कर्नाटक हाईकोर्ट (धारवाड़ पीठ) ने एक अहम फैसले में रेगुलर फर्स्ट अपील (RFA) को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट के 2005 के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें मालिकाना हक की घोषणा (Declaration of Title) और स्थायी निषेधाज्ञा (Permanent Injunction) के मुकदमे को खारिज कर दिया गया था। हाईकोर्ट ने वादियों (Plaintiffs) और अन्य कानूनी वारिसों को विवादित संपत्तियों का संयुक्त मालिक घोषित किया। कोर्ट ने माना कि वादियों ने संपत्ति पर अपना मालिकाना हक और कब्जा सफलतापूर्वक साबित कर दिया है, जबकि प्रतिवादी (Defendants) 1946 की कथित सेल डीड (बिक्री पत्र) अदालत में पेश करने में पूरी तरह विफल रहे।
मामले की पृष्ठभूमि
यह दीवानी विवाद कुडलिगी के सिविल जज (सीनियर डिवीजन) के समक्ष दायर एक मूल वाद (ओ.एस. नंबर 33/2002, पूर्व में ओ.एस. नंबर 43/1997) से शुरू हुआ था। वादियों ने चिरथागुंडू गांव में स्थित कृषि भूमि (वाद अनुसूची के आइटम नंबर 2 और 3) पर मालिकाना हक की घोषणा और प्रतिवादियों के खिलाफ स्थायी निषेधाज्ञा की मांग की थी।
वादियों का दावा था कि यह संपत्ति उन्हें अपने पूर्वज पाटिल दानप्पा और उनके बेटों, डोड्डामल्लप्पा व सन्नामल्लप्पा के जरिए विरासत में मिली है। 23 मार्च 2005 को ट्रायल कोर्ट ने वादियों के इस मुकदमे को खारिज कर दिया था। इसके खिलाफ वादियों ने हाईकोर्ट में वर्तमान रेगुलर फर्स्ट अपील (आरएफए नंबर 977/2005) दायर की। बाद में, इस मामले में संयुक्त मालिक के तौर पर पहचाने गए कुछ प्रतिवादियों ने भी ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए एक क्रॉस-ऑब्जेक्शन (आरएफए क्रॉब नंबर 100011/2025) दाखिल किया।
दोनों पक्षों की दलीलें
वादियों की दलीलें: वादियों का तर्क था कि उनके पूर्वज इस जमीन के असली मालिक थे, जिसकी पुष्टि रीसेटेलमेंट रजिस्टर के रिकॉर्ड से होती है। उनका कहना था कि डोड्डामल्लप्पा और सन्नामल्लप्पा ने 18 फरवरी, 1930 को सिद्दयानाकोटे सन्नाबसप्पा के पक्ष में महज 500 रुपये का एक पंजीकृत मॉर्गेज डीड (बंधक पत्र) निष्पादित किया था, लेकिन संपत्ति को कभी बेचा नहीं था। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि 1968-1969 के राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज नाम “राजशेखरप्पा” वादी नंबर 3 का है, न कि प्रतिवादी नंबर 1 के पिता का। वादियों ने आरोप लगाया कि प्रतिवादी नंबर 1 ने नाम की इस समानता का गलत फायदा उठाते हुए 1997 में अवैध रूप से जमीन का म्यूटेशन (दाखिल-खारिज) अपने नाम करा लिया।
प्रतिवादियों की दलीलें: प्रतिवादी नंबर 1 और 2 ने दावा किया कि डोड्डामल्लप्पा और सन्नामल्लप्पा ने 1946 में प्रतिवादी नंबर 1 की परदादी के पति (गौडर सन्नाबसन्ना) के पक्ष में एक सेल डीड निष्पादित की थी। उनका तर्क था कि राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज “राजशेखरप्पा” प्रतिवादी नंबर 1 के पिता थे। उनके निधन के बाद, प्रतिवादी नंबर 1 ने 1997 में डिप्टी तहसीलदार के आदेश के जरिए कानूनी तौर पर जमीन अपने नाम म्यूटेट कराई थी। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि वादियों का विवादित संपत्तियों पर न तो कोई कब्जा है और न ही कोई मालिकाना हक।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
