दिल्ली हाई कोर्ट से उमर खालिद को राहत: मां की सर्जरी के लिए मिली 3 दिन की अंतरिम जमानत, पुलिस की ‘कस्टडी एस्कॉर्ट’ की मांग खारिज

दिल्ली हाई कोर्ट ने शुक्रवार को जेल में बंद छात्र कार्यकर्ता उमर खालिद को उनकी बीमार मां की सर्जरी के दौरान साथ रहने के लिए तीन दिनों की अंतरिम जमानत मंजूर कर ली है। जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस मधु जैन की खंडपीठ ने इस मामले में मानवीय रुख अपनाते हुए खालिद को अस्थाई राहत दी। इसके साथ ही कोर्ट ने दिल्ली पुलिस के उस अनुरोध को भी ठुकरा दिया, जिसमें खालिद को कड़ी पुलिस सुरक्षा (कस्टडी एस्कॉर्ट) के साये में ही बाहर भेजने की मांग की गई थी।

साल 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों की कथित बड़ी साजिश से जुड़े कड़े गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत सितंबर 2020 में गिरफ्तार हुए उमर खालिद पिछले पांच साल और आठ महीने से बिना मुकदमे के जेल में बंद हैं।

क्या है मामला और निचली अदालत का फैसला?

उमर खालिद ने दिल्ली की एक निचली अदालत के 19 मई के उस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें उनकी 15 दिनों की अंतरिम जमानत अर्जी खारिज कर दी गई थी। खालिद ने अपने दिवंगत मामा के निधन के 40वें दिन की रस्मों (चेहल्लुम) में शामिल होने और अपनी मां की तय सर्जरी के दौरान उनके साथ रहने के लिए यह राहत मांगी थी।

निचली अदालत ने अपने फैसले में कहा था कि मामा की रस्मों में शामिल होना “इतना आवश्यक नहीं” है। वहीं मां की सर्जरी पर कोर्ट का कहना था कि परिवार में देखभाल के लिए अन्य सदस्य भी मौजूद हैं। निचली अदालत ने टिप्पणी की थी:

“लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि जब भी आरोपी जमानत की मांग करे, अदालत उसे हर बार मंजूर कर ही दे।”

अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें

हाई कोर्ट की खंडपीठ के सामने उमर खालिद का पक्ष रख रहे वरिष्ठ अधिवक्ता त्रिदीप पेस ने दलील दी कि उनके मुवक्किल को इससे पहले भी हिरासत के दौरान तीन बार अंतरिम जमानत (जैसे उनकी बहन की शादी के लिए) मिल चुकी है। इस दौरान उन्होंने कभी भी अदालत द्वारा तय की गई किसी भी शर्त का उल्लंघन नहीं किया है।

दूसरी तरफ, दिल्ली पुलिस की ओर से पेश हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) एस.वी. राजू ने जमानत का पुरजोर विरोध किया। उन्होंने कहा कि खालिद की मां की सर्जरी बेहद सामान्य है और उनके पिता व बहनें मदद के लिए वहां मौजूद हैं। पुलिस की दलील थी कि यदि कोर्ट कोई राहत देना भी चाहता है, तो खालिद को नियमित अंतरिम जमानत देने के बजाय केवल कस्टडी एस्कॉर्ट (पुलिस घेरे में मुलाकात) के तहत कुछ घंटों के लिए जाने दिया जाए और उसी दिन वापस जेल लाया जाए।

READ ALSO  हाइकोर्ट ने कहा, लोकतंत्र में न्यायपालिका आलोचना के लिए खुली है

हाई कोर्ट का मानवीय दृष्टिकोण और शर्तें

अदालत ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद अभियोजन पक्ष के आरोपों की गंभीरता और आरोपी की पारिवारिक जरूरत के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की। कोर्ट ने माना कि इसी साल 5 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने खालिद को “मुख्य साजिशकर्ताओं में से एक” बताते हुए नियमित जमानत देने से इनकार कर दिया था।

इसके बावजूद, हाई कोर्ट ने मां की बीमारी को देखते हुए मानवीय पहलू को सर्वोपरि माना। खंडपीठ ने अपने आदेश में दर्ज किया:

