सुप्रीम कोर्ट ने तीन व्यक्तियों की अपीलों को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए एक महत्वपूर्ण फैसले में उनकी दोषसिद्धि को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 307 (हत्या का प्रयास) और धारा 34 के तहत बदलकर धारा 325 (जानबूझकर गंभीर चोट पहुंचाना) और धारा 34 आईपीसी कर दिया है।
सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ, जिसमें जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमीकापम कोटिश्वर सिंह शामिल थे, ने स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर हत्या करने के इरादे का अनुमान नहीं लगाया जा सकता कि पीड़ित को आई चोटें डॉक्टरों की राय में जानलेवा थीं। कोर्ट ने अपीलकर्ताओं—रोशन लाल, सज्जन सिंह और सत्य प्रकाश—की सजा को उनके द्वारा पहले ही काटी जा चुकी जेल की अवधि तक सीमित कर दिया और तीनों पर 50,000-50,000 रुपये का जुर्माना लगाया, जिसे पीड़ित को मुआवजे के रूप में दिया जाएगा।
मामले की पृष्ठभूमि
अभियोजन पक्ष के अनुसार, यह मामला 5 जून 2000 का है। घायल अमर सिंह (PW3), जो रेलवे में गुड्स क्लर्क थे और उस समय गांव में रात के चौकीदार के रूप में अपनी ड्यूटी पर थे, अपने साथियों की तलाश में निकले थे। जब वे रामा नंद (PW4) के घर के पास पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि कुछ लोग एक जीप चालक के साथ मारपीट कर रहे थे। जब अमर सिंह ने बीच-बचाव करने का प्रयास किया, तो आरोपियों ने उन पर हमला बोल दिया।
अभियोजन का आरोप था कि सज्जन सिंह ने लाठी से अमर सिंह के सिर पर वार किया, सत्य प्रकाश ने उनके दाहिने हाथ पर लाठी मारी, धर्मवीर ने लात-घूंसों से हमला किया और रोशन लाल ने भी उनके सिर पर लाठी से प्रहार किया। रामा नंद (PW4) ने मौके पर पहुंचकर पीड़ित को बचाया। घटना के बाद पुलिस को सूचना दी गई और अगले दिन 6 जून 2000 को सुबह 8:30 बजे एफआईआर (FIR No. 116/2000) दर्ज की गई, जिसमें शुरुआत में धारा 323, 325, 506 थी और बाद में धारा 307 आईपीसी जोड़ी गई।
पीड़ित अमर सिंह का इलाज पहले रेवाड़ी के सरकारी अस्पताल में हुआ, लेकिन स्थिति बिगड़ने पर उन्हें उत्तर रेलवे के सेंट्रल अस्पताल और बाद में दिल्ली के लोक नायक अस्पताल में स्थानांतरित किया गया। डॉक्टर ओ.पी. डबास (PW1) के अनुसार, पीड़ित के सिर के बाईं ओर गहरा घाव था और खोपड़ी में कंपाउंड फ्रैक्चर था। सीटी स्कैन में दोनों पैराइटल हड्डियों में फ्रैक्चर और हेमेटोमा पाया गया, जिसे डॉक्टरों ने “जानलेवा” (dangerous to life) श्रेणी का बताया।
ट्रायल कोर्ट ने चौथे आरोपी धर्मवीर को सबूतों की कमी के कारण बरी कर दिया, लेकिन अन्य तीनों आरोपियों को 2 मई 2002 को धारा 307/34 के तहत दोषी ठहराते हुए 7 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई। पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने 16 अगस्त 2010 को इस दोषसिद्धि को बरकरार रखा, जिसके खिलाफ अपीलकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ताओं की ओर से:
अपीलकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष तर्क दिया कि उन्हें आपसी रंजिश के कारण झूठा फंसाया गया है और पीड़ित को चोटें किसी अज्ञात व्यक्ति ने पहुंचाई थीं। उनके मुख्य बिंदु निम्नलिखित थे:
- मेडिकल रिकॉर्ड में केवल एक ही घाव दर्ज था, जिससे धारा 307 के तहत दोषसिद्धि कानूनी रूप से सही नहीं है।
- डॉक्टर ओ.पी. डबास (PW1) की कोर्ट में दी गई गवाही उनके द्वारा घटना के दिन जारी मेडिकल सर्टिफिकेट के विपरीत थी।
- जीप ड्राइवर और मामले के जांच अधिकारी (IO) जैसे आवश्यक गवाहों से अभियोजन पक्ष ने पूछताछ नहीं की।
- यह घटना अचानक हुई जब पीड़ित ने हस्तक्षेप किया, इसलिए आरोपियों का पहले से पीड़ित की हत्या करने का कोई इरादा या योजना नहीं थी।
- ट्रायल कोर्ट ने सजा के प्रश्न पर अपना पक्ष रखने का उचित अवसर नहीं दिया, क्योंकि उन्हें 2 मई 2002 को दोषी ठहराया गया और अगले ही दिन सुबह 10:30 बजे सजा सुना दी गई।
अभियोजन (राज्य) की ओर से:
राज्य के वकील ने दलील दी कि ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट के फैसले ठोस और प्रासंगिक सबूतों पर आधारित हैं:
- घटना के बाद भी आरोपियों का आचरण बेहद आपत्तिजनक रहा, क्योंकि उन्होंने गवाह रामा नंद (PW4) और पीड़ित को लगातार डराने-धमकाने के लिए उनके खिलाफ झूठी एफआईआर दर्ज कराईं, जो जांच में फर्जी पाई गईं।
- लगातार मिल रही धमकियों के कारण पीड़ित को गुरुग्राम में जाकर बसने के लिए मजबूर होना पड़ा।
- मेडिकल साक्ष्यों से यह स्पष्ट है कि पीड़ित के सिर के दोनों तरफ गंभीर फ्रैक्चर थे, जिससे बाद में उनके कई अंगों के काम बंद करने (multi-organ failure) की नौबत आ गई थी।
अदालत का विश्लेषण और मिसालें
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह सामान्यतः निचली अदालतों के तथ्यों के निष्कर्षों में तब तक हस्तक्षेप नहीं करता, जब तक कि उसमें कोई गंभीर कानूनी या प्रक्रियात्मक त्रुटि न हो (दलबीर कौर बनाम पंजाब राज्य, 1976)।
धारा 307 आईपीसी (हत्या का प्रयास) के कानूनी पहलुओं पर:
कोर्ट ने समझाया कि धारा 307 आईपीसी के तहत अपराध साबित करने के लिए दो तत्व अनिवार्य हैं: पहला, हत्या करने का इरादा या ज्ञान (mens rea), और दूसरा, उस इरादे के तहत किया गया कृत्य (actus reus)।
पीठ ने मध्य प्रदेश राज्य बनाम सलीम उर्फ चमरू (2005) 5 SCC 554 के मामले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था:
“इस धारा के तहत दोषसिद्धि के लिए यह आवश्यक नहीं है कि ऐसी शारीरिक चोट पहुंचाई जाए जो मृत्यु कारित करने में सक्षम हो। हालांकि वास्तव में पहुंचाई गई चोट की प्रकृति आरोपी के इरादे का पता लगाने में काफी मदद करती है, लेकिन इस इरादे का अनुमान अन्य परिस्थितियों से भी लगाया जा सकता है… अदालत को यह देखना होता है कि क्या कृत्य, उसके परिणाम की परवाह किए बिना, धारा में उल्लिखित इरादे या ज्ञान के साथ और उन परिस्थितियों में किया गया था।”
इसी सिद्धांत को बिपिन बिहारी बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2006) 8 SCC 799 के मामले में भी दोहराया गया।
