एक महत्वपूर्ण फैसले में आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जालसाजी और धोखाधड़ी के आरोपी अपनी पहचान छिपाने के लिए ‘निजता के अधिकार’ (प्राइवेसी) को ढाल नहीं बना सकते।
हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश धीरज सिंह ठाकुर (Chief Justice Lisa Gill)* और जस्टिस आर रघुनंदन राव की खंडपीठ ने भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (UIDAI) को आदेश दिया है कि वह जमीन धोखाधड़ी से जुड़े एक मामले में पुलिस जांचकर्ताओं को कानून के तहत स्वीकृत आधार डेटा तीन सप्ताह के भीतर सौंपे। कोर्ट का यह फैसला 7 मई का है, जिसने एकल पीठ के पुराने निर्णय को पलटते हुए निष्पक्ष जांच का रास्ता साफ कर दिया है।
खंडपीठ ने अपने आदेश में सख्त टिप्पणी करते हुए कहा, “इस मामले में, जिस व्यक्ति पर निजी फायदे के लिए जालसाजी का आरोप है, उसे महज प्राइवेसी की सुरक्षा के नाम पर कानून के शिकंजे से बचने की अनुमति नहीं दी जा सकती।”
फर्जीवाड़े की पूरी कहानी: जमीन हड़पने का खेल
यह पूरा विवाद साल 2021 से शुरू होता है। आरोप है कि एक जालसाज ने असली मालिक (याचिकाकर्ता) के नाम पर फर्जी आधार कार्ड तैयार किया और खुद को असली मालिक बताकर उसकी जमीन की दो फर्जी सेल डीड (रजिस्ट्री) करवा लीं।
जब असली मालिक को इस धोखाधड़ी की भनक लगी, तो यह मामला तीन अलग-अलग कानूनी मोर्चों पर पहुंच गया:
- आपराधिक जांच: पहचान की चोरी और जालसाजी को लेकर पुलिस में एफआईआर दर्ज कराई गई।
- सिविल कोर्ट में चुनौती: फर्जी सेल डीड को कानूनी रूप से अमान्य घोषित कराने के लिए सिविल मुकदमा दायर किया गया।
- कब्जे की सुरक्षा: सिविल कोर्ट ने प्रतिवादियों (प्रतिवादी संख्या 1 से 3) पर याचिकाकर्ता की जमीन पर किसी भी तरह के हस्तक्षेप करने पर रोक (अंतरिम निषेधाज्ञा) लगा दी।
- रजिस्ट्री रद्द: याचिकाकर्ता के बेटे की शिकायत पर त्वरित कार्रवाई करते हुए विशाखापत्तनम के जिला रजिस्ट्रार और पंजीकरण कार्यालय ने दोनों फर्जी सेल डीड को रद्द कर दिया।
पुलिस जांच को पुख्ता करने के लिए याचिकाकर्ता ने UIDAI से उस फर्जी आधार कार्ड की बायोमेट्रिक और रजिस्ट्रेशन से जुड़ी जानकारी मांगी थी, जिसे प्राधिकरण ने देने से साफ इनकार कर दिया था।
RTI एक्ट बनाम निजता का अधिकार: क्या था विवाद?
शुरुआत में UIDAI ने सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम, 2005 की धारा 8(1)(j) का हवाला देते हुए डेटा देने से इनकार किया था। यह धारा ऐसी व्यक्तिगत जानकारी को सार्वजनिक करने से छूट देती है जिसका किसी सार्वजनिक गतिविधि या व्यापक लोकहित से संबंध नहीं होता, या जिससे किसी की प्राइवेसी का अवांछित हनन होता हो।
इसके बाद, एकल न्यायाधीश की पीठ ने भी पीड़ित की याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि आधार अधिनियम, 2016 की धारा 33(1) के तहत इस तरह की जानकारी केवल हाई कोर्ट या उससे उच्च स्तर के न्यायालय के आदेश पर ही दी जा सकती है, या फिर मामला राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा होना चाहिए। एकल पीठ का यह भी तर्क था कि चूंकि पुलिस कमिश्नर ने स्वयं इसके लिए आवेदन नहीं किया है, इसलिए कोर्ट UIDAI को सीधे निर्देश नहीं दे सकता।
हाई कोर्ट का रुख: प्राइवेसी से ऊपर है न्याय
जब मामला खंडपीठ के सामने अपील के रूप में पहुंचा, तो कोर्ट ने एकल पीठ के सख्त रुख से असहमति जताई। याचिकाकर्ता की पैरवी कर रही वकील जी झांसी ने अदालत में दलील दी कि अगर UIDAI से संदिग्ध आधार की सही जानकारी नहीं मिली, तो पुलिस की पूरी जांच ठप हो जाएगी। उन्होंने जोर देकर कहा कि गंभीर अपराधियों को ‘प्राइवेसी’ की आड़ लेकर कानून से भागने का मौका नहीं मिलना चाहिए।
अदालत ने इस तर्क को स्वीकार किया और स्पष्ट किया कि आधार अधिनियम डेटा साझा करने पर पूरी तरह से रोक नहीं लगाता।
अदालत ने कहा, “जैसा कि आधार अधिनियम, 2016 की धारा 33(1) के प्रावधानों से स्पष्ट है, ऐसी जानकारी साझा करने पर कोई पूर्ण प्रतिबंध नहीं है। हालांकि, कानून के दायरे में आने वाली जानकारी को जरूरी सुरक्षा मानकों का पालन करते हुए ही जारी किया जा सकता है।”
इसके साथ ही, अदालत ने मामले के एक व्यावहारिक पहलू को भी रेखांकित किया। चूंकि वह फर्जी आधार कार्ड खुद असली पीड़ित के ही नाम पर जारी किया गया था, इसलिए “यहां प्राइवेसी के हनन का सवाल ही नहीं उठता।”
UIDAI को तीन सप्ताह के भीतर जांच अधिकारियों को डेटा सौंपने का निर्देश देकर आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने एक बड़ा नजीर पेश की है: कानून का उल्लंघन करने वालों के लिए प्राइवेसी कभी भी सुरक्षा कवच नहीं बन सकती।

