सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण फैसले में एक श्रीलंकाई नागरिक की सजा और दोषसिद्धि को पूरी तरह से निरस्त कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष यह स्थापित करने में पूरी तरह नाकाम रहा कि वह व्यक्ति ही 2015 के गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) मामले का फरार आरोपी था। सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की पीठ, जिसमें जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विजय बिश्नोई शामिल थे, ने निर्णय दिया कि पासपोर्ट में ‘रंजन’ नाम से दर्ज इस अपीलकर्ता को पहचान की गलतफहमी (mistaken identity) के कारण झूठा फंसाया गया था। कोर्ट ने त्रिची, तमिलनाडु के स्पेशल कैंप से उसकी तत्काल रिहाई का आदेश देते हुए उसे स्विट्जरलैंड जाने की अपनी कानूनी प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की खुली छूट दी है।
मामले की पृष्ठभूमि
अपीलकर्ता रंजन एक श्रीलंकाई नागरिक है, जो वर्ष 2009 में अपनी पत्नी अर्चना और बेटे पावलन के साथ वैध पासपोर्ट और टूरिस्ट वीजा पर भारत आया था। भारत आने से पहले उसे श्रीलंकाई कानून प्रवर्तन एजेंसियों से बेदाग आपराधिक इतिहास का अनापत्ति प्रमाण पत्र भी मिला था। चेन्नई पहुंचने पर, इस परिवार ने खुद को गैर-कैंप शरणार्थी के रूप में चेन्नई के शंकर नगर पुलिस स्टेशन में पंजीकृत कराया था। बाद में वर्ष 2012 में, उन्होंने त्रिची के के.के. नगर पुलिस स्टेशन में अपना पंजीकरण स्थानांतरित करा लिया और वहां एक दशक से अधिक समय तक बिना किसी शिकायत या आपराधिक आचरण के शांतिपूर्वक रहे।
इस दौरान, वर्ष 2014 में अपीलकर्ता की पत्नी और बेटे को स्विट्जरलैंड का वीजा मिल गया, जहां उन्होंने शरण ली और बाद में उन्हें वहां की नागरिकता भी मिल गई। रंजन ने भी अपनी पत्नी के माध्यम से स्विस वीजा के लिए आवेदन किया, जिसे नई दिल्ली स्थित स्विस दूतावास ने 14 जुलाई 2021 को मंजूरी दे दी। हालांकि, इस वीजा के निष्पादन के लिए स्थानीय तमिलनाडु पुलिस से अनापत्ति प्रमाण पत्र (क्लीयरेंस) प्राप्त करना अनिवार्य था।
रंजन जब इस पुलिस क्लीयरेंस का इंतजार कर रहा था, तभी 16 दिसंबर 2021 को रामनाथपुरम के क्यू ब्रांच के पुलिस अधिकारियों ने उसे गिरफ्तार कर लिया। पुलिस का दावा था कि उसका असली नाम “श्री उर्फ रंजन” है और वह वर्ष 2015 के बहुचर्चित एफआईआर क्राइम नंबर 1/2015 का वांछित फरार आरोपी “श्री” (A-5) है।
वर्ष 2015 में दर्ज इस एफआईआर के अनुसार, पुलिस को खुफिया जानकारी मिली थी कि त्रिची की एक बेकरी में प्रतिबंधित संगठन ‘लिबरेशन टाइगर ऑफ तमिल ईलम’ (LTTE) को पुनर्जीवित करने की साजिश रची जा रही थी। आरोप लगाया गया था कि फरार आरोपी “श्री” (A-5) ने कृष्णकुमार (A-1) को 75 साइनाइड कैप्सूल और 60 grams जीपीएस-4 रसायन सौंपा था, ताकि इन्हें अवैध नाव के जरिए श्रीलंका ले जाकर विरोधी तमिल नेताओं को खत्म किया जा सके। इस मामले के अन्य आरोपी पूर्व में ही गिरफ्तार कर 2018 में दोषी ठहराए जा चुके थे। “श्री” के फरार होने के कारण उसका मुकदमा अलग कर S.C. No. 2/2018 के तहत चलाया जा रहा था।
गिरफ्तारी के बाद, रामनाथपुरम के प्रधान सत्र न्यायाधीश (ट्रायल कोर्ट) ने 18 जुलाई 2024 को रंजन को दोषी ठहराते हुए यूएपीए, आईपीसी, फॉरेनर्स एक्ट और पासपोर्ट एक्ट के तहत पांच साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ ने भी 3 अप्रैल 2025 को मार्शल कोर्ट के इस फैसले पर अपनी मुहर लगा दी थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई।
पक्षकारों की दलीलें
अपीलकर्ता की दलीलें
