वैध नियुक्ति के बिना को-वारंटो रिट जारी नहीं हो सकती: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा – फार्मेसी रजिस्ट्रार का केवल अतिरिक्त प्रभार कोई वैधानिक पद धारण करना नहीं है

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि फार्मेसी अधिनियम, 1948 और फार्मेसी काउंसिल नियम, 1978 के तहत नियमित नियुक्ति लंबित रहने के दौरान रजिस्ट्रार का केवल अतिरिक्त प्रभार सौंपना, किसी वास्तविक वैधानिक पद (substantive statutory office) को धारण करने के समान नहीं है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिविजन बेंच ने माना कि वैध नियुक्ति के अभाव में, भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत को-वारंटो (अधिकार-पृच्छा) रिट जारी करने की अनिवार्य शर्त पूरी नहीं होती है।

इस महत्वपूर्ण कानूनी निष्कर्ष के साथ, डिविजन बेंच ने सिंगल जज के उस पिछले आदेश को खारिज कर दिया, जिसके द्वारा छत्तीसगढ़ स्टेट फार्मेसी काउंसिल के स्टोर कीपर-कम-रजिस्ट्रार को रजिस्ट्रार पद का अतिरिक्त प्रभार सौंपने की अंतरिम प्रशासनिक व्यवस्था को रद्द कर दिया गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

अपीलकर्ता, अश्वनी गुर्डेकर, मूल रूप से डॉ. भीमराव अंबेडकर मेमोरियल अस्पताल, रायपुर में फार्मासिस्ट के पद पर कार्यरत थे। 14 मार्च 2024 को एक प्रशासनिक आदेश जारी कर उन्हें छत्तीसगढ़ स्टेट फार्मेसी काउंसिल (प्रतिवादी संख्या 3) के रजिस्ट्रार पद का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया था। यह प्रभार पूरी तरह से एक अस्थायी और वैकल्पिक प्रशासनिक व्यवस्था के रूप में दिया गया था।

प्रतिवादी संख्या 4, डॉ. राकेश गुप्ता ने हाईकोर्ट के समक्ष एक रिट याचिका (WPS No. 773 of 2025) दायर कर को-वारंटो रिट जारी करने की मांग की। याचिकाकर्ता का आरोप था कि गुर्डेकर को यह अतिरिक्त प्रभार देना फार्मेसी काउंसिल नियम, 1978 के नियम 96 का उल्लंघन है, जो पूर्णकालिक रजिस्ट्रार के लिए पात्रता मानदंड और योग्यताएं निर्धारित करता है।

3 मार्च 2026 को, हाईकोर्ट के सिंगल जज ने इस याचिका को स्वीकार कर लिया और अतिरिक्त प्रभार सौंपने के आदेश को रद्द कर दिया। सिंगल जज ने इस अस्थायी व्यवस्था को ही नियमित वैधानिक “नियुक्ति” मान लिया था। इस निर्णय के खिलाफ गुर्डेकर ने डिविजन बेंच के समक्ष यह रिट अपील (WA No. 392 of 2026) दायर की।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता की ओर से

अपीलकर्ता की पैरवी कर रहे वकील श्री सुदीप जौहरी और श्री जे.के. गुप्ता ने दलील दी कि सिंगल जज का निर्णय कानूनी और तथ्यात्मक रूप से टिकने योग्य नहीं है। उनकी मुख्य दलीलें निम्नलिखित थीं:

