पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा है कि कोरोना महामारी के दौर में किसी मरीज को निजी अस्पताल में भर्ती कराना कोई “शौक या लक्ज़री” नहीं, बल्कि एक आपातकालीन मजबूरी थी। कोर्ट ने सरकार के उस रवैये को “तर्कहीन” करार दिया, जिसके तहत एक सेवानिवृत्त कर्मचारी के मेडिकल क्लेम से ₹1.86 लाख की कटौती कर ली गई थी। जस्टिस कुलदीप तिवारी ने अधिकारियों को आदेश दिया है कि वे बकाया राशि का पूरा भुगतान आठ सप्ताह के भीतर सुनिश्चित करें।
लॉकडाउन का वो खौफनाक दौर और एक बुज़ुर्ग की बेबसी
यह मामला अगस्त 2020 का है, जब पूरा देश कोरोना वायरस की विनाशकारी लहर और सख्त राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन से जूझ रहा था। चारों तरफ पाबंदियां थीं और सरकारी स्वास्थ्य ढांचा पूरी तरह चरमरा चुका था। अस्पतालों में बेड और त्वरित इलाज मिलना लगभग असंभव हो रहा था।
इसी संकट के बीच, 22 अगस्त 2020 को पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट से सेवानिवृत्त अधीक्षक (सुपरिंटेंडेंट) विद्या प्रकाश गुप्ता की पत्नी अचानक बाथरूम में गिर गईं। कई पुरानी बीमारियों से जूझ रहीं गुप्ता की पत्नी की जांघ की हड्डी (लेफ्ट फीमर) टूट गई, जिसके लिए तुरंत जटिल सर्जरी की जरूरत थी।
गुप्ता उन्हें लेकर तुरंत पास के एक स्थानीय अस्पताल पहुंचे, जहां उन्हें प्राथमिक उपचार तो मिल गया, लेकिन वहां जांघ की जटिल सर्जरी के लिए जरूरी संसाधन मौजूद नहीं थे। महामारी के भारी दबाव के कारण जब बड़े सरकारी केंद्रों में भी तुरंत इलाज मिलना नामुमकिन लग रहा था, तब गुप्ता के पास अपनी पत्नी की जान बचाने के लिए उन्हें एक निजी अस्पताल में भर्ती कराने के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचा। वहां उनका 13 दिनों तक इलाज चला, जिसमें कुल ₹4.43 लाख का खर्च आया।
हक की लड़ाई: नियमों की आड़ में काटी गई रकम
पत्नी के स्वस्थ होने के बाद जब विद्या प्रकाश गुप्ता ने इलाज के सभी दस्तावेजों, बिलों और पर्चों के साथ चिकित्सा प्रतिपूर्ति (Medical Reimbursement) के लिए आवेदन किया, तो उन्हें निराशा हाथ लगी। साल 2021 में सरकारी अधिकारियों ने नियमों का हवाला देते हुए ₹4.43 लाख के कुल बिल में से केवल ₹2.57 लाख की ही मंजूरी दी और ₹1.86 लाख काट लिए।
साल 1997 में सेवानिवृत्त हो चुके गुप्ता ने इस मनमानी कटौती के खिलाफ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
अदालत में याचिकाकर्ता के वकील विनीत सोनी ने पुरजोर दलील दी कि यह इलाज किसी निजी पसंद या ऐशो-आराम के लिए नहीं, बल्कि आपातकालीन परिस्थितियों के कारण निजी अस्पताल में कराया गया था। उन्होंने कहा कि एक सरकारी कर्मचारी को जीवनभर चिकित्सा प्रतिपूर्ति पाने का वैध अधिकार है और सरकार नियमों की संकीर्ण व्याख्या करके इस अधिकार को मनमाने ढंग से सीमित नहीं कर सकती।
दूसरी तरफ, राज्य सरकार के वकील मुनीश कपिला ने इस कटौती का बचाव करते हुए तर्क दिया कि सरकार की चिकित्सा प्रतिपूर्ति नीति नियमों के तहत ही काम करती है और अधिकारियों ने स्थापित नियमों के दायरे में रहकर ही बिल को मंजूरी दी थी।
‘जहां अधिकार है, वहां उपचार भी है’
जस्टिस कुलदीप तिवारी ने सरकार के इस कड़े रुख को पूरी तरह खारिज कर दिया। अदालत ने रेखांकित किया कि किसी भी चिकित्सा प्रतिपूर्ति नीति का प्राथमिक उद्देश्य दावों को व्यवस्थित करना होता है, न कि कर्मचारियों के पहले से मौजूद अधिकारों को छीनना। कोर्ट ने कहा कि यह नीति महामारी जैसी असाधारण और जानलेवा परिस्थितियों को ध्यान में रखने में पूरी तरह विफल रही।
अपने फैसले को मजबूती देने के लिए हाईकोर्ट ने प्रसिद्ध कानूनी सिद्धांत ‘ubi jus ibi remedium’ (जहां अधिकार है, वहां उपचार है) का हवाला दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून में किसी भी गलत फैसले को बिना न्याय के नहीं छोड़ा जा सकता और अदालतें नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करके ही कानून के शासन में जनता का विश्वास बनाए रख सकती हैं।
अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट लिखा, “यह कोर्ट इस निष्कर्ष पर पहुंची है कि याचिकाकर्ता ने अपनी पत्नी को असाधारण परिस्थितियों के कारण ही निजी अस्पताल में स्थानांतरित किया था, न कि किसी इच्छा या लक्ज़री के लिए।” इस टिप्पणी के साथ कोर्ट ने रिटायर्ड कर्मचारी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए सरकार को बकाया राशि जारी करने का निर्देश दिया।

