‘जॉर्ज सोरोस’ के नाम पर तीखी बहस: दिल्ली हाई कोर्ट ने संकट में घिरे NGO CHRI को अपने ही फंड से ₹20 लाख निकालने की दी मंजूरी

देश में गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) पर कड़े होते नियमों के बीच, दिल्ली हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण अंतरिम राहत देते हुए ‘कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव’ (CHRI) को अपने ही बैंक खाते से ₹20 लाख निकालने की अनुमति दे दी है। जस्टिस पुरुषेंद्र कुमार कौरव ने केंद्र सरकार के कड़े विरोध को दरकिनार करते हुए यह आदेश दिया। वित्तीय तंगी से जूझ रही इस संस्था के पास सलाहकारों (कंसल्टेंट्स) को भुगतान करने और दैनिक खर्च चलाने के लिए फंड पूरी तरह खत्म होने की कगार पर थे।

अदालत ने निर्देश दिया है कि निकाली गई इस राशि का उपयोग केवल अनिवार्य और आवर्ती (recurring) खर्चों के लिए किया जाएगा। साथ ही, इस पूरे खर्च का मिलान एक चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) से प्रमाणित कराया जाएगा और अगली सुनवाई में इसका पूरा ब्योरा अदालत के समक्ष प्रस्तुत करना होगा।

‘तिल-तिल कर मौत’ जैसा संकट: क्या है पूरा मामला?

CHRI ने अदालत में एक बेहद जरूरी याचिका दायर कर फंड जारी करने की मांग की थी। इससे पहले, 24 अप्रैल की सुनवाई में एनजीओ की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार ने कोर्ट को आगाह किया था कि 30 जून तक संस्था के घरेलू खाते का पैसा पूरी तरह खत्म हो जाएगा। यदि तुरंत राहत न मिली, तो प्रख्यात न्यायविद् स्वर्गीय सोली सोराबजी द्वारा स्थापित यह संस्था अपने सलाहकारों को भुगतान करने और दैनिक कामकाज चलाने में पूरी तरह असमर्थ हो जाएगी।

CHRI की मुश्किलें इस साल 31 मार्च को तब और बढ़ गईं, जब आयकर विभाग ने उसके ’80G’ रजिस्ट्रेशन का नवीनीकरण करने से इनकार कर दिया। इसके पीछे वजह गृह मंत्रालय द्वारा संस्था का विदेशी अंशदान नियामक अधिनियम (FCRA) लाइसेंस रद्द किया जाना था। 80G स्टेटस खत्म होने से स्थानीय दानदाताओं को मिलने वाली टैक्स छूट बंद हो गई, जिसके परिणामस्वरूप घरेलू चंदा पूरी तरह से रुक गया।

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) चेतन शर्मा ने एक वैकल्पिक रास्ता सुझाया। उन्होंने कहा कि एनजीओ अपने कर्मचारियों का ब्योरा सरकार को सौंप दे, जिसके बाद सरकार सीधे उनके खातों में वेतन ट्रांसफर कर देगी। उन्होंने ‘साउथ एशिया फाउंडेशन’ (SAF) का उदाहरण दिया, जिसने एफसीआरए लाइसेंस रद्द होने के बाद इस तरह की व्यवस्था को स्वीकार किया था।

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लेकिन अरविंद दातार ने सरकार के इस प्रस्ताव का पुरजोर विरोध किया। उन्होंने इसे प्रशासनिक देरी का हवाला देते हुए “तिल-तिल कर मौत” (death by a thousand cuts) करार दिया।

दातार ने तर्क दिया, “अगर हम सरकार से अनुमति और वेरिफिकेशन का इंतजार करेंगे, तो पूरी प्रक्रिया जुलाई तक खिंच जाएगी, जबकि हमारे पास केवल 30 जून तक का ही समय है।” उन्होंने स्पष्ट किया कि CHRI में फुल-टाइम स्टाफ नहीं है, बल्कि कॉन्ट्रैक्ट पर आधारित सलाहकार हैं जो प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार करते हैं।

