बॉम्बे हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 की धारा 281 के तहत प्रोबेट याचिका का सत्यापन किसी गवाह द्वारा किया जाना एक निर्देशात्मक (directory) आवश्यकता है, न कि अनिवार्य (mandatory)। कोर्ट ने कहा कि इस तरह की प्रक्रियात्मक चूक एक अनियमितता है, न कि कोई अवैधता, और इसके आधार पर किसी वसीयत याचिका को स्वतः खारिज नहीं किया जा सकता। जस्टिस शर्मिला यू. देशमुख ने एक अंतरिम आवेदन को खारिज करते हुए यह आदेश दिया, जिसमें एक लंबे समय से लंबित वसीयत मुकदमे को रद्द करने की मांग की गई थी।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला मूल रूप से बीना समीर तेलिवाला (वादी) द्वारा 15 अक्टूबर, 2010 को दायर एक वसीयत याचिका से संबंधित है। प्रतिवादी/आवेदक सुनील इज्जत राय शाह ने जनवरी 2011 में इस पर आपत्ति (Caveat) दर्ज कराई थी, जिसके बाद इस याचिका को ‘वसीयत सूट नंबर 26 ऑफ 2011’ में बदल दिया गया था।
साल 2026 में, जब मामले में गवाहों के साक्ष्य दर्ज किए जा रहे थे, प्रतिवादी ने एक अंतरिम आवेदन दायर कर याचिका को खारिज करने की मांग की। आवेदक का मुख्य तर्क यह था कि याचिका दायर करते समय गवाह का हलफनामा साथ नहीं लगाया गया था, जो भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 280, 281 और बॉम्बे हाईकोर्ट (ओरिजनल साइड) रूल्स के नियम 375 का उल्लंघन है।
पक्षों के तर्क
आवेदक (प्रतिवादी): आवेदक की ओर से वकील अनीता कैस्टेलिनो ने तर्क दिया कि गवाह का हलफनामा दाखिल करना एक अनिवार्य शर्त है। उन्होंने कहा कि नियम 375 में “shall” शब्द का प्रयोग यह दर्शाता है कि हलफनामे के अभाव में याचिका खारिज होनी चाहिए। इसके अलावा, उन्होंने नियम 435 का हवाला देते हुए कहा कि चूंकि एक साल के भीतर आपत्तियों को दूर नहीं किया गया, इसलिए याचिका को निपटाया हुआ माना जाना चाहिए।
प्रतिवादी (वादी): वादी की ओर से पेश वकील श्री ससी ने दलील दी कि हालांकि हलफनामे 2011 में ही तैयार कर लिए गए थे, लेकिन वे रिकॉर्ड से कहीं गुम हो गए। उन्होंने जोर देकर कहा कि एक बार जब याचिका मुकदमे (Suit) में बदल जाती है, तो उसे नियम 435 के तहत खारिज नहीं किया जा सकता। उन्होंने यह भी बताया कि गवाह के साक्ष्य पहले से ही कोर्ट में दर्ज किए जा रहे हैं।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने कानूनी ढांचे और पिछले न्यायिक उदाहरणों की समीक्षा की ताकि यह तय किया जा सके कि सत्यापन की आवश्यकता अनिवार्य है या नहीं।
1. धारा 281 का निर्देशात्मक स्वरूप: जस्टिस देशमुख ने सुप्रीम कोर्ट के विद्यावती गुप्ता बनाम भक्ति हरि नायक मामले का उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था कि सीपीसी के तहत प्रक्रियात्मक संशोधन निर्देशात्मक होते हैं। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:
“सीपीसी के तहत उपरोक्त स्थिति को देखते हुए… चूंकि प्रावधानों को निर्देशात्मक माना गया है, इसलिए यह स्पष्ट है कि गवाह द्वारा वसीयत याचिका का सत्यापन न करने के कारण याचिका को खारिज नहीं किया जा सकता।”
2. “जब उपलब्ध हो” (When Procurable) वाक्यांश: कोर्ट ने प्रह्लाद गणपत सालगर बनाम सुनील दिलीप काकोड मामले में खंडपीठ के फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि धारा 281 में “जब उपलब्ध हो” वाक्यांश ब्रैकेट में दिया गया है। हाईकोर्ट ने कहा:
“इस धारा को अनिवार्य नहीं माना जा सकता क्योंकि ऐसे कई हालात हो सकते हैं जब गवाह उपलब्ध न हो… इस प्रावधान में प्रयुक्त ‘shall’ शब्द को निर्देशात्मक के रूप में पढ़ा जाना चाहिए।”
3. हाईकोर्ट के नियमों का अनुप्रयोग: नियम 375 के संबंध में कोर्ट ने कहा कि यह याचिका के साथ संलग्न किए जाने वाले आवश्यक दस्तावेजों के बारे में है, लेकिन उनकी अनुपस्थिति से केवल ‘ग्रांट’ (Grant) जारी नहीं होगी, याचिका खारिज नहीं होगी। कोर्ट ने नियम 384 का हवाला देते हुए कहा कि गवाह की अनुपस्थिति में “अन्य साक्ष्य” भी पेश किए जा सकते हैं।
4. मुकदमे में परिवर्तन: कोर्ट ने नियम 435 के तहत याचिका खारिज करने के तर्क को भी अस्वीकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि चूंकि 2011 में ही आपत्ति दर्ज होने के बाद यह मामला मुकदमे में बदल गया था, इसलिए अब यह दीवानी मुकदमे (Civil Suit) की प्रक्रिया के तहत चलेगा और “बिना ट्रायल के इसे खारिज करने का कोई नियम नहीं दिखाया गया है।”
कोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि चूंकि अब गवाह का हलफनामा साक्ष्य के रूप में रिकॉर्ड पर आ चुका है, इसलिए याचिका खारिज करने की मांग में कोई दम नहीं है।
जस्टिस देशमुख ने कहा:
“मैं इस तर्क को स्वीकार करने के पक्ष में नहीं हूं कि जब कार्यवाही मुकदमे में बदल चुकी हो और गवाह का हलफनामा साक्ष्य के रूप में रिकॉर्ड पर रखा जा चुका हो, तब भी वसीयत याचिका को खारिज कर दिया जाना चाहिए।”
इन्हीं टिप्पणियों के साथ कोर्ट ने अंतरिम आवेदन को खारिज कर दिया।
मामले का विवरण:
केस टाइटल: सुनील इज्जत राय शाह बनाम बीना समीर तेलिवाला
केस नंबर: अंतरिम आवेदन संख्या 1592/2026 (वसीयत सूट नंबर 26/2011 में)
बेंच: जस्टिस शर्मिला यू. देशमुख
तारीख: 8 मई, 2026

