छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने नौ साल के एक बच्चे के अपहरण और उसे बंधक बनाकर फिरौती मांगने के मामले में पांच आरोपियों की दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा को बरकरार रखते हुए उनकी सभी आपराधिक अपीलों को खारिज कर दिया है। इन आरोपियों में पीड़ित बच्चे की सगी चाची भी शामिल है।
चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने फैसला सुनाया कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में पूरी तरह सफल रहा है कि आरोपियों ने आपसी सांठगांठ से आपराधिक साजिश के तहत फिरौती के लिए मासूम बच्चे का अपहरण किया था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 364-A (फिरौती के लिए अपहरण) और धारा 120-B (आपराधिक षड्यंत्र) के तहत आरोपियों पर लगे आरोप मौखिक गवाही, शिनाख्त पंचनामा (पहचान पत्रक), कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) और साइबर फॉरेंसिक विश्लेषण रिपोर्ट के संचयी साक्ष्यों के माध्यम से पूरी तरह से साबित होते हैं।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला बिलासपुर के सिटी कोतवाली पुलिस स्टेशन में दर्ज अपराध क्रमांक 145/2019 से जुड़ा है, जो नौ वर्षीय विराट सराफ (PW-9) के अपहरण से संबंधित है। अभियोजन के अनुसार, मुख्य साजिशकर्ता नीता सराफ पीड़ित बच्चे की चाची है और परिवार की हर गतिविधि से वाकिफ थी। नीता सराफ का सह-आरोपी अनिल सिंह के साथ पैसों का लेनदेन था और उन पर भारी कर्ज था।
इस वित्तीय संकट से उबरने के लिए नीता सराफ और अनिल सिंह ने मिलकर अपने ही एक अन्य संपन्न रिश्तेदार सत्यनारायण सराफ के बेटे के अपहरण की योजना बनाई थी। इस काम के लिए उन्होंने राजकिशोर सिंह, हरेकृष्ण कुमार और सतीश शर्मा को काम पर रखा। हालांकि, जब उन्हें पता चला कि सत्यनारायण सराफ अपने परिवार के साथ शहर से बाहर गए हैं, तो साजिशकर्ताओं ने अपना निशाना बदलकर मासूम विराट सराफ को बना लिया।
इस साजिश को निम्नलिखित चरणों में अंजाम दिया गया:
- 10 अप्रैल 2019: आरोपी तिफरा सब्जी मंडी पहुंचे और वहां गुपचुप-भेल का ठेला लगाने वाले नरेश देवांगन (PW-6) को मोबाइल टॉर्च की जरूरत का झांसा देकर उसके फोन से धोखे से दो सिम कार्ड निकाल लिए।
- 18 अप्रैल 2019: आरोपियों ने चकरभाटा स्थित ‘छत्तीसगढ़ मोबाइल शॉप’ के संचालक राहुल कुमार सूर्यवंशी (PW-8) से एक पुराना मोबाइल फोन खरीदा। इस फोन में उन्होंने चोरी किए गए सिम कार्ड डाले और फ्रेंड्स मोबाइल शॉप, तालापारा से रिचार्ज कराया।
- 20 अप्रैल 2019: पीड़ित के घर की रेकी करने के बाद, अनिल सिंह अपनी सफेद वैगन-आर कार (CG 10 AM 2818) में राजकिशोर, हरेकृष्ण और सतीश शर्मा को लेकर पीड़ित के घर के पास पहुंचा। वहां बच्चों के साथ खेल रहे विराट की पहचान कर हरेकृष्ण ने उसका मुंह दबाया और उसे जबरन कार में खींच लिया।
- बंधक बनाना: विराट को बिलासपुर रेलवे स्टेशन के पास ले जाया गया, जहां उसे अनिल सिंह द्वारा चलाई जा रही राजकिशोर की डस्टर कार (CG 04 KR 5232) में शिफ्ट किया गया। इसके बाद बच्चे को राजकिशोर के पन्ना नगर, जरहाभाटा स्थित मकान के एक कमरे में हाथ-पैर बांधकर बंधक बना दिया गया, जहां हरेकृष्ण और सतीश शर्मा उसकी निगरानी कर रहे थे।
