7 जंतर मंतर रोड: पुराने मुख्यालय पर मालिकाना हक के लिए हाई कोर्ट पहुंची कांग्रेस, अदालत ने पूछा- ‘सिविल सूट क्यों नहीं किया?’

दिल्ली हाई कोर्ट ने गुरुवार को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की उस याचिका पर केंद्र और दिल्ली सरकार से जवाब मांगा है, जिसमें पार्टी ने 7 जंतर मंतर रोड स्थित अपने पुराने मुख्यालय के लिए ‘सेल डीड’ (बिक्री विलेख) निष्पादित करने की मांग की है। कांग्रेस का दावा है कि वह पिछले 70 सालों से इस बेशकीमती संपत्ति पर काबिज है, लेकिन अदालत ने इस कानूनी लड़ाई के तरीके पर गंभीर सवाल उठाए हैं।

जस्टिस पुरुषेंद्र कुमार कौरव ने कांग्रेस की मुख्य याचिका और अंतरिम राहत की मांग वाली अर्जी पर नोटिस जारी किया है। कांग्रेस की चिंता यह है कि मामला लंबित रहने के दौरान सरकार यह जमीन किसी और को आवंटित न कर दे। पार्टी का तर्क है कि उसने 1950 के दशक में ही इस संपत्ति के लिए भुगतान कर दिया था, लेकिन औपचारिक कागजी कार्रवाई (Conveyance Deed) आज तक अधूरी है।

सुनवाई के दौरान जस्टिस कौरव ने याचिका की स्वीकार्यता (Maintainability) पर संदेह जताया। उन्होंने मौखिक रूप से टिप्पणी की कि यह मामला ‘रिट याचिका’ के बजाय एक सामान्य ‘सिविल सूट’ (दीवानी मुकदमा) का होना चाहिए था