  • कोई नियमित नियुक्ति नहीं: अपीलकर्ता को कभी भी रजिस्ट्रार पद पर स्थायी या नियमित रूप से नियुक्त नहीं किया गया था। को-वारंटो रिट का नियम केवल तभी लागू होता है जब कोई व्यक्ति किसी वास्तविक सार्वजनिक पद पर गैर-कानूनी तरीके से काबिज हो, जो कि इस मामले में नहीं था।
  • नियमों का सीमित दायरा: 1978 के नियमों का नियम 96(1) और 96(2) केवल पूर्णकालिक नियमित नियुक्तियों पर लागू होते हैं। इनका आपातकालीन या प्रशासनिक आवश्यकताओं के तहत किए जाने वाले अतिरिक्त प्रभार के अंतरिम आवंटन से कोई सरोकार नहीं है।
  • संशोधन की प्रक्रिया: सक्षम प्राधिकारी ने रजिस्ट्रार पद के लिए नए पात्रता मानदंड तय करने के लिए एक उप-समिति बनाई थी। समिति की सिफारिशों के आधार पर नियमों में संशोधन का प्रस्ताव तैयार कर 28 फरवरी 2025 को आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशन के लिए भेजा जा चुका था। इस संक्रमण काल के दौरान कामकाज में गतिरोध रोकने के लिए यह अतिरिक्त प्रभार एक सद्भावनापूर्ण (bona fide) अंतरिम व्यवस्था थी।
  • याचिकाकर्ता की मंशा: अपीलकर्ता के वकीलों ने तर्क दिया कि प्रतिवादी संख्या 4 राजनीतिक उद्देश्यों से प्रेरित हैं और काउंसिल के खिलाफ लगातार मुकदमे दायर कर रहे हैं। उन्हें पहले फार्मेसी अधिनियम, 1948 की धारा 25(3) के तहत नामांकित सदस्य के पद से हटाया गया था, जिसके बाद उन्होंने केवल व्यक्तिगत प्रतिशोध के तहत यह याचिका दायर की।
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प्रतिवादियों की ओर से

प्रतिवादी संख्या 4 की ओर से उपस्थित वकील श्री श्याम सुंदर लाल टेकचंदानी ने सिंगल जज के निर्णय का समर्थन किया। उन्होंने दलील दी कि इस व्यवस्था को रद्द करने वाले आदेश में ऐसी कोई विसंगति या अवैधता नहीं है, जिसके लिए डिविजन बेंच के हस्तक्षेप की आवश्यकता हो।

राज्य सरकार की ओर से डिप्टी एडवोकेट जनरल श्री प्रसुन भादुड़ी उपस्थित हुए।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और उद्धृत कानूनी नजीरें

डिविजन बेंच ने अपने विश्लेषण में मुख्य रूप से इसी कानूनी बिंदु पर विचार किया कि क्या नियमित नियुक्ति लंबित रहने के दौरान सौंपे गए अस्थायी अतिरिक्त प्रभार को अनुच्छेद 226 के तहत को-वारंटो रिट के माध्यम से चुनौती दी जा सकती है।

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इस विषय पर को-वारंटो के कानूनी सिद्धांतों को स्पष्ट करने के लिए बेंच ने कई महत्वपूर्ण अदालती नजीरों का सहारा लिया:

  1. यूनिवर्सिटी ऑफ मैसूर बनाम सी.डी. गोविंदा राव (AIR 1965 SC 491): सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने स्पष्ट किया था कि को-वारंटो रिट जारी करने के लिए पहली शर्त यह है कि “संबंधित पद एक वास्तविक सार्वजनिक पद होना चाहिए और संबंधित व्यक्ति बिना किसी कानूनी अधिकार के उस पर काबिज हो।” इस अधिकार क्षेत्र का उद्देश्य अस्थायी प्रशासनिक व्यवस्थाओं की पड़ताल करना नहीं है।
  2. बी. श्रीनिवास रेड्डी बनाम कर्नाटक अर्बन वॉटर सप्लाई एंड ड्रेनेज बोर्ड एम्प्लॉइज एसोसिएशन ((2006) 11 SCC 731): सुप्रीम कोर्ट ने माना कि को-वारंटो तभी लाया जा सकता है जब नियुक्ति में किसी अनिवार्य वैधानिक नियम का स्पष्ट उल्लंघन हुआ हो। हाईकोर्ट इस रिट के जरिए प्रशासनिक निर्णयों की आंतरिक टटोल नहीं कर सकता।
  3. आनंद सेलोत बनाम मुख्य सचिव, मध्य प्रदेश सरकार व अन्य (2010 ILR (MP) 1357) और हरि बंश लाल बनाम सहोदर प्रसाद महतो ((2010) 8 SCALE 623): इन मामलों में भी इस कानूनी रुख की पुष्टि की गई कि को-वारंटो रिट केवल नियमित सार्वजनिक नियुक्तियों के खिलाफ ही लाई जा सकती है।
  4. सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी सप्लाई यूटिलिटी ऑफ ओडिशा बनाम धोबेई साहू ((2014) 1 SCC 161): सुप्रीम कोर्ट ने माना कि जब तक स्पष्ट रूप से मनमानापन, दुर्भावना या वैधानिक उल्लंघन सिद्ध न हो, तब तक अदालतों को अस्थायी प्रशासनिक व्यवस्थाओं में हस्तक्षेप करने से बचना चाहिए।

