‘कॉरपोरेट बदले’ के लिए कानून का दुरुपयोग बर्दाश्त नहीं: J&K हाई कोर्ट ने दिल्ली के व्हिसलब्लोअर के खिलाफ ‘कार्बन कॉपी’ मुकदमे किए खारिज

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट ने नागरिकों को कानूनी रूप से प्रताड़ित करने की कोशिशों पर कड़ा रुख अपनाते हुए दिल्ली के एक व्हिसलब्लोअर के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को पूरी तरह रद्द कर दिया है। अदालत ने रियल एस्टेट कंपनी द्वारा अलग-अलग न्यायालयों में दर्ज कराए गए मुकदमों को एक-दूसरे की “कार्बन कॉपी” करार दिया। हाई कोर्ट ने साफ किया कि केवल एक सोशल मीडिया कैंपेन के लिए किसी नागरिक के खिलाफ देश के अलग-अलग हिस्सों में समानांतर मामले दर्ज कराना उसकी स्वतंत्रता और आर्थिक संसाधनों को निचोड़ने की सोची-समझी साजिश है।

सुनवाई की अध्यक्षता कर रहे न्यायमूर्ति एम ए चौधरी ने याचिकाकर्ता के खिलाफ अपनाई गई इस मुकदमेबाजी रणनीति पर गंभीर चिंता व्यक्त की। उन्होंने चेतावनी दी कि एक ही कृत्य को तोड़-मरोड़कर अलग-अलग क्षेत्राधिकारों में कई मुकदमों में तब्दील करना “न्यायिक अराजकता के लिए एक खतरनाक मिसाल” कायम करेगा।

अपने 14 मई के फैसले में हाई कोर्ट ने कड़े शब्दों में कहा, “अपराधिक न्याय प्रणाली को किसी कॉरपोरेट घराने के व्यक्तिगत प्रतिशोध का जरिया या किसी नागरिक के संसाधनों और उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता को व्यवस्थित तरीके से खत्म करने का हथियार बनने की अनुमति नहीं दी जा सकती।”

मामले की पृष्ठभूमि: ₹700 करोड़ का बड़ा घोटाला

यह कानूनी लड़ाई दिल्ली के रहने वाले 54 वर्षीय विश्वेंद्र सिंह और एक प्रमुख रियल एस्टेट डेवलपर के बीच के गहरे विवाद से जुड़ी है। विश्वेंद्र सिंह खुद को एक बड़े घोटाले का शिकार और व्हिसलब्लोअर बताते हैं। सिंह का आरोप है कि बिल्डर आशीष भल्ला ने साल 2009 से 2014 के बीच ‘एएन बिल्डवेल प्राइवेट लिमिटेड’ (AN Buildwell Pvt Ltd) से करीब 700 करोड़ रुपये की हेराफेरी की।

सिंह के अनुसार, भल्ला ने इस भारी-भरकम राशि का इस्तेमाल ‘डब्ल्यूटीसी ग्रुप’ (WTC Group) नाम की अपनी नई कंपनी खड़ी करने के लिए किया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि डब्ल्यूटीसी ग्रुप ने हरियाणा के फरीदाबाद में बिना किसी अनिवार्य DTCP लाइसेंस या रेरा (RERA) पंजीकरण के, कृषि भूमि पर आवासीय प्लॉट बेचने शुरू कर दिए थे।

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जब विश्वेंद्र सिंह की शिकायतों के बाद नियामक संस्थाओं ने डेवलपर के खिलाफ जांच और कार्रवाई शुरू की, तो सिंह का आरोप है कि उन्हें चुप कराने के लिए कंपनी ने चौतरफा कानूनी हमला बोल दिया।

