सुप्रीम कोर्ट ने लालढांग-चिल्लरखाल सड़क के डामरीकरण की दी मंजूरी, व्यावसायिक वाहनों के संचालन पर रोक बरकरार

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड की 18 दूरदराज़ ग्राम सभाओं को राहत देते हुए गुरुवार को लालढांग-चिल्लरखाल सड़क परियोजना पर पहले लगाई गई रोक में आंशिक संशोधन किया और 11.5 किलोमीटर लंबी इस सड़क के डामरीकरण की अनुमति दे दी। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि इस मार्ग से किसी भी व्यावसायिक वाहन को गुजरने की अनुमति नहीं दी जाएगी।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने कहा:

“देश में हो रहे विकास से दूरदराज़ गांवों को वंचित नहीं किया जा सकता।”

यह आदेश 11 जनवरी 2023 को जारी किए गए उस स्थगन आदेश को संशोधित करता है जिसमें पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन के चलते परियोजना पर रोक लगाई गई थी।

यह मार्ग जिम कॉर्बेट और राजाजी टाइगर रिज़र्व को जोड़ने वाले एकमात्र सक्रिय वन्यजीव कॉरिडोर से होकर गुजरता है, जिसमें 4.5 किलोमीटर का हिस्सा चमारिया बेंड से सिग्गड़ी सोट तक अति-संवेदनशील क्षेत्र माना गया है।

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कोर्ट ने साफ किया कि सड़क का डामरीकरण तो किया जा सकता है, लेकिन किसी भी हालत में भारी वाहनों, ट्रकों या डंपरों को इस मार्ग पर चलने की अनुमति नहीं होगी।

“वन क्षेत्र के जैवविविधता और वन्यजीवों की रक्षा के लिए यह प्रतिबंध अनिवार्य है,” पीठ ने कहा।

बीजेपी सांसद अनिल बलूनी की ओर से अधिवक्ता बांसुरी स्वराज ने कहा कि इस क्षेत्र के 18 गांवों के 40,000 से अधिक लोग हर साल मानसून में सड़क के खराब होने से बेहद प्रभावित होते हैं। उन्होंने कोर्ट को बताया कि सरकार वन्यजीवों की निर्बाध आवाजाही के लिए 400 मीटर का एलिवेटेड स्ट्रेच भी बना रही है।

राज्य सरकार की ओर से पेश अधिवक्ता ने आश्वासन दिया कि कोई भी व्यावसायिक वाहन इस मार्ग पर नहीं चलेगा और आवश्यक होने पर वह कोर्ट की शर्तों को मानने को तैयार है।

राज्य सरकार ने यह भी स्वीकार किया कि इस सड़क के उपयोग से कोटद्वार और हरिद्वार के बीच की दूरी 65 किलोमीटर कम हो सकती है, लेकिन उसने सभी व्यावसायिक वाहनों को उत्तर प्रदेश के रास्ते भेजने का विकल्प स्वीकार किया।

मामले में याचिका दायर करने वाले अधिवक्ता गौरव कुमार बंसल ने कहा कि उनका विरोध केवल व्यावसायिक वाहनों के संचालन को लेकर था, न कि गांववालों के लिए डामरीकरण के खिलाफ।

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वहीं, वरिष्ठ अधिवक्ता के परमेश्वर, जो इस मामले में एमिकस क्यूरी हैं, ने बताया कि केंद्रीय सशक्त समिति (CEC) ने सड़क की डिजाइन को अव्यवस्थित बताया है जिससे नदी प्रवाह बाधित हो रहा है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी भी तरह से व्यावसायिक वाहन इस मार्ग पर न चलें।

जनवरी 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने यह पाते हुए कि सड़क निर्माण परियोजना ने वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 और वन संरक्षण अधिनियम, 1980 का उल्लंघन किया है, परियोजना पर रोक लगा दी थी और सभी कानूनी अनुमतियाँ लेने का निर्देश दिया था।

वन्यजीव विशेषज्ञों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने चेतावनी दी थी कि इस सड़क के निर्माण से टाइगर, हाथी और तेंदुए जैसे महत्वपूर्ण प्रजातियों के आवास और आवागमन पर गंभीर असर पड़ेगा।

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अब कोर्ट ने संतुलित दृष्टिकोण अपनाते हुए दूरस्थ गांवों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए केवल ग्रामीणों के उपयोग हेतु सड़क निर्माण की अनुमति दी है, जबकि वन्यजीवों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है।

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