इन नजीरों की रोशनी में डिविजन बेंच ने निष्कर्ष निकाला कि सिंगल जज ने अस्थायी प्रभार को नियमित वैधानिक नियुक्ति मानकर भारी भूल की। बेंच ने अपनी टिप्पणी में कहा:

“केवल अतिरिक्त प्रभार सौंपना, जो कि पूरी तरह से अस्थायी प्रकृति का है, किसी सार्वजनिक पद पर नियमित वैधानिक नियुक्ति के समान नहीं माना जा सकता है।”

फार्मेसी अधिनियम, 1948 की धारा 26 का विश्लेषण करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि यह धारा नियमित नियुक्ति की बात तो करती है, लेकिन यह नियमित नियुक्ति होने तक सुचारू संचालन सुनिश्चित करने के लिए की जाने वाली अंतरिम प्रशासनिक व्यवस्थाओं को किसी भी रूप में प्रतिबंधित नहीं करती।

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अदालत ने आगे जोड़ा कि 1978 के नियमों का नियम 96 केवल नियमित नियुक्तियों के क्षेत्र में प्रभावी होता है, आपातकालीन अंतरिम व्यवस्थाओं में नहीं। इसके साथ ही, नजीर अहमद बनाम किंग एम्परर (1936 SCC OnLine PC 41) के तहत प्रतिपादित सख्त वैधानिक प्रक्रिया के अनुपालन के सिद्धांत को उन अंतरिम प्रशासनिक व्यवस्थाओं को रद्द करने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, जो प्रशासनिक निरंतरता बनाए रखने के लिए अनिवार्य हैं।

निर्णय

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की डिविजन बेंच ने अपील को स्वीकार करते हुए सिंगल जज के 3 मार्च 2026 के आदेश को निरस्त कर दिया।

चूंकि छत्तीसगढ़ स्टेट फार्मेसी काउंसिल के रजिस्ट्रार का पद एक महत्वपूर्ण वैधानिक पद है, इसलिए अदालत ने काउंसिल के सुचारू संचालन और कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए निम्नलिखित निर्देश जारी किए:

  1. प्रतिवादी संख्या 1 से 3 को निर्देश दिया जाता है कि वे फार्मेसी अधिनियम, 1948 और इसके तहत बने 1978 के नियमों के प्रावधानों के अनुरूप रजिस्ट्रार के पद पर नियमित नियुक्ति की प्रक्रिया जल्द से जल्द शुरू करें और इसे अधिकतम आठ सप्ताह के भीतर पूरा करें।
  2. जब तक नियमित नियुक्ति की यह प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती, तब तक अपीलकर्ता अश्वनी गुर्डेकर 14 मार्च 2024 के आदेश के तहत रजिस्ट्रार के कर्तव्यों और कार्यों का निर्वहन करते रहेंगे। यह व्यवस्था सक्षम प्राधिकारी द्वारा कानून के अनुसार लिए जाने वाले किसी भी अन्य निर्णय के अधीन होगी।
  3. सक्षम प्राधिकारी के पास काउंसिल के सुचारू संचालन को सुनिश्चित करने के लिए आवश्यकतानुसार कोई अन्य वैकल्पिक अंतरिम प्रशासनिक व्यवस्था करने का विकल्प भी खुला रहेगा।

मामले में वाद व्यय (costs) के संबंध में कोई आदेश नहीं दिया गया है।

मामले का विवरण

  • मामले का शीर्षक: अश्वनी गुर्डेकर बनाम छत्तीसगढ़ राज्य व अन्य
  • मामला संख्या: रिट अपील (WA) संख्या 392 वर्ष 2026
  • पीठ: चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल
  • दिनांक: 15.05.2026

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