- फिरौती के कॉल: आरोपी राजकिशोर ने पुलिस को चकमा देने के लिए बिहार और उत्तर प्रदेश की यात्रा की और रास्ते में अलग-अलग स्थानों से पीड़ित के पिता विवेक सराफ (PW-1) को चोरी के सिम कार्ड से फोन कर 6 करोड़ रुपये की फिरौती मांगी (जिसे बाद में मोलभाव कर 4 करोड़ रुपये तय किया गया)।
- बच्चे की बरामदगी: 26 अप्रैल 2019 को पुलिस ने गुप्त सूचना के आधार पर पन्ना नगर स्थित मकान पर छापा मारा, ताला तोड़ा और बच्चे को हरेकृष्ण और सतीश शर्मा के कब्जे से सुरक्षित छुड़ा लिया।
मामले की सुनवाई के बाद, प्रथम अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, बिलासपुर ने 23 सितंबर 2022 को सभी पांचों आरोपियों को दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी, जिसे आरोपियों ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ताओं (आरोपियों) की दलीलें
आरोपियों के वकीलों ने निचली अदालत के फैसले के खिलाफ कानूनी और तथ्यात्मक रूप से कई सवाल उठाए:
- अनिल सिंह: बचाव पक्ष ने दलील दी कि उसके खिलाफ कोई सीधा सबूत नहीं है। पीड़ित बच्चे ने अदालत में मुख्य पहचान परेड के दौरान अनिल सिंह की पहचान नहीं की। वैगन-आर कार में उसके फिंगरप्रिंट मिलना स्वाभाविक था क्योंकि वह कार का मालिक था। इसके अलावा, बच्चे की चप्पलें दो अलग-अलग जगहों से बरामद होना पुलिस द्वारा झूठा सबूत प्लांट करने की ओर इशारा करता है।
- नीता सराफ: वकील ने तर्क दिया कि नीता को केवल संदेह और सह-आरोपियों के पुलिस बयानों के आधार पर फंसाया गया है। साक्ष्य अधिनियम की धारा 25 और 26 के तहत पुलिस हिरासत में दिए गए ऐसे बयान अदालत में स्वीकार्य नहीं हैं। वह घटना के वक्त मौके पर भी मौजूद नहीं थी।
- राजकिशोर: बचाव पक्ष ने साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-B के तहत सीडीआर (कॉल डिटेल रिकॉर्ड) की स्वीकार्यता को चुनौती देते हुए कहा कि ये इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेज सीधे मुख्य कंप्यूटर से प्रमाणित नहीं थे। यह भी तर्क दिया गया कि जिस मकान से बच्चा मिला, वह राजकिशोर के पिता का था और वहां कई किरायेदार रहते थे, जिससे उसका विशेष आधिपत्य साबित नहीं होता। इसके अलावा, समाचार पत्रों में तस्वीरें छपने के कारण शिनाख्त परेड (TIP) का कानूनी महत्व समाप्त हो गया था।
- सतीश शर्मा और हरेकृष्ण राय: सतीश शर्मा की ओर से कहा गया कि अपराध में उसकी कोई सक्रिय भूमिका साबित नहीं हुई है, जबकि हरेकृष्ण के वकील ने दलील दी कि फिरौती के लिए बच्चे को जान से मारने या गंभीर चोट पहुंचाने की कोई वास्तविक धमकी नहीं दी गई थी, इसलिए धारा 364-A के तहत मामला नहीं बनता।
राज्य सरकार (अभियोजन) की दलीलें
राज्य की ओर से डिप्टी गवर्नमेंट एडवोकेट सुश्री वैशाली महिलोंग ने अपीलों का कड़ा विरोध किया। उन्होंने दलील दी कि अभियोजन ने कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDRs), आरोपियों के मोबाइल टावर लोकेशन, राजकिशोर की आवाज के फॉरेंसिक नमूनों के मिलान और बंद कमरे से बच्चे की रंगेहाथ बरामदगी के माध्यम से साजिश की पूरी श्रृंखला को सफलतापूर्वक साबित किया है।
हाईकोर्ट का कानूनी विश्लेषण