ट्विटर कैंपेन और चौतरफा कानूनी हमला

विवाद की तात्कालिक वजह एक ऑनलाइन अभियान बना। कंपनी द्वारा अगस्त 2021 में हुमहामा के सेजूर होटल (Sejour Hotel) में एक इन्वेस्टमेंट इवेंट आयोजित किया गया था। इसके बाद, 12 सितंबर 2021 को विश्वेंद्र सिंह ने ट्विटर पर एक ट्रेंड चलाया, जिसका शीर्षक था— “Anti India WTC – TALIBAN – ACT”। डेवलपर कंपनी ने इस सोशल मीडिया ट्रेंड को अपनी छवि खराब करने का सुनियोजित प्रयास बताया।

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इस सोशल मीडिया कैंपेन को आधार बनाकर सिंह के खिलाफ श्रीनगर, बडगाम और नई दिल्ली में तीन अलग-अलग आपराधिक शिकायतें दर्ज करा दी गईं।

‘फोरम शॉपिंग’ और अदालतों को अंधेरे में रखने का खेल

अदालत में विश्वेंद्र सिंह का प्रतिनिधित्व कर रहे अधिवक्ताओं विकास मलिक और मुश्ताक अहमद डार ने दलील दी कि शिकायतकर्ता कंपनी ने जानबूझकर ‘फोरम शॉपिंग’ (अपनी मर्जी के मुताबिक फैसला पाने के लिए अलग-अलग अदालतों का रुख करना) का सहारा लिया। वकीलों ने खुलासा किया कि शिकायतकर्ता ने अदालतों से पिछली कानूनी कार्यवाहियों की जानकारी जानबूझकर छिपाई। उन्होंने बडगाम में मामला दर्ज कराते समय श्रीनगर की कार्यवाही को गुप्त रखा और जब दिल्ली में तीसरी शिकायत दर्ज कराई, तो जम्मू-कश्मीर की दोनों शिकायतों का कोई जिक्र नहीं किया।

बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि यह बहु-क्षेत्रीय प्रहार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 20(2) और अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले दोहरे दंड (Double Jeopardy) के संरक्षण का स्पष्ट उल्लंघन है। इसके अलावा, दिल्ली निवासी होने के बावजूद सिंह को बार-बार कश्मीर बुलाकर प्रताड़ित किया जा रहा था और उनका पीछा भी किया जा रहा था।

हाई कोर्ट ने बचाव पक्ष की इस दलील को सही माना। अदालत ने कहा कि एक ही सोशल मीडिया पोस्ट के लिए अलग-अलग शहरों में शिकायतें दर्ज कराना केवल आरोपी को मानसिक और आर्थिक रूप से तोड़ने का जरिया था, जो न्यायिक प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग है।

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राज्य सरकार की दलीलें खारिज

सुनवाई के दौरान राज्य की ओर से पेश डिप्टी एडवोकेट जनरल विक्रमदीप सिंह ने एफआईआर दर्ज किए जाने का पुरजोर बचाव किया था। सरकार का तर्क था कि एक ही कृत्य से कई अलग-अलग कानूनी अपराध बन सकते हैं। उनके अनुसार, श्रीनगर की शिकायत मानहानि से जुड़ी थी, जबकि बडगाम की एफआईआर धोखाधड़ी (forgery) और सार्वजनिक उपद्रव (public mischief) के तहत दर्ज की गई थी, इसलिए दोहरे दंड का सिद्धांत यहाँ लागू नहीं होता।

सरकारी वकील ने यह भी आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता ने जांच में सहयोग नहीं किया और कंपनी के खिलाफ “देश-विरोधी” नैरेटिव का उपयोग किया।

हालांकि, न्यायमूर्ति चौधरी ने सरकार की इन तमाम दलीलों को खारिज कर दिया। अदालत ने दोहराया कि एक ही घटना के तथ्यों को मनमर्जी से बांटकर कई अलग-अलग शिकायतें नहीं चलाई जा सकतीं। यह स्पष्ट मानते हुए कि बडगाम की एफआईआर किसी वास्तविक अपराध की जांच के लिए नहीं, बल्कि केवल याचिकाकर्ता को परेशान करने और कॉरपोरेट प्रतिशोध को साधने के लिए दर्ज की गई थी, अदालत ने इस पूरी कार्यवाही को रद्द कर दिया।

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