पक्षकार निजी तौर पर विशेषज्ञ नियुक्त कर उसकी रिपोर्ट साक्ष्य में पेश कर सकते हैं; प्रासंगिकता और स्वीकार्यता का परीक्षण मुकदमे की सुनवाई के दौरान होगा: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी दीवानी या वाणिज्यिक मुकदमे के पक्षकारों को निजी तौर पर विशेषज्ञों की सेवाएं लेने और उनकी रिपोर्ट को साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत करने की कानूनी अनुमति है। हालांकि, इस रिपोर्ट को साबित करने और सुनवाई के दौरान विरोधी पक्ष द्वारा संबंधित विशेषज्ञ से जिरह (क्रॉस-एग्जामिनेशन) करने की शर्त पूरी करनी होगी। इसके साथ ही, हाईकोर्ट ने निर्णय सुनाया कि यदि नागरिक प्रक्रिया संहिता (CPC) के तहत दस्तावेज ऑन रिकॉर्ड लाने की कोई विशेष वैधानिक प्रक्रिया निर्धारित है, तो केवल एक सामान्य मेमो दाखिल करके दस्तावेजों को स्वीकार नहीं किया जा सकता।

जस्टिस रवि नाथ तिल्हारी और जस्टिस बालाजी मेदामल्ली की डिवीजन बेंच ने यह संयुक्त फैसला दो सिविल रिवीजन याचिकाओं (C.R.P. Nos. 1209 और 1210 of 2025) पर सुनवाई के बाद सुनाया, जिन्हें संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत दायर किया गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता, आईएसजीईसी हैवी इंजीनियरिंग लिमिटेड (ISGEC Heavy Engineering Limited), विजयवाड़ा स्थित वाणिज्यिक विवादों के निपटारे के लिए गठित विशेष अदालत (Special Court) में लंबित एक वाणिज्यिक मुकदमे (C.O.S. No. 3 of 2022) में प्रतिवादी है। यह मुकदमा प्रतिवादी, मेसर्स एफई इंजीनियरिंग (M/S FE Engineering) द्वारा दायर किया गया था, जिसमें 6.42 करोड़ रुपये ($6,42,82,261$) से अधिक की डिक्री की मांग की गई है।

वादी द्वारा मुकदमे में किए गए मुख्य दावों में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • स्वीकृत आर.ए. बिलों का भुगतान न करने के एवज में 18% ब्याज के साथ 57,34,825 रुपये;
  • रोकी गई सुरक्षा राशि (Retention Money) जारी न करने के एवज में 18% ब्याज के साथ 25,82,397 रुपये;
  • काम को बीच में बंद करने (Foreclosure) के समय तक अधूरे छोड़े गए कार्यों के लिए 18% ब्याज के साथ 32,00,000 रुपये;
  • जनशक्ति और मशीनरी के खाली पड़े रहने (Idling of men and machinery) के नुकसान के रूप में 18% ब्याज के साथ 64,09,860 रुपये;
  • ओवरहेड्स और मुनाफे के नुकसान के मद में 84,70,980 रुपये;
  • परियोजना पूरी होने में देरी के कारण व्यापारिक अवसरों के नुकसान के रूप में 1,00,00,000 रुपये; और
  • अनुबंध के उल्लंघन के लिए नुकसान के रूप में 50,00,000 रुपये, तथा क्रेन किराया, दोबारा किए गए कार्यों और टूल्स व टैकल के अन्य दावे।

सीआरपी नंबर 1209 ऑफ 2025: निर्धारित अदालती प्रक्रिया का उल्लंघन

कानूनी मुद्दा

क्या गवाह से जिरह के चरण में केवल एक सामान्य मेमो के साथ साझेदारी फर्म के पंजीकरण का प्रमाण पत्र (Certificate of Registration of Firm) पेश करने पर उसे रिकॉर्ड पर लिया जा सकता है, जबकि कमर्शियल कोर्ट के लिए सीपीसी के ऑर्डर XI के तहत दस्तावेज रिकॉर्ड पर लाने की एक विशिष्ट प्रक्रिया निर्धारित है?