जस्टिस शिवशंकर अमरन्नावर की पीठ ने मामले से जुड़े दस्तावेजी साक्ष्यों की बारीकी से जांच की, जिनमें 1930 का मॉर्गेज डीड (Ex.P9) और एन्कम्ब्रेन्स सर्टिफिकेट (Ex.P1) शामिल थे। कोर्ट ने पाया कि इन दस्तावेजों में बाद की किसी भी बिक्री का कोई जिक्र नहीं है। बचाव पक्ष के दावों को नकारते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि प्रतिवादी कथित 1946 की सेल डीड अदालत में पेश करने में विफल रहा।
कोर्ट ने अपनी अहम टिप्पणी में कहा: “एक बार का बंधक हमेशा बंधक ही रहता है (Once mortgage always mortgage) और बंधकदार कभी भी बंधक रखी गई संपत्ति का मालिक नहीं बन सकता। प्रतिवादी नंबर 1 ने अपने पूर्वजों द्वारा विवादित संपत्तियों को खरीदने का कोई बिक्री पत्र पेश नहीं किया है।”
सबूत के भार (Burden of proof) पर टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने कहा, “प्रतिवादी के मामले की तुलना में वादियों का मामला अधिक संभाव्य है। दीवानी विवादों में सबूत का मानक ‘संभावनाओं की प्रबलता’ (preponderance of probability) होता है।” मतदाता सूची के आधार पर कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि राजस्व रिकॉर्ड में मौजूद “राजशेखरप्पा” वादी नंबर 3 ही था, क्योंकि वह उसी गांव का निवासी था, जबकि प्रतिवादी नंबर 1 दूसरे जिले का रहने वाला था।
इसके अतिरिक्त, कोर्ट ने बचाव पक्ष द्वारा उद्धृत सुप्रीम कोर्ट के तीन पूर्व दृष्टांतों (Precedents) का भी विश्लेषण किया:
- स्मृति देबबर्मा (मृत) बनाम प्रभा रंजन देबबर्मा: कोर्ट ने इस सिद्धांत को माना कि मालिकाना हक स्थापित करने की जिम्मेदारी वादी पर होती है। फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने नोट किया, “मालिक के रूप में और स्वामित्व के सामान्य अधिकारों का शांतिपूर्वक प्रयोग करते हुए भूमि पर काबिज व्यक्ति का वास्तविक मालिक को छोड़कर पूरी दुनिया के खिलाफ कानूनी अधिकार होता है।” हाईकोर्ट ने पाया कि वादियों ने इस जिम्मेदारी को सफलतापूर्वक निभाया है।
- आंध्र प्रदेश राज्य बनाम बी. रंगा रेड्डी: इस दृष्टांत का उपयोग करते हुए, कोर्ट ने वादियों के दावों का समर्थन करने वाले सह-मालिकों द्वारा दायर क्रॉस-ऑब्जेक्शन की पोषणीयता (Maintainability) को वैध माना।
- वसंता (मृत) बनाम राजलक्ष्मी @ राजम: बचाव पक्ष का तर्क था कि कब्जे की वसूली (Recovery of possession) की मांग किए बिना केवल मालिकाना हक की घोषणा का मुकदमा खारिज होना चाहिए। कोर्ट ने इस मामले के तथ्यों को अलग मानते हुए कहा, “जब वादियों ने यह साबित कर दिया है कि वे विवादित संपत्तियों पर काबिज हैं, तो उनके द्वारा कब्जे की वसूली की राहत मांगने का कोई सवाल ही नहीं उठता।”
कोर्ट का आदेश
कर्नाटक हाईकोर्ट ने 23 मार्च 2005 के ट्रायल कोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए अपील और क्रॉस-ऑब्जेक्शन को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया।
कोर्ट ने आदेश दिया कि वादी नंबर 1 से 4, प्रतिवादी नंबर 3 से 6, और डोड्डामल्लप्पा तथा सन्नामल्लप्पा के अन्य कानूनी वारिस विवादित संपत्ति (आइटम नंबर 2 और 3) के संयुक्त मालिक हैं और उनका इस संपत्ति पर वास्तविक कब्जा है। इसके अलावा, हाईकोर्ट ने एक स्थायी निषेधाज्ञा (Permanent Injunction) जारी की, जो प्रतिवादी नंबर 1 और 2 तथा उनके कानूनी प्रतिनिधियों को इस संयुक्त संपत्ति पर वादियों के शांतिपूर्ण कब्जे में किसी भी तरह का दखल देने से रोकती है।
केस विवरण
केस का शीर्षक: श्री जी. थिप्पेस्वामी व अन्य बनाम श्री बसप्पा व अन्य
केस नंबर: रेगुलर फर्स्ट अपील नंबर 977/2005 (Dec-Inj) के साथ आरएफए क्रॉस ऑब्जेक्शन नंबर 100011/2025
पीठ: जस्टिस शिवशंकर अमरन्नावर
तारीख: 14 मई, 2026

