रजिस्ट्रार जनरल के पास न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ स्वतः संज्ञान लेकर अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू करने का कोई अधिकार नहीं; चीफ जस्टिस की मंजूरी के बिना कार्रवाई शुरू से ही शून्य: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड हाईकोर्ट द्वारा दायर एक अपील को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि रजिस्ट्रार जनरल के पास न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ स्वतः संज्ञान (suo-motu) लेकर अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू करने का कोई संवैधानिक या वैधानिक अधिकार नहीं है। चीफ जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस जोयमाल्य बागची की पीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 235 के तहत शक्ति “हाईकोर्ट” (जिसमें चीफ जस्टिस और उनके साथी न्यायाधीश शामिल हैं) में निहित है। परिणामस्वरूप, चीफ जस्टिस या उनके द्वारा गठित न्यायाधीशों की समिति की स्पष्ट मंजूरी के बिना शुरू की गई कोई भी अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरुआत से ही शून्य (void ab initio) और कानून की नजर में अस्तित्वहीन (non-est) मानी जाएगी।

मामले की पृष्ठभूमि

प्रतिवादी संख्या 1, दीपाली शर्मा को वर्ष 2008 में उत्तराखंड में एक न्यायिक अधिकारी के रूप में नियुक्त किया गया था। एक घरेलू जांच के बाद, उनके खिलाफ गंभीर कदाचार के आरोप सिद्ध पाए जाने पर उन्हें न्यायिक सेवा से हटा दिया गया था।

उन्होंने इस बर्खास्तगी को उत्तराखंड हाईकोर्ट के समक्ष रिट याचिका (WPSB संख्या 266/2021) दायर कर चुनौती दी। 6 जनवरी 2026 को हाईकोर्ट की एक खंडपीठ (जिसमें तत्कालीन चीफ जस्टिस और एक अन्य न्यायाधीश शामिल थे) ने उनकी याचिका स्वीकार कर ली। एक विस्तृत फैसले के माध्यम से हाईकोर्ट ने न्यायिक अधिकारी को सभी आरोपों से बरी करते हुए उन्हें सेवा में बहाल करने का आदेश दिया। इसके बाद उत्तराखंड हाईकोर्ट ने अपीलकर्ता के रूप में सुप्रीम कोर्ट का रुख किया और खंडपीठ के इस फैसले को चुनौती दी।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता हाईकोर्ट का प्रतिनिधित्व करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता श्रीमती माधवी दीवान ने तर्क दिया कि विभागीय जांच और अन्य परिस्थितियां न्यायिक अधिकारी के “घोर कदाचार” को दर्शाती हैं। अपीलकर्ता का आरोप था कि प्रतिवादी न्यायिक अधिकारी ने घरेलू सहायिका के रूप में रखी गई एक नाबालिग लड़की को प्रताड़ित किया था, जिसे शरीर पर 20 से अधिक चोटों के साथ बचाया गया था।

दूसरी ओर, प्रतिवादी न्यायिक अधिकारी का शुरू से ही यह रुख रहा कि वह कुछ वरिष्ठ अधिकारियों के हाथों उत्पीड़न का शिकार हुई थीं।

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कोर्ट का विश्लेषण और कानूनी टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य रूप से अनुशासनात्मक कार्यवाही की प्रक्रियात्मक और संवैधानिक वैधता पर ध्यान केंद्रित किया। कोर्ट ने टिप्पणी की कि “कानून और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार आयोजित विभागीय जांच में यदि इस तरह के आरोप साबित होते हैं, तो बड़ा दंड देने को मंजूरी देने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं हो सकता।” हालांकि, कोर्ट को जांच शुरू करने के तरीके में एक बुनियादी संवैधानिक त्रुटि मिली।

न्यायालय ने इस बात पर गंभीर चिंता व्यक्त की कि न्यायिक अधिकारी के खिलाफ जांच केवल “हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल के कहने और पहल पर” शुरू की गई थी। पूरी कार्यवाही के दौरान न तो रजिस्ट्रार जनरल का परीक्षण किया गया और न ही ऐसा कोई प्राथमिक दस्तावेज पेश किया गया जिससे यह साबित हो सके कि उन्होंने हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस या न्यायाधीशों की किसी अनुशासनात्मक समिति से कोई आदेश या मंजूरी प्राप्त की थी।