मौजूदा मामले के तथ्यों का विश्लेषण करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि आरोपियों और पीड़ित के बीच पहले से कोई दुश्मनी नहीं थी। कोर्ट ने टिप्पणी की:
“तथ्यों को समग्र रूप से देखने पर पता चलता है कि अपीलकर्ताओं का मूल उद्देश्य शिकायतकर्ता को चल रहे विवाद में हस्तक्षेप करने से रोकना था। हमले में इस्तेमाल किए गए हथियार साधारण लाठियां थीं, जिन्हें स्वतः ही घातक हथियार नहीं माना जा सकता। रिकॉर्ड पर ऐसा कुछ नहीं है जिससे यह संकेत मिले कि अपीलकर्ताओं ने इतनी क्रूरता या क्रोध से हमला जारी रखा जिससे हत्या करने का इरादा स्पष्ट रूप से प्रकट होता हो।”
कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया:
“केवल इस आधार पर हत्या करने के इरादे का अनुमान नहीं लगाया जा सकता कि अंततः चोटों को जानलेवा माना गया था। पूर्व रंजिश, पूर्व-नियोजन, घातक हथियारों से बार-बार किए गए वार या मृत्यु कारित करने के दृढ़ प्रयास जैसे साक्ष्यों के अभाव में, यह कोर्ट यह मानने में असमर्थ है कि अपीलकर्ताओं का इरादा धारा 307 आईपीसी को आकर्षित करने वाला था।”
गंभीर चोट और धारा 325 आईपीसी का लागू होना:
भले ही कोर्ट ने माना कि धारा 307 आईपीसी के तत्व इस मामले में सिद्ध नहीं होते, लेकिन डॉक्टरों की रिपोर्ट से यह स्पष्ट था कि पीड़ित को गंभीर चोटें आई थीं।
पीड़ित के सिर की दोनों पैराइटल हड्डियों में फ्रैक्चर होना आईपीसी की धारा 320 के खंड सातवें (हड्डी का टूटना या विस्थापन) और खंड आठवें (ऐसी चोट जो जीवन को खतरे में डाले या पीड़ित को 20 दिनों तक गंभीर शारीरिक पीड़ा में रखे) के तहत “गंभीर चोट” (grievous hurt) की श्रेणी में आता है। इसलिए, कोर्ट ने माना कि अपीलकर्ताओं का कृत्य धारा 325 आईपीसी के तहत अपराध की श्रेणी में पूरी तरह से आता है।
अदालत का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने रोशन लाल, सज्जन सिंह और सत्य प्रकाश की दोषसिद्धि को धारा 307/34 आईपीसी से बदलकर धारा 325/34 आईपीसी कर दिया।
सजा की अवधि के संबंध में कोर्ट ने पाया कि:
- रोशन लाल 2 वर्ष 7 महीने;
- सज्जन सिंह 2 वर्ष 8 महीने;
- सत्य प्रकाश 1 वर्ष 1 महीने की जेल काट चुके हैं।
अपीलकर्ताओं को वर्ष 2011 में ही जमानत मिल गई थी। कोर्ट ने फैसला सुनाया कि न्याय का उद्देश्य तब पूरा होगा जब उनकी सजा को उनके द्वारा पहले ही काटी जा चुकी जेल की अवधि तक सीमित कर दिया जाए। इसके अतिरिक्त, कोर्ट ने प्रत्येक अपीलकर्ता पर 50,000 रुपये का जुर्माना लगाया। यह जुर्माना राशि पीड़ित अमर सिंह को मुआवजे के रूप में दी जाएगी। जुर्माना न देने की स्थिति में अपीलकर्ताओं को छह महीने की अतिरिक्त साधारण कैद भुगतनी होगी।
मामले का विवरण
- मामले का शीर्षक: रोशन लाल बनाम हरियाणा राज्य व अन्य
- मामला संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 2207/2011
- पीठ: जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमीकापम कोटिश्वर सिंह
- दिनांक: 22 मई, 2026