अपीलकर्ता के वकील ने पुरजोर शब्दों में कहा कि यह पूरी तरह से गलत पहचान (false implication) का मामला है। रंजन कभी भी “श्री” नाम से नहीं जाना जाता था, और उसके सभी आधिकारिक दस्तावेजों—जैसे कि उसका श्रीलंकाई पासपोर्ट और भारत सरकार द्वारा जारी वीजा—में उसका नाम केवल “रंजन” दर्ज है। वकील ने दलील दी कि अपीलकर्ता त्रिची में पुलिस की जानकारी में पंजीकृत पते पर खुलेआम रह रहा था और अपने परिवार के पास स्विट्जरलैंड जाने के लिए वैध तरीके से पुलिस क्लीयरेंस का इंतजार कर रहा था।
बचाव पक्ष ने अभियोजन पक्ष के दो प्रमुख गवाहों, बालचंद्रन (PW-8) और कुमार उर्फ धर्म कुमार (PW-9) की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठाए। वकील ने स्पष्ट किया कि ये दोनों गवाह खुद फर्जी दस्तावेजों के आधार पर भारत में अवैध रूप से रह रहे श्रीलंकाई नागरिक थे। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि आरोपी “श्री” का नाम “रंजन” होने की बात पुलिस ने इस मुकदमे से पहले कभी उजागर नहीं की थी, और न ही गिरफ्तारी के बाद रंजन की कोई टेस्ट identificación परेड (TIP) कराई गई।
प्रतिवादी (राज्य) की दलीलें
इसके विपरीत, तमिलनाडु राज्य सरकार के वकील ने अपील का कड़ा विरोध किया। उन्होंने दलील दी कि अपीलकर्ता प्रतिबंधित संगठन एलटीटीई को पुनर्जीवित करने की राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में शामिल था और उसने कृष्णकुमार (A-1) को साइनाइड कैप्सूल की आपूर्ति की थी। राज्य सरकार के अनुसार, गवाहों (PW-8 और PW-9) के बयानों में जो भी विसंगतियां थीं, वे मामूली थीं और सात साल के लंबे अंतराल के कारण गवाहों के बयानों में ऐसा होना स्वाभाविक है।
सुप्रीम कोर्ट का कानूनी विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने मामले के सभी दस्तावेजों और गवाहों के बयानों का गहन अध्ययन किया। अदालत के सामने मुख्य कानूनी सवाल यह था कि क्या अपीलकर्ता रंजन को वाकई पहचान की गलतफहमी के आधार पर फंसाया गया था।
जस्टिस संदीप मेहता द्वारा पीठ की ओर से लिखे गए फैसले में निचली अदालतों के निष्कर्षों को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा:
“हमारा यह दृढ़ मत है कि नीचे की अदालतें यह मानने में पूरी तरह से गलत थीं कि अपीलकर्ता-रंजन और फरार आरोपी ‘श्री’ (A-5) एक ही व्यक्ति हैं। इस त्रुटिपूर्ण पहचान पर आधारित सजा कानून की नजर में टिकने योग्य नहीं है।”
सुप्रीम कोर्ट ने अभियोजन पक्ष की थ्योरी में कई गंभीर कानूनी और तथ्यात्मक खामियों को रेखांकित किया:
1. मुख्य गवाहों का संदिग्ध चरित्र और भूमिका
कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष के मुख्य गवाह, PW-8 and PW-9, बिना भारतीय नागरिकता के अवैध रूप से भारत में रह रहे थे और फर्जी दस्तावेजों के जरिए उन्होंने आधार कार्ड, वोटर आईडी और पैन कार्ड हासिल किए थे। कोर्ट ने हैरानी जताई कि जांच एजेंसी ने इन गवाहों के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई क्यों नहीं की।
इसके अलावा, कोर्ट ने उनके आचरण को बेहद अप्राकृतिक माना। दोनों गवाहों ने स्वीकार किया कि उन्होंने कृष्णकुमार (A-1) को पनाह दी और कथित तौर पर अपनी आंखों के सामने साइनाइड कैप्सूल सौंपे जाते देखा, फिर भी वे वर्षों तक पूरी तरह शांत रहे और पुलिस को कोई सूचना नहीं दी।
2. बयान में बड़ा सुधार (Material Improvement)
कोर्ट ने इस बात पर विशेष ध्यान दिया कि PW-8 और PW-9 ने पूर्व में चले सह-आरोपियों के मुकदमों (2016 और 2018) में कभी भी फरार आरोपी “श्री” का दूसरा नाम “रंजन” होने का जिक्र नहीं किया था। कोर्ट ने कहा:
“इतने वर्षों के बाद इस नाम (रंजन) को पहली बार पेश करना इनके बयानों को अत्यधिक संदिग्ध बनाता है। पूर्व की कार्यवाहियों में इनकी खामोशी और अब किया गया यह खुलासा महज याददाश्त की कमजोरी नहीं बल्कि बयानों में किया गया एक बड़ा सुधार (material improvement) है।”