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पक्षकारों के तर्क

वादी के गवाह (P.W.1) से जिरह के दौरान, वादी (एफई इंजीनियरिंग) ने 28 मार्च 2025 को एक मेमो के जरिए ‘फर्म के पंजीकरण का प्रमाण पत्र’ प्रस्तुत किया। स्पेशल कोर्ट के जज ने इस मेमो को स्वीकार करते हुए दस्तावेज को रिकॉर्ड पर ले लिया। आईएसजीईसी हैवी इंजीनियरिंग लिमिटेड ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी।

याचिकाकर्ता (प्रतिवादी) ने तर्क दिया कि कमर्शियल कोर्ट पर लागू होने वाले सीपीसी के ऑर्डर XI रूल्स 4 और 5 के तहत दस्तावेजों को रिकॉर्ड पर लाने की एक विशिष्ट प्रक्रिया है। बिना किसी उचित आवेदन के और कोर्ट की अनुमति लिए बिना केवल एक मेमो के माध्यम से इस तरह का दस्तावेज दाखिल नहीं किया जा सकता।

प्रतिवादी (वादी) के वकील ने स्वीकार किया कि वादी उचित प्रक्रिया का पालन करते हुए नए सिरे से आवेदन दायर करने के लिए तैयार है, और इसके लिए हाईकोर्ट से अनुमति मांगी।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और निर्णय

हाईकोर्ट ने माना कि यदि किसी कार्य के लिए कानून में एक विशिष्ट प्रक्रिया निर्धारित है, तो उसका सख्ती से पालन किया जाना चाहिए। केवल एक मेमो दाखिल करके प्रक्रिया को दरकिनार नहीं किया जा सकता। बेंच ने कहा:

“पक्षकारों की दलीलों को देखने के बाद हमारी यह राय है कि एक बार जब प्रक्रिया निर्धारित कर दी गई है, तो आवेदक को उसी प्रक्रिया का पालन करना होगा। मेमो दाखिल करके दस्तावेज को रिकॉर्ड पर लाने की ऐसी कोई प्रक्रिया नहीं है। परिणामस्वरूप, मेमो पर पारित किया गया विवादित आदेश कायम रहने योग्य नहीं है।”

इस आधार पर हाईकोर्ट ने सी.आर.पी. नंबर 1209 ऑफ 2025 को स्वीकार करते हुए निचली अदालत के आदेश को रद्द कर दिया। हालांकि, हाईकोर्ट ने वादी को कानून के अनुसार निर्धारित प्रक्रिया का पालन करते हुए नया आवेदन दाखिल करने की छूट दी।

सीआरपी नंबर 1210 ऑफ 2025: निजी विशेषज्ञ की रिपोर्ट की स्वीकार्यता

कानूनी मुद्दा

क्या कोर्ट की अनुमति या पूर्व नियुक्ति के बिना, किसी पक्षकार द्वारा निजी तौर पर नियुक्त विशेषज्ञ से तैयार कराई गई रिपोर्ट को सीपीसी और कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट के तहत साक्ष्य के रूप में रिकॉर्ड पर लिया जा सकता है?

पृष्ठभूमि और तर्क

वादी ने सीपीसी के ऑर्डर XI रूल 1(5) के तहत एक आवेदन (I.A. No. 157 of 2024) दायर कर 26 अगस्त 2024 की एक विशेषज्ञ रिपोर्ट को रिकॉर्ड पर लेने की अनुमति मांगी थी। यह रिपोर्ट मुकदमे के दायर होने के बाद वादी द्वारा निजी तौर पर नियुक्त किए गए एक विशेषज्ञ द्वारा तैयार की गई थी।

स्पेशल जज ने इस आवेदन को स्वीकार करते हुए कहा कि चूंकि यह रिपोर्ट मुकदमे के बाद तैयार हुई है, इसलिए यह मुकदमा दायर करने के समय वादी के कब्जे में नहीं थी। अदालत ने इसकी प्रासंगिकता और स्वीकार्यता को मुकदमे की सुनवाई के दौरान तय करने की शर्त पर इसे रिकॉर्ड पर ले लिया।

आईएसजीईसी हैवी इंजीनियरिंग लिमिटेड ने इस निर्णय को चुनौती देते हुए कहा:

  1. न्यायिक कार्य: प्रतिवादी का तर्क था कि सीपीसी के ऑर्डर XXVI रूल 9 और 10 के तहत विशेषज्ञ की नियुक्ति केवल कोर्ट का न्यायिक कार्य है। कोई भी पक्षकार खुद निजी तौर पर विशेषज्ञ नियुक्त नहीं कर सकता।
  2. पहले से उपलब्धता का दावा: प्रतिवादी ने वाद पत्र (Plaint) के पैरा 101 का हवाला दिया, जिसमें वादी ने कहा था कि उसने ओवरहेड्स और मुनाफे के नुकसान की गणना के लिए विशेषज्ञ नियुक्त किया है जिसने राशि 84,70,980 रुपये आंकी है। प्रतिवादी के अनुसार, इससे साबित होता है कि रिपोर्ट पहले से उनके पास थी और बाद की तारीख केवल इसे नया दिखाने के लिए डाली गई थी।
  3. न्यायिक दृष्टांत: याचिकाकर्ता ने सुधीर कुमार उर्फ एस. बलिया बनाम विनय कुमार जी.बी., नारायण मेनोकी बनाम राण नायर, और पदा सेन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के फैसलों पर भरोसा जताया।
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वादी ने इसका विरोध करते हुए दलील दी:

  1. कोई वैधानिक रोक नहीं: कानून में ऐसी कोई रोक नहीं है जो किसी पक्षकार को अपने दावों की पुष्टि के लिए निजी विशेषज्ञ की सेवाएं लेने से रोकती हो।
  2. वाद पत्र में स्पष्टीकरण: वाद पत्र के पैरा 104 में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि वादी विशेषज्ञ के माध्यम से नुकसान की सटीक गणना करवाकर इस राशि में संशोधन करने का हकदार है, जिससे स्पष्ट है कि अंतिम रिपोर्ट बाद में आई।
  3. न्यायिक दृष्टांत: वादी ने कर्नाटक हाईकोर्ट के परप्पा बनाम भीमप्पा और केरल हाईकोर्ट के संतोष के.एस. बनाम केरल राज्य के फैसलों पर भरोसा जताया।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और निर्णय

हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के तर्कों को खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि तथ्य से जुड़े किसी नए दावे को पहली बार अनुच्छेद 227 की पुनरीक्षण याचिका में नहीं उठाया जा सकता। सिर्फ नुकसान की राशि समान होने से यह नहीं माना जा सकता कि रिपोर्ट पहले से वादी के पास थी।

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निजी विशेषज्ञ की रिपोर्ट की स्वीकार्यता पर हाईकोर्ट ने कहा कि विशेषज्ञ नियुक्त करने की कोर्ट की शक्ति किसी पक्षकार को अपनी ओर से विशेषज्ञ साक्ष्य प्राप्त करने से वंचित नहीं करती। बेंच ने कहा:

“कमिश्नर या विशेषज्ञ की नियुक्ति कोर्ट का कार्य हो सकता है, लेकिन यह किसी पक्षकार को निजी तौर पर विशेषज्ञ की सेवाएं लेने और उसकी रिपोर्ट को साक्ष्य में प्रस्तुत करने से नहीं रोकता। इस तरह के मामले में विरोधी पक्ष को भी अपना साक्ष्य प्रस्तुत करने और विशेषज्ञ गवाह से जिरह करने का पूरा अवसर मिलेगा। इसमें कोई संदेह नहीं कि कोर्ट विशेषज्ञ की नियुक्ति का आदेश दे सकता है, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि कोई पक्षकार निजी विशेषज्ञ की सेवाएं नहीं ले सकता या उसकी राय की रिपोर्ट पेश नहीं कर सकता।”

हाईकोर्ट ने केरल और कर्नाटक हाईकोर्ट के निर्णयों का समर्थन किया। केरल हाईकोर्ट के संतोष के.एस. मामले का उल्लेख करते हुए बेंच ने कहा:

“हालांकि अदालत को बिना अदालती हस्तक्षेप के प्राप्त रिपोर्ट के साक्ष्य मूल्य का आकलन करते समय सतर्क रहना चाहिए, लेकिन ऐसी रिपोर्ट प्राप्त करने पर कोई प्रतिबंध नहीं है।”

कर्नाटक हाईकोर्ट के परप्पा मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि निजी विशेषज्ञ की रिपोर्ट केवल अदालत में दाखिल करने मात्र से साक्ष्य नहीं बन जाती। इसके लिए:

“…यह आवश्यक होगा कि जो पक्षकार इस रिपोर्ट पर भरोसा कर रहा है, वह उस विशेषज्ञ को अदालत में गवाह के रूप में परीक्षित कराए, उसके माध्यम से रिपोर्ट प्रदर्शित कराए और फिर विरोधी पक्ष को उस विशेषज्ञ से जिरह करने का अवसर प्रदान करे। विशेषज्ञ के इस परीक्षण के बाद ही उसकी रिपोर्ट साक्ष्य में स्वीकार्य होगी।”

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि निजी तौर पर तैयार कराई गई विशेषज्ञ रिपोर्ट को अदालत के रिकॉर्ड पर लिया जा सकता है, लेकिन मुकदमे की सुनवाई के दौरान इसकी प्रासंगिकता और स्वीकार्यता को साबित करना होगा। हाईकोर्ट को स्पेशल जज के आदेश में कोई अवैधता नहीं मिली और सी.आर.पी. नंबर 1210 ऑफ 2025 को खारिज कर दिया गया।

मामले का विवरण

  • मामले का शीर्षक : आईएसजीईसी हैवी इंजीनियरिंग लिमिटेड बनाम मेसर्स एफई इंजीनियरिंग
  • केस नंबर (Case No.): सिविल रिवीजन पिटीशन नंबर: 1209 और 1210 ऑफ 2025
  • पीठ (Bench): जस्टिस रवि नाथ तिल्हारी, जस्टिस बालाजी मेदामल्ली
  • दिनांक: 15 अप्रैल 2026

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