हाईकोर्ट ने साक्ष्यों का बारीकी से परीक्षण किया और दोषसिद्धि को बरकरार रखने के लिए महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत प्रतिपादित किए:
1. आपराधिक साजिश और साझा इरादा (धारा 120-B IPC)
अदालत ने रेखांकित किया कि आपराधिक साजिश हमेशा गुप्त रूप से रची जाती है, इसलिए इसके सीधे सबूत मिलना अत्यंत दुर्लभ है। इसे आरोपियों के आचरण और परिस्थितियों से ही आंका जा सकता है। Ajay Aggarwal v. Union of India (AIR 1993 SC 1637) मामले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:
“साजिश एक निरंतर चलने वाला अपराध है और यह तब तक जारी रहता है जब तक कि साजिशकर्ताओं में से कोई एक इस दिशा में कोई कृत्य या कृत्यों की श्रृंखला करता है। जब तक इसका निष्पादन जारी रहता है, यह तब तक निरंतर अपराध बना रहता है जब तक कि यह पूरा न हो जाए, या इसे आपसी सहमति या किसी आवश्यकतावश वापस न ले लिया जाए या विफल न कर दिया जाए।”
अदालत ने पाया कि सिम कार्डों को धोखाधड़ी से हासिल करने से लेकर, गाड़ी बदलने और लगातार फोन पर सक्रिय रहने का तालमेल यह स्पष्ट करता है कि आरोपियों के बीच पहले से ही साझा आपराधिक इरादा और साजिश मौजूद थी।
2. पीड़ित बालक के मौखिक साक्ष्य की विश्वसनीयता
हाईकोर्ट ने नौ वर्षीय पीड़ित विराट सराफ (PW-9) की गवाही को अत्यधिक मूल्यवान माना। अदालत ने कहा कि बच्चे ने बिना किसी भय या बहकावे के घटना का बिल्कुल स्वाभाविक विवरण दिया है। बच्चे ने अपहरण के दौरान अपनी आंखों पर बंधे पारदर्शी गमछे से आरोपियों की गतिविधियों को देखा था और शिनाख्त परेड तथा अदालत में भी उनकी सही पहचान की, जो पूरी तरह विश्वसनीय है।
3. पहचान पत्रक (Identification Memo) की प्रामाणिकता
बचाव पक्ष के आक्षेपों को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने माना कि डिप्टी कलेक्टर नारायण प्रसाद गबेल (PW-26) द्वारा स्कूल और तहसील कार्यालय में आयोजित कराई गई पहचान परेड (TIP) पूरी तरह वैध थी। पीड़ित और अन्य गवाहों ने बिना किसी संशय के आरोपियों की शिनाख्त की थी, जो उनकी अपराध में संलिप्तता की पुष्टि करता है।
4. कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) और साइबर फॉरेंसिक रिपोर्ट
अभियोजन का सबसे मजबूत आधार आरोपियों का डिजिटल ट्रेल था। अदालत ने पाया कि कॉल डिटेल रिकॉर्ड और लोकेशन रिपोर्ट आरोपियों की गतिविधियों को आपस में जोड़ते हैं:
- एयरटेल और जियो के नोडल अधिकारियों ने साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-B के तहत आवश्यक प्रमाण पत्र प्रस्तुत कर सीडीआर की प्रामाणिकता सिद्ध की थी।
- साइबर विश्लेषण रिपोर्टों से साबित हुआ कि अपहरण के बाद आरोपियों के मोबाइल फोन की लोकेशन बिलासपुर से सीधे रामानुजगंज (जहां से फिरौती के कॉल किए गए थे) की ओर स्थानांतरित हुई थी।
हाईकोर्ट ने Anvar P.V. v. P.K. Basheer (2014) 10 SCC 473 और Arjun Panditrao Khotkar v. Kailash Kushanrao Gorantyal (2020) 7 SCC 1 के नजीर फैसलों का संदर्भ लेते हुए माना कि धारा 65-B के अनुपालन के बाद यह इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य पूरी तरह स्वीकार्य है।
धारा 364-A IPC का कानूनी पैमाना