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट द्वारा अबूथगीर बनाम राज्य (2009) 17 SCC 208 मामले के आधार पर दी गई कानूनी दलीलों को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि वह नजीर गवाहों से जांच के दौरान देरी से पूछताछ पर लागू होती है, न कि उन गवाहों पर जो पूर्व के बयानों में पूरी तरह मौन रहने के बाद अचानक नया तथ्य जोड़ देते हैं।
3. पड़ोसियों और मकान मालिक के विरोधाभासी बयान
निचली अदालतों ने जिन गवाहों को रंजन की पहचान की पुष्टि करने वाला माना था, सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि उनका बयान अभियोजन के दावों के बिल्कुल विपरीत था। मकान मालिक रसमलार (PW-25) ने साफ तौर पर गवाही दी कि वह केवल “रंजन” नाम के व्यक्ति को जानती थी और उसके मकान में “श्री” नाम का कोई व्यक्ति कभी किराए पर नहीं रहा। पड़ोसियों (PW-17 और PW-18) ने भी पुष्टि की कि वे उसे केवल रंजन के तौर पर जानते थे और उनके बीच केवल सामान्य और पड़ोसी वाले संबंध थे।
4. टीआईपी का अभाव और पूर्व रिकॉर्ड में नाम न होना
जांच अधिकारी (PW-29) ने खुद स्वीकार किया कि 2021 में रंजन की गिरफ्तारी से पहले किसी भी एफआईआर, चार्जशीट या पुलिस दस्तावेज में रंजन का नाम दर्ज नहीं था। सुप्रीम कोर्ट ने विश्वनाथ बनाम कर्नाटक राज्य (2024 INSC 482) के फैसले का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि विश्वसनीय स्वतंत्र पहचान या टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड (TIP) के अभाव में किसी आरोपी को केवल अदालत में पहचान लिए जाने के आधार पर दोषी ठहराना असुरक्षित है।
5. अपीलकर्ता का सामान्य और बेदाग आचरण
कोर्ट ने रंजन के आचरण को एक सामान्य और निर्दोष नागरिक की तरह पाया। अदालत ने टिप्पणी की:
“यूएपीए जैसे गंभीर मामले का कोई फरार आरोपी कभी भी विदेशी दूतावास में वीजा के लिए आवेदन करने और उसी स्थानीय पुलिस स्टेशन से चरित्र प्रमाण पत्र (क्लीयरेंस) मांगने की हिम्मत नहीं करेगा जिसके अधिकार क्षेत्र में वह कथित तौर पर झूठी पहचान बनाकर रह रहा था। यह आचरण अभियोजन पक्ष के दावों के बिल्कुल विपरीत है और एक निर्दोष व्यक्ति के स्वाभाविक आचरण के अनुकूल है।”
जांच एजेंसी की मंशा पर गंभीर टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने कहा:
“प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि बालचंद्रन (PW-8) और कुमार उर्फ धर्म कुमार (PW-9), जो खुद पुलिस की जांच के घेरे में थे, उन्हें समझौते (bargain) के तहत अपीलकर्ता को फरार आरोपी ‘श्री’ (A-5) के रूप में फंसाने के लिए राजी किया गया ताकि इस मामले को बंद (closure) किया जा सके।”
न्यायालय का अंतिम निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने रंजन की अपील को स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट के 18 जुलाई 2024 के दोषसिद्धि के फैसले और हाईकोर्ट के 3 अप्रैल 2025 के निर्णय को पूरी तरह से रद्द कर दिया।
अपीलकर्ता को सभी आरोपों से सम्मानपूर्वक बरी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया:
“अपीलकर्ता को आरोपों से बरी किया जाता है और उसे त्रिची के स्पेशल कैंप से तुरंत रिहा किया जाए। वह कानून के अनुसार स्विट्जरलैंड जाने/स्थानांतरित होने के अपने अनुरोध को आगे बढ़ाने के लिए स्वतंत्र होगा।”
मामले का विवरण
- मामले का शीर्षक: रंजन बनाम राज्य, प्रतिनिधि – पुलिस निरीक्षक, क्यू ब्रांच, रामनाथपुरम, तमिलनाडु
- मामला संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 5141/2025 – 2026 INSC 516
- पीठ: जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विजय बिश्नोई
- दिनांक: 20 मई, 2026