“अदालत इस बात से पूरी तरह वाकिफ है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा 5 जनवरी को अपीलकर्ता की नियमित जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी… फिर भी, एक सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण अपनाते हुए कि उनकी मां की सर्जरी होनी है, यह अदालत उन्हें 1 जून की सुबह 7:00 बजे से 3 जून की शाम 5:00 बजे तक अंतरिम जमानत देने की इच्छुक है।”

हाई कोर्ट ने दिवंगत मामा की रस्मों में शामिल होने की दलील को नाकाफी बताते हुए खारिज कर दिया। साथ ही पुलिस की चौबीस घंटे हिरासत में रखने की मांग को भी नामंजूर कर दिया और इसकी जगह बेहद सख्त सुरक्षा व आवासीय शर्तें लागू करने का आदेश दिया।

READ ALSO  Delhi High Court Sets Date for Hearing D K Shivakumar's Plea Against ED Money Laundering Probe

जमानत की शर्तें और नियम

अदालत ने उमर खालिद को 1 जून, 2026 की सुबह 7:00 बजे से 3 जून, 2026 की शाम 5:00 बजे तक के लिए ₹1 लाख के निजी मुचलके और जमानतदार की शर्त पर रिहा करने का आदेश दिया है। इस दौरान उन पर निम्नलिखित प्रतिबंध लागू रहेंगे:

  1. अंतरिम जमानत की इस अवधि के दौरान खालिद राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) से बाहर कदम नहीं रख सकेंगे।
  2. वह केवल दिल्ली के जामिया नगर स्थित अपने घर पर ही ठहर सकते हैं। उन्हें अपने घर और उस अस्पताल (जहां मां की सर्जरी होनी है) के अलावा किसी भी अन्य जगह जाने की इजाजत नहीं होगी।
  3. वह केवल एक ही मोबाइल नंबर का इस्तेमाल करेंगे और केस के जांच अधिकारी (IO) के साथ लगातार संपर्क में बने रहेंगे।

लंबे समय से जेल में बंद होने पर अदालती बहस

यह फैसला ऐसे समय में आया है जब यूएपीए (UAPA) के तहत लंबे समय तक जेल में रखने (बिना ट्रायल) को लेकर देश की न्यायपालिका में एक व्यापक कानूनी बहस छिड़ी हुई है।

READ ALSO  HC dismisses plea for retest of CUET for individual candidate

निचली अदालत द्वारा खालिद की याचिका खारिज किए जाने से ठीक एक दिन पहले, 18 मई को सुप्रीम कोर्ट की एक खंडपीठ (जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां) ने सर्वोच्च अदालत की ही एक अन्य बेंच के उस 5 जनवरी के फैसले पर “गंभीर असंतोष” व्यक्त किया था, जिसने उमर खालिद और सह-आरोपी शारजील इमाम को नियमित जमानत देने से मना कर दिया था।

दरअसल, 5 जनवरी के फैसले में जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने दंगों की साजिश के पांच अन्य आरोपियों को तो जमानत दे दी थी, लेकिन खालिद और इमाम की अर्जी यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि वे “साजिश की पदानुक्रम में काफी ऊपर” हैं और आतंकी मामलों में केवल लंबा वक्त जेल में बिताना जमानत पाने का “पूर्ण अधिकार” नहीं बन जाता।

इसके विपरीत, जस्टिस नागरत्ना और जस्टिस भुइयां की बेंच ने इस तर्क पर असहमति जताई। उन्होंने साल 2021 के ऐतिहासिक फैसले ‘यूनियन ऑफ इंडिया बनाम के.ए. नजीब’ का हवाला दिया, जिसमें स्पष्ट कहा गया था कि यदि किसी यूएपीए आरोपी के मुकदमे के जल्द पूरा होने के आसार न हों और वह लंबे समय से जेल काट रहा हो, तो उसके त्वरित सुनवाई (Speedy Trial) के संवैधानिक अधिकार की रक्षा के लिए उसे जमानत पर रिहा किया जाना चाहिए।

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles