पंजीकृत सेल डीड पहले के एग्रीमेंट टू सेल पर प्रभावी होगी; बकाया राशि की वसूली का मुकदमा एविडेंस एक्ट की धारा 91 और 92 के तहत वर्जित: दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि पक्षों के बीच एक बार पंजीकृत सेल डीड (Registered Sale Deed) निष्पादित हो जाती है और उसमें बिक्री की एक निश्चित राशि तय कर दी जाती है, तो पहले के किसी एग्रीमेंट टू सेल (Agreement to Sell) के आधार पर बकाया राशि की वसूली के लिए मुकदमा दायर नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि इस तरह का दावा भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (Indian Evidence Act) की धारा 91 और 92 के तहत मौखिक साक्ष्य पर लगे प्रतिबंध के आलोक में विचारणीय नहीं है और यह भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 (Indian Contract Act) की धारा 62 के तहत अनुबंध के नवीनीकरण (Novation of Contract) को दर्शाता है।

यह निर्णय न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा की एकल-सदस्यीय पीठ द्वारा सुनाया गया। पीठ ने सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) की धारा 96 के साथ पठित ऑर्डर XLI नियम 1 के तहत दायर एक नियमित प्रथम अपील (Regular First Appeal) को खारिज कर दिया। इस अपील के माध्यम से निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें सीपीसी के ऑर्डर VII नियम 11 के तहत वसूली के मुकदमे को खारिज कर दिया गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

अपीलकर्ता/वादी, श्री नरेंद्र कुमार गोला, वैशाली, गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश में स्थित संपत्ति (प्लॉट संख्या 4, सेक्टर 4) के पूर्ण मालिक थे। उन्होंने 14 अप्रैल 2019 को प्रतिवादियों (क्षितिज गोयल और नीलांश गोयल) के साथ इस संपत्ति को 1,20,00,000 रुपये (1.20 करोड़ रुपये) में बेचने के लिए एक ‘एग्रीमेंट टू सेल’ (बिक्री का समझौता) किया।

इसके बाद, 23 सितंबर 2019 को दोनों पक्षों के बीच एक पंजीकृत सेल डीड (बिक्री विलेख) निष्पादित की गई। इस पंजीकृत सेल डीड में संपत्ति की बिक्री राशि 66,12,000 रुपये दर्शाई गई थी। वादी का आरोप था कि प्रतिवादियों ने चालाकी से उन्हें सेल डीड में यह कम राशि दिखाने के लिए मना लिया ताकि वे टैक्स बचा सकें। वादी के अनुसार, वे प्रतिवादियों के दुर्भावनापूर्ण इरादे को भांप नहीं पाए और उनके जाल में फंस गए।

वादी का दावा था कि प्रतिवादियों ने सेल डीड निष्पादित होने से पहले ही नकद और चेक के माध्यम से 1,09,00,000 रुपये (1.09 करोड़ रुपये) का भुगतान कर दिया था। पंजीकरण के समय, प्रतिवादियों ने 23 सितंबर 2019 की तारीख के तीन पोस्ट-डेटेड चेक जारी किए (5-5 लाख रुपये के दो चेक और 1 लाख रुपये का एक चेक), जो मूल रूप से तय की गई 1.20 करोड़ रुपये की राशि में से बची हुई 11,00,000 रुपये की बकाया राशि के भुगतान के लिए थे।

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प्रतिवादियों के अनुरोध पर, वादी ने इन चेकों को तीन महीने बाद बैंक में प्रस्तुत किया। हालांकि, ये चेक 23 दिसंबर 2019 और 31 दिसंबर 2019 के रिटर्न मेमो के अनुसार अनादरित (बाउंस) हो गए। इसके बाद वादी ने प्रतिवादियों से संपर्क किया, लेकिन उन्होंने भुगतान में देरी की। वादी ने 3 जनवरी 2020 को एक कानूनी नोटिस भेजा, जिसके जवाब में प्रतिवादियों ने 14 जनवरी 2020 को यह दावा किया कि तय सौदा केवल 66,12,000 रुपये का था, जिसका वे पहले ही पूरा भुगतान कर चुके हैं।

इसके बाद वादी ने 11,00,000 रुपये की वसूली के लिए सीपीसी के ऑर्डर XXXVII के तहत एक मुकदमा (मुकदमा संख्या 53/2021) दायर किया। ट्रायल कोर्ट (अतिरिक्त जिला न्यायाधीश) ने 22 फरवरी 2021 के फैसले और 30 अक्टूबर 2021 की डिक्री के माध्यम से इस मुकदमे को सीपीसी के ऑर्डर VII नियम 11 के तहत खारिज कर दिया। ट्रायल कोर्ट ने माना कि सेल डीड ने मूल अनुबंध के नवीनीकरण (Novation) को दर्शाया और अधिक राशि का दावा साक्ष्य अधिनियम की धारा 91 और 92 के तहत वर्जित है। इसी फैसले के खिलाफ वादी ने दिल्ली हाईकोर्ट में अपील की थी।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता/वादी ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को मुख्य रूप से निम्नलिखित आधारों पर चुनौती दी:

  • 14 अप्रैल 2019 के एग्रीमेंट टू सेल में स्पष्ट रूप से बिक्री राशि 1,20,00,000 रुपये तय की गई थी और प्रतिवादियों ने सेल डीड के समय तक पहले ही 1,09,00,000 रुपये का भुगतान कर दिया था।
  • यदि कुल बिक्री राशि केवल 66,12,000 रुपये थी, तो प्रतिवादियों को 1,09,00,000 रुपये का भुगतान करने की कोई आवश्यकता नहीं थी। यह भुगतान ही साबित करता है कि वास्तविक सौदा 1.20 करोड़ रुपये का था और बकाया 11,00,000 रुपये के लिए ही चेक जारी किए गए थे।
  • सेल डीड में 66,12,000 रुपये की कम राशि केवल प्रतिवादियों को टैक्स बचाने में मदद करने के लिए लिखी गई थी।
  • वादी को अपना मामला साबित करने या वास्तविक बिक्री राशि को स्पष्ट करने का अवसर नहीं दिया गया और मुकदमा शुरुआत में ही खारिज कर दिया गया। साक्ष्य अधिनियम की धारा 91 और 92 के तहत रोक केवल सबूत (एविडेंस) पेश करने के चरण में लागू होनी चाहिए थी, न कि शुरुआती स्तर पर।
  • ट्रायल कोर्ट ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि सौदा 14 अप्रैल 2019 से 13 जुलाई 2019 के बीच (तीन महीने में) पूरा होना था, लेकिन प्रतिवादियों ने अलग-अलग बहानों से इसमें देरी की।
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कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड और दस्तावेजों का बारीकी से अध्ययन किया। न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा ने पाया कि यद्यपि पक्षों ने शुरू में 1.20 करोड़ रुपये की राशि पर बातचीत की थी, लेकिन बाद में निष्पादित पंजीकृत सेल डीड में कुल राशि 66,12,000 रुपये ही लिखी गई थी।

अदालत ने ट्रायल कोर्ट के इस निष्कर्ष को सही ठहराया कि यह बदलाव अनुबंध के नवीनीकरण (Novation) को दर्शाता है। कोर्ट ने टिप्पणी की:

“वर्तमान मामले में, विद्वान जिला न्यायाधीश ने सही पाया कि वादी और प्रतिवादियों के बीच निष्पादित दस्तावेजों से यह स्पष्ट था कि भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 62 के तहत अनुबंध का नवीनीकरण (novation of contract) हुआ था और अंतिम बातचीत के बाद तय की गई बिक्री राशि 66,12,000 रुपये थी।”

लिखित दस्तावेजों के सामने मौखिक साक्ष्य की स्वीकार्यता पर बात करते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया:

“…भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 91 और 92 के आलोक में लिखित दस्तावेजों की शर्तों को अनदेखा और नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 91 यह प्रावधान करती है कि जब किसी अनुबंध या संपत्ति के हस्तांतरण की शर्तों को किसी दस्तावेज के रूप में बदल दिया जाता है, तो ऐसे अनुबंध की शर्तों के प्रमाण में कोई अन्य साक्ष्य नहीं दिया जाएगा।”

साक्ष्य अधिनियम की धारा 92 का उल्लेख करते हुए बेंच ने टिप्पणी की:

“वादी द्वारा प्रस्तुत किया जाने वाला कोई भी साक्ष्य, पंजीकृत दस्तावेजों के विपरीत होगा और भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 91 और 92 के तहत वर्जित होगा।”

हाईकोर्ट ने अपने फैसले के समर्थन में दो महत्वपूर्ण पूर्व निर्णयों (Precedents) का हवाला दिया:

  1. ओम प्रकाश बनाम आईओसीएल ऑफिसर्स वेलफेयर सोसाइटी और अन्य (2019 SCC OnLine Del 6719): जिसमें यह स्पष्ट किया गया था कि एक बार पंजीकृत सेल डीड में यह दर्ज हो जाने पर कि पूरी तय राशि का भुगतान कर दिया गया है, शेष राशि की वसूली के लिए दायर मुकदमा भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 91 और 92 के तहत वर्जित होगा।
  2. जय भगवान बनाम राजेश (2008 Indlaw Delhi 419): जिसमें पूरी बिक्री राशि का भुगतान न होने के आधार पर पंजीकृत सेल डीड को रद्द करने की मांग वाले मुकदमे को खारिज कर दिया गया था। कोर्ट ने कहा था कि एक बार जब कोई पक्ष पंजीकृत सेल डीड पर हस्ताक्षर कर देता है, तो वह यह कहकर इसे रद्द करने की मांग नहीं कर सकता कि उसने दस्तावेज की सामग्री को नहीं पढ़ा था।
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इसके अतिरिक्त, हाईकोर्ट ने टैक्स चोरी के उद्देश्य से किए गए लेनदेन को लागू करवाने के वादी के प्रयास की कड़ी निंदा की। वादी द्वारा टैक्स बचाने के लिए नकद लेनदेन में शामिल होने की बात स्वीकार करने पर कोर्ट ने गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा:

“यह भी ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि वादी के मामले के अनुसार, प्रतिवादियों द्वारा टैक्स और ड्यूटी के भुगतान से बचने के लिए नकद लेनदेन किए गए थे। एक बार जब यह प्रदर्शित हो जाता है कि इसका उद्देश्य कानून के तहत दायित्व से बचना था, तो वादी उक्त लेनदेन के क्रियान्वयन के लिए न्यायालय में निवारण की मांग नहीं कर सकता है।”

कोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि ट्रायल कोर्ट ने सीपीसी के ऑर्डर VII नियम 11 के तहत वसूली के मुकदमे को सही ढंग से खारिज किया था क्योंकि इसमें कोई वाद कारण (Cause of Action) प्रकट नहीं हो रहा था। अपील में कोई दम न पाते हुए हाईकोर्ट ने नियमित प्रथम अपील को लंबित आवेदनों सहित खारिज कर दिया।

मामले का विवरण

  • मामले का शीर्षक: नरेंद्र कुमार गोला बनाम क्षितिज गोयल एवं अन्य
  • मामला संख्या: RFA 472/2022
  • पीठ: न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा
  • निर्णय की तिथि: 18 मई, 2026

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