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संविधान के अनुच्छेद 235 का विश्लेषण करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा:

“हमें इस बात में कोई संदेह नहीं है कि संविधान के अनुच्छेद 235 के तहत शक्ति स्पष्ट रूप से “हाईकोर्ट” में निहित की गई है, जिसमें निश्चित रूप से माननीय चीफ जस्टिस और साथी न्यायाधीश शामिल होंगे। जब तक अनुशासनात्मक कार्रवाई को हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस या उनके प्रतिनिधियों के रूप में उनके द्वारा गठित न्यायाधीशों की समिति द्वारा अनुमोदित नहीं किया जाता है, तब तक कथित अनुशासनात्मक कार्रवाई सभी उद्देश्यों के लिए शुरुआत से ही शून्य (void ab initio) होगी।”

पीठ ने रजिस्ट्रार जनरल के प्रशासनिक अधिकारों को स्पष्ट रूप से सीमित करते हुए कहा:

“हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल के पास संवैधानिक योजना या न्यायिक अधिकारियों की सेवा शर्तों को नियंत्रित करने वाले वैधानिक नियमों के तहत किसी भी न्यायिक अधिकारी के खिलाफ स्वतः संज्ञान लेकर अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू करने का कोई अधिकार नहीं है। वह केवल माननीय चीफ जस्टिस और हाईकोर्ट के न्यायाधीशों की ओर से कार्य कर सकते हैं।”

चूंकि इस अनिवार्य संवैधानिक प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया था, इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने माना कि “प्रतिवादी संख्या 1 के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की बुनियाद ही कानून की नजर में अस्तित्वहीन (non-est) थी।” इस गंभीर प्रक्रियात्मक खामी के कारण कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले के तथ्यात्मक निष्कर्षों में जाना आवश्यक नहीं समझा। साथ ही, कोर्ट ने इस कानूनी प्रश्न पर भी विचार नहीं किया कि क्या हाईकोर्ट न्यायिक समीक्षा के तहत जांच अधिकारी के निष्कर्षों पर अपीलीय प्राधिकरण के रूप में कार्य कर सकता है।

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने अपील की अनुमति देते हुए उत्तराखंड हाईकोर्ट द्वारा दायर याचिका को खारिज कर दिया। मामले की समग्र परिस्थितियों को देखते हुए, विशेषकर जब प्रतिवादी पहले ही बहाल हो चुकी हैं और उन्होंने वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा उत्पीड़न का आरोप लगाया था, कोर्ट ने उनकी बहाली और अनुशासनात्मक कार्रवाई रद्द करने के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

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पीठ ने साफ किया कि वह हाईकोर्ट के तथ्यों के विश्लेषण से अलग केवल कानूनी आधार पर अनुशासनात्मक कार्रवाई को खारिज कर रही है:

“हम यह स्पष्ट करना आवश्यक समझते हैं कि हम अनुशासनात्मक कार्रवाई को पूरी तरह से अलग आधार पर खारिज कर रहे हैं, यानी ऊपर चर्चा किए गए कानूनी प्रश्न पर, न कि उन तथ्यों पर जिनकी चर्चा हाईकोर्ट ने अपने विवादित फैसले में की है।”

न्यायालय ने मामले से जुड़े अन्य सभी कानूनी सवालों को खुला छोड़ दिया है।

मामले का विवरण

  • मामले का शीर्षक: हाईकोर्ट ऑफ उत्तराखंड एट नैनीताल बनाम दीपाली शर्मा और अन्य
  • मामला संख्या: सिविल अपील संख्या ____ / 2026 (एसएलपी (सिविल) संख्या 16520 / 2026 से उत्पन्न)
  • पीठ: चीफ जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस जोयमल्य बागची
  • दिनांक: 18 मई, 2026

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