अदालत ने Shaik Ahmed v. State of Telangana (2021) 9 SCC 59 मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित सिद्धांतों का विश्लेषण किया। धारा 364-A के तहत सजा के लिए केवल अपहरण करना ही काफी नहीं है, बल्कि पीड़ित को जान से मारने या गंभीर चोट पहुंचाने की धमकी दी जानी चाहिए या ऐसा आचरण होना चाहिए जिससे मन में इसका वास्तविक डर पैदा हो।
इस मामले में, पीड़ित के पिता विवेक सराफ को दी गई धमकी कॉल रिकॉर्डिंग में साफ पाई गई:
“बच्चे की सलामती चाहते हो तो पैसा का इंतजाम कर लेना, नहीं तो बच्चे को काटकर फेंक देंगे”
सेंट्रल फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (CFSL), चंडीगढ़ की रिपोर्ट ने यह साबित किया कि यह आवाज राजकिशोर सिंह की ही थी। अदालत ने माना कि “बच्चे को काटकर फेंकने” की यह धमकी और छह दिनों तक उसे बंधक बनाए रखना धारा 364-A के तहत दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त कानूनी आधार है।
मेमोरेंडम और जांच की त्रुटियां
साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 के तहत आरोपियों के बयानों के आधार पर गाड़ी, ताला-चाबी, हथियार और बच्चे के सामान की बरामदगी को हाईकोर्ट ने मामले की महत्वपूर्ण कड़ी माना। इसके लिए कोर्ट ने Pulukuri Kottaya v. King Emperor (AIR 1947 PC 67) और State of Rajasthan v. Bhup Singh (2022) 7 SCC 675 के सिद्धांतों का उल्लेख किया।
जांच में कुछ छोटी-मोटी कमियों को लेकर बचाव पक्ष की दलीलों को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने State of West Bengal v. Mir Mohammad Omar (AIR 2000 SC 2988) के ऐतिहासिक फैसले को उद्धृत किया:
“आपराधिक अदालतों के समय को जांच में मामूली कमियों को ढूंढने और जांच अधिकारियों के खिलाफ अनावश्यक तीखी आलोचना व्यक्त करने में बर्बाद नहीं किया जाना चाहिए। यदि केवल जांच के दोषों के कारण असली अपराधियों को बरी कर दिया जाता है, तो आपराधिक न्याय प्रणाली ही पराजित हो जाएगी। अदालतों का प्रयास होना चाहिए कि इन खामियों के बावजूद न्याय को बचाया जा सके।”
इसी तरह के सिद्धांतों के लिए कोर्ट ने State of U.P. v. Jagdev (AIR 2003 SC 660) और V.K. Mishra v. State of Uttarakhand (AIR 2015 SC 3043) के निर्णयों को भी आधार बनाया।
हाईकोर्ट का अंतिम निर्णय
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष Sharad Birdhichand Sarda v. State of Maharashtra (1984 (4) SCC 116) और Nagendra Sah v. State of Bihar (2021 (10) SCC 725) में प्रतिपादित “पंचशील सिद्धांतों” के अनुसार परिस्थितियों की एक अटूट और पूर्ण श्रृंखला स्थापित करने में सफल रहा है, जो केवल और केवल आरोपियों के दोषी होने की पुष्टि करती है।
चूंकि निचली अदालत के फैसले में किसी भी प्रकार की अवैधता, मनमानापन या तथ्यात्मक त्रुटि नहीं पाई गई, इसलिए बिलासपुर सत्र न्यायालय द्वारा दी गई उम्रकैद की सजा को न्यायसंगत ठहराते हुए हाईकोर्ट ने सभी अपीलों को खारिज कर दिया।
केस विवरण
- केस का नाम: नीता सराफ बनाम छत्तीसगढ़ राज्य (और अन्य संबंद्ध अपीलें)
- केस नंबर: क्रिमिनल अपील नंबर 1555 ऑफ 2022 (संबंद्ध क्रिमिनल अपील नंबर 1798 ऑफ 2022, 1823 ऑफ 2022, 2018 ऑफ 2022, और 218 ऑफ 2023 के साथ)
- पीठ: चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल
- दिनांक: 15 मई, 2026