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दातार ने कहा, “हमारे पास ₹4 करोड़ की फिक्स्ड डिपॉजिट जमा है। हमें अपने ही इस पैसे से खर्च करने की अनुमति दी जाए, जिसका हम सीए प्रमाणित सर्टिफिकेट सरकार और कोर्ट को सौंप देंगे।”

‘जॉर्ज सोरोस’ के नाम पर कोर्ट रूम में तीखी बहस

सुनवाई के दौरान यह कानूनी बहस उस समय राजनीतिक रूप से गरमा गई जब जस्टिस कौरव ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि CHRI जैसी संस्थाएं काफी लंबे समय से समाज में काम कर रही हैं।

इस टिप्पणी पर तीखा रुख अपनाते हुए ASG चेतन शर्मा ने कहा, “ये संस्थाएं उन क्षेत्रों में काम कर रही हैं जहां इन्हें नहीं करना चाहिए। आज भी ये ऐसे लोगों के साथ जुड़ी हुई हैं जिनका नाम मैं यहां नहीं ले सकता। अगर मैं उनका नाम लूं, तो वे जॉर्ज सोरोस हैं।”

हालांकि, अदालत ने केंद्र सरकार की इस दलील पर असहमति जताई। जस्टिस कौरव ने स्पष्ट किया कि एनजीओ भारत सरकार से कोई वित्तीय सहायता नहीं मांग रहा है।

अदालत ने कहा, “यह याचिकाकर्ता का अपना खुद का पैसा है। हम सरकार को अपनी जेब से ₹25 लाख जारी करने का निर्देश नहीं दे रहे हैं। ऐसे में ₹25 लाख (एनजीओ द्वारा मांगी गई मूल राशि) की यह मांग अनुचित नहीं लगती।” अंततः कोर्ट ने अंतरिम राहत के तौर पर ₹20 लाख की राशि तुरंत जारी करने का आदेश दिया।

भारतीय एनजीओ जगत पर गहराता संकट

अदालत में हुई यह बहस देश में नागरिक समाज संगठनों (civil society organizations) पर कसते सरकारी शिकंजे की बड़ी तस्वीर को भी उजागर करती है। अरविंद दातार ने कोर्ट रूम में अन्य वैश्विक थिंक टैंक की दुर्दशा का भी उल्लेख किया।

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उन्होंने ‘सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च’ (CPR) का उदाहरण देते हुए कहा, “देश के सभी एनजीओ इस कार्रवाई से प्रभावित हुए हैं। सीपीआर दुनिया के शीर्ष 20 पॉलिसी रिसर्च थिंक टैंक में शामिल एकमात्र भारतीय संस्थान था, लेकिन आज वहां सिर्फ चार लोग काम कर रहे हैं। कोर्ट को इस मामले में मानवीय दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।”

CHRI और गृह मंत्रालय (MHA) के बीच कानूनी खींचतान का इतिहास कुछ इस तरह रहा है:

  • अप्रैल 2022: गृह मंत्रालय ने पहली बार CHRI का FCRA पंजीकरण रद्द किया।
  • जुलाई 2024: दिल्ली हाई कोर्ट ने इस पहले रद्दीकरण आदेश को खारिज कर दिया।
  • सितंबर 2024: गृह मंत्रालय ने दूसरी बार संस्था का पंजीकरण रद्द कर दिया।
  • जनवरी 2025: CHRI ने इस दूसरे रद्दीकरण को हाई कोर्ट में चुनौती दी, जिस पर मुख्य सुनवाई अभी लंबित है।

भले ही एफसीआरए रद्दीकरण का मुख्य मामला अदालत में लंबित है, लेकिन मंगलवार के इस अंतरिम फैसले ने फिलहाल इस ऐतिहासिक संस्था को बंद होने से बचा लिया है।

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