कर्नाटक हाईकोर्ट ने अमेज़न सेलर सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड (Amazon Seller Services Private Limited) के खिलाफ दर्ज एक प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) में आगे की सभी जांच पर अंतरिम रोक लगा दी है। यह मामला दिवंगत पत्रकार रवि बेलागेरे द्वारा लिखित पुस्तक ‘हेल होगु कारणा’ (Hell Hogu Karana) को अमेज़न के प्लेटफॉर्म पर मूल कीमत से काफी कम कीमत पर बेचने से संबंधित कॉपीराइट उल्लंघन के आरोपों से जुड़ा है।
हाईकोर्ट की अवकाशकालीन पीठ के जस्टिस के. वी. अरविंद ने प्रतिवादियों को नोटिस जारी करते हुए FIR की सभी कार्यवाही पर अंतरिम रोक लगा दी। मामले की अगली सुनवाई जून के तीसरे सप्ताह में होगी।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद सुब्रमण्यपुरा पुलिस स्टेशन में 4 फरवरी को दर्ज कराई गई एक आपराधिक शिकायत से शुरू हुआ था। यह शिकायत दिवंगत लेखक और पत्रकार रवि बेलागेरे की बेटी भावना बेलागेरे ने दर्ज कराई थी। शिकायत के अनुसार, पुस्तक ‘हेल होगु कारणा’ उनके पिता द्वारा लिखी गई थी और इसका प्रकाशन शिकायतकर्ता की ही संस्था ‘भावना प्रकाशना’ द्वारा किया गया था।
यह पुस्तक पहली बार सितंबर 2003 में प्रकाशित हुई थी और अप्रैल 2005 में इसका 31वां संस्करण छपा था। शिकायतकर्ता का दावा है कि इस पुस्तक के संपूर्ण कॉपीराइट उनकी संस्था के पास सुरक्षित हैं, और पुस्तक को छापने, बेचने तथा वितरित करने का एकमात्र कानूनी अधिकार उनके पास है।
शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि उन्हें हाल ही में पता चला कि अमेज़न, फ्लिपकार्ट और मीशो जैसी कुछ कंपनियां तथा व्यक्ति अवैध रूप से उनके ऐप के जरिए इस पुस्तक को इसकी मूल कीमत (वर्तमान में 350 रुपये) से कम यानी केवल 149 रुपये में बेच रहे थे। शिकायत में दावा किया गया कि इस “अवैध कृत्य” से प्रकाशक को भारी वित्तीय नुकसान हुआ और लेखक के अधिकारों का भी उल्लंघन हुआ, जो कि कॉपीराइट अधिनियम, 1957 और सूचना प्रौद्योगिकी (IT) अधिनियम का सीधा उल्लंघन है।
पक्षकारों की दलीलें
अमेज़न सेलर सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता संदेश जे. चौटा ने तर्क दिया कि कंपनी को सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 79 के तहत वैधानिक ‘सुरक्षित पनाहगाह’ (safe harbour) का संरक्षण प्राप्त है, क्योंकि वह एक मध्यस्थ (intermediary) है।
वरिष्ठ अधिवक्ता ने प्रस्तुत किया, “अमेज़न जैसे मध्यस्थ के खिलाफ कानूनी कार्यवाही शुरू नहीं की जा सकती। कंपनी केवल विक्रेताओं को अपने प्लेटफॉर्म पर अपने उत्पाद प्रदर्शित करने के लिए मंच प्रदान करती है। यह कंपनी उत्पादों की कीमत तय नहीं करती है और अमेज़न पर लगभग 170 मिलियन (17 करोड़) उत्पाद उपलब्ध हैं।”
चौटा ने आगे कहा कि अमेज़न ने न तो पुस्तक को प्रकाशित किया, न सूचीबद्ध (list) किया, न वितरित किया और न ही इसे बेचा। FIR में लगाए गए आरोपों में अमेज़न की कोई भूमिका नहीं है। उन्होंने दलील दी कि शिकायत में लगाए गए आरोप कॉपीराइट अधिनियम, 1957 की धारा 51 या 63 के तहत कॉपीराइट उल्लंघन का कोई मामला नहीं बनाते हैं।
वरिष्ठ अधिवक्ता ने यह भी रेखांकित किया कि पुलिस ने उन तीसरे पक्ष के वास्तविक विक्रेताओं (third-party sellers) की पहचान या उन पर मुकदमा चलाने के बजाय, सीधे ऑनलाइन मार्केटप्लेस के खिलाफ जांच शुरू कर दी, जिन्होंने पुस्तक को बेचने के लिए सूचीबद्ध किया था।
न्यायालय को यह भी सूचित किया गया कि जैसे ही पुलिस ने अमेज़न को नोटिस जारी किया, कंपनी ने 7 मई को पुलिस के मौखिक निर्देश पर तुरंत उस पुस्तक की लिस्टिंग को हटा दिया। इसके साथ ही, प्लेटफॉर्म पर पुस्तक बेचने वाले तीसरे पक्ष के विक्रेताओं का विवरण भी जांच एजेंसी को सौंप दिया गया।
अदालत का विश्लेषण और निर्णय
दलीलों पर विचार करने के बाद, अवकाशकालीन पीठ ने अमेज़न द्वारा किए गए त्वरित अनुपालन और कानूनन मध्यस्थों को मिलने वाले संरक्षण संबंधी तर्कों को संज्ञान में लिया। अदालत ने कानूनी मुद्दों की समीक्षा पूरी होने तक पुलिस जांच को रोकना उचित समझा।
अपने अंतरिम आदेश में, जस्टिस के. वी. अरविंद ने निर्देश दिया:
“प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया जाए। इस बीच, अगली सुनवाई तक FIR की आगे की कार्यवाही पर रोक रहेगी। मामले को जून के तीसरे सप्ताह में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाए।”

