राजद्रोह कानून पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: अगर आरोपी को आपत्ति नहीं, तो अदालतों में चल सकती है सुनवाई

राजद्रोह कानून (Sedition Law) को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील कानूनी स्पष्टीकरण दिया है। शीर्ष अदालत ने साफ किया है कि देश भर की अदालतें भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 124A (राजद्रोह) के तहत लंबित मुकदमों, अपीलों और अन्य कानूनी कार्यवाहियों को आगे बढ़ा सकती हैं, बशर्ते आरोपी को इस पर कोई आपत्ति न हो और वह इसके लिए अपनी सहमति दे।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला उन लोगों के लिए न्याय की एक बड़ी उम्मीद बनकर आया है, जो लंबे समय से जेलों में बंद हैं और शीर्ष अदालत द्वारा राजद्रोह कानून पर लगाए गए ‘ब्लैंकेट स्टे’ (Blanket Stay) के कारण जिनके मामलों की सुनवाई पूरी तरह से रुकी हुई थी।

यह महत्वपूर्ण फैसला चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की तीन सदस्यीय पीठ ने सुनाया है।

17 साल से जेल में बंद आरोपी की याचिका पर आया फैसला

सुप्रीम कोर्ट का यह स्पष्टीकरण एक ऐसे आरोपी की याचिका पर सुनवाई के दौरान आया, जो पिछले 17 वर्षों से जेल की सलाखों के पीछे है। इस याचिकाकर्ता की आपराधिक अपील (जिसमें धारा 124A के तहत राजद्रोह का आरोप भी शामिल है) मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में लंबे समय से लंबित है।

देशभर में राजद्रोह के मामलों की सुनवाई पर लगी रोक के कारण इस मामले में भी कोई प्रगति नहीं हो रही थी। जेल की अनिश्चितता और न्याय में हो रही देरी से परेशान होकर याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उसने कोर्ट के समक्ष इच्छा जताई कि उसे अपनी अपील पर अंतिम सुनवाई और फैसले से कोई आपत्ति नहीं है।

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याचिकाकर्ता की इस पीड़ा को समझते हुए सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कानूनी अड़चन को दूर किया और कहा:

“याचिकाकर्ता की शिकायत है कि उसे अपनी आपराधिक अपील पर पूरी तरह से सुनवाई होने में कोई आपत्ति नहीं है, जिसमें धारा 124A के तहत लगे आरोप भी शामिल हैं। इसे ध्यान में रखते हुए, हम यह स्पष्ट करते हैं… कि जहां भी आरोपी को धारा 124A IPC के तहत दर्ज मुकदमे, अपील या किसी अन्य अदालती कार्यवाही को आगे बढ़ाने पर कोई आपत्ति नहीं है, वहां अदालतों के लिए कानून के अनुसार गुण-दोष (Merits) के आधार पर फैसला करने में कोई बाधा नहीं होगी।”

इस निर्देश के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट को आदेश दिया है कि वह याचिकाकर्ता की अपील को तुरंत विचारार्थ स्वीकार करे और मेरिट के आधार पर उस पर फैसला सुनाए।

पृष्ठभूमि: 2022 का वह ऐतिहासिक स्थगन आदेश

गुरुवार को आया यह फैसला दरअसल 11 मई, 2022 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा पारित एक ऐतिहासिक अंतरिम आदेश के व्यावहारिक क्रियान्वयन को सुगम बनाता है।

मई 2022 में, शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार को इस औपनिवेशिक कानून की समीक्षा करने का समय देते हुए राजद्रोह कानून पर अंतरिम रोक लगा दी थी। उस आदेश में केंद्र और राज्य सरकारों को स्पष्ट निर्देश दिए गए थे कि वे धारा 124A के तहत कोई भी नया मामला (FIR) दर्ज न करें।

इसके साथ ही, देश भर में चल रही सभी पुरानी जांचों, लंबित मुकदमों और अदालती कार्यवाहियों को स्थगित (Abeyance) कर दिया गया था। हालांकि, कानून के तहत बंद आरोपियों को नियमित जमानत के लिए अदालतों का रुख करने की छूट दी गई थी।

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चूंकि नए मामलों पर रोक अभी भी बरकरार है, इसलिए इस नए स्पष्टीकरण का उद्देश्य केवल उन आरोपियों को कानूनी राहत देना है जो अनिश्चित काल तक जेल में बंद रहने के बजाय अपने मामलों का त्वरित निपटारा चाहते हैं।

औपनिवेशिक विरासत और अधिकारों का संघर्ष

साल 1890 में ब्रिटिश हुकूमत द्वारा भारतीय दंड संहिता में शामिल की गई धारा 124A (राजद्रोह) आधुनिक भारत में हमेशा से तीखी बहस का विषय रही है। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और आलोचकों का तर्क है कि इस कानून का इस्तेमाल अक्सर असहमति की आवाजों को दबाने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने के लिए किया जाता रहा है।

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ऐतिहासिक रूप से, ब्रिटिश शासन ने इस कानून का इस्तेमाल भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों को चुप कराने के लिए किया था, जिसके तहत महात्मा गांधी और बाल गंगाधर तिलक जैसे दिग्गजों को भी जेल भेजा गया था।

फिलहाल इस कानून की संवैधानिक वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया, मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) एस.जी. वोम्बटकेरे, पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण शौरी और पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (PUCL) सहित कई प्रमुख संगठनों व नागरिकों ने इस दमनकारी प्रावधान को पूरी तरह समाप्त करने के लिए याचिकाएं दायर की हैं।

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