्पद माना जिसमें उसने चारों को बीडीओ (BDO) कार्यालय के पीछे शराब पीते देखने की बात कही थी, क्योंकि वह जिरह में अपने नियोक्ता का नाम या काम करने की जगह बताने में पूरी तरह असमर्थ रही थी।

2. ‘अतिरिक्त-न्यायिक स्वीकारोक्ति’ की अस्वीकृति

अभियोजन पक्ष का दावा था कि ग्रामीणों द्वारा पकड़े जाने पर A1 ने PW8 के सामने अपराध कबूल किया था। हालांकि, कोर्ट ने गवाहों के बयानों में गहरे अंतर्विरोध पाए। जहां PW8 ने दावा किया कि A1 ने तीनों द्वारा हत्या की बात कबूली थी, वहीं अन्य गवाहों (PW3, PW12 और PW14) ने गवाही दी कि A1 ने खुद को बचाते हुए केवल A2 और A3 पर हत्या का दोष मढ़ा था।

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इस साक्ष्य को खारिज करते हुए खंडपीठ ने टिप्पणी की:

“स्वयं को दोषमुक्त करने वाला और सह-आरोपी पर आरोप लगाने वाला बयान अपने स्वभाव से ही अविैसनीय होता है। इसे अन्य आरोपियों के खिलाफ इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, क्योंकि उन्हें इस बयान को देने वाले से जिरह (cross examination) करने का अवसर नहीं मिलता। यह बयान देने वाले व्यक्ति को भी दोषी नहीं ठहरा सकता क्योंकि तीन गवाहों के बयानों के विपरीत केवल एक गवाह के बयान में स्वीकारोक्ति का कोई तत्व नहीं मिलता।”

कोर्ट ने यह भी दर्ज किया कि यह कथित बयान तब लिए गए जब आरोपियों को उग्र भीड़ ने बंधक बना रखा था और उनके शरीर पर चोटों के निशान थे, जो यह दर्शाता है कि यह सब शारीरिक दबाव या हिंसा के डर के तहत हुआ होगा।

3. बरामदगी में गंभीर खामियां (भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 27)

अभियोजन पक्ष ने दावा किया कि हत्या में इस्तेमाल किया गया भारी पत्थर और कांच का टुकड़ा A1 और A2 की संयुक्त जानकारी पर बरामद किया गया था। कोर्ट ने इस बरामदगी में कई गंभीर कानूनी खामियां पाईं:

  • जब्ती सूची में उस गुप्त स्थान का कोई विशिष्ट विवरण नहीं था जहां ये चीजें छुपाई गई थीं।
  • आरोपियों का ऐसा कोई बयान दर्ज नहीं था जिससे यह सिद्ध हो कि उन्हें उस स्थान पर चीजें छुपाए जाने की सटीक जानकारी थी।
  • स्वतंत्र गवाह (Pradhan – PW5) ने गवाही में यह नहीं कहा कि आरोपियों ने अपनी उपस्थिति में उन स्थानों की ओर इशारा किया था।
  • सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि पत्थर और कांच के टुकड़े को कभी भी कोर्ट के सामने पेश नहीं किया गया और न ही इसे डॉक्टर को दिखाकर राय मांगी गई कि क्या इन वस्तुओं से मृतक के शरीर पर आई चोटें संभव थीं।
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धारा 27 के वैधानिक नियमों को स्पष्ट करते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की:

“आरोपी के बयान से सामने आने वाली उसकी जानकारी और छुपाव की बात ही धारा 27 का सबसे महत्वपूर्ण घटक है, जिसके बाद ही उसे आपराधिक मुकदमे में इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके अलावा पुलिस अधिकारी के सामने किया गया कोई भी अन्य इकबालिया बयान खुद को फंसाने वाला होने के कारण बाहर रखा जाता है।”

इसी तरह, मृतक की मोटरसाइकिल की बरामदगी को भी कोर्ट ने अमान्य माना क्योंकि जिस घर में उसे खड़ा किया गया था, उसके मालिक (PW9) ने आरोपियों को पहचानने से इनकार कर दिया था और मोटरसाइकिल के मालिकाना हक से जुड़े पंजीकरण दस्तावेज भी अदालत में प्रस्तुत नहीं किए गए थे।

4. अपराध के मकसद (Motive) का अभाव

खंडपीठ ने अंत में यह भी उल्लेख किया कि अभियोजन पक्ष इस बेहद बर्बर हत्या के पीछे किसी भी तरह के मकसद या रंजिश को साबित करने में पूरी तरह असमर्थ रहा।

कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत की गई कोई भी परिस्थिति आरोपियों को इस अपराध से जोड़ने में खरी नहीं उतरी। निचली अदालतों और हाईकोर्ट के सजा के फैसले को खारिज करते हुए कोर्ट ने दोनों अपीलकर्ताओं (पापन सरकार उर्फ प्रणब और सह-अपीलकर्ता) को तुरंत रिहा करने का आदेश दिया।

जेल में बंद गैर-अपीलकर्ता आरोपी (A3) के प्रति कोर्ट की संवेदनशीलता

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि तीसरा आरोपी (A3) भी अन्य दो आरोपियों के साथ जेल में बंद था, लेकिन किन्हीं कारणों से वह सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर नहीं कर सका था। इस पर कोर्ट ने निर्देश दिया:

“दोनों आरोपियों को बरी करने की परिस्थिति को देखते हुए यह उचित होगा कि तीसरे आरोपी (A3) को भी अपील दायर करने के लिए कानूनी सहायता दी जाए। हम राष्ट्रीय कानूनी सेवा प्राधिकरण (NALSA) के सदस्य सचिव को निर्देश देते हैं कि वे पश्चिम बंगाल राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरण के सदस्य सचिव से संपर्क करें, जो… संबंधित जेल क्षेत्र की जिला/तालुका कानूनी सेवा प्राधिकरण के माध्यम से A3 को पर्याप्त सहायता प्रदान करेंगे और यह सुनिश्चित करेंगे कि इस फैसले के खिलाफ इस न्यायालय में अपील दायर की जाए।”

कोर्ट ने इस निर्देश के अनुपालन के लिए दो महीने का समय दिया है और रिपोर्ट सौंपने के लिए मामले की अगली सुनवाई 20 जुलाई 2026 तय की है।

केस विवरण

  • केस का शीर्षक: पापन सरकार उर्फ प्रणब बनाम पश्चिम बंगाल राज्य
  • केस संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 2507/2026 एवं क्रिमिनल अपील संख्या 2508/2026
  • पीठ: जस्टिस संजय कुमार, जस्टिस के. विनोद चंद्रन
  • दिनांक: 22 मई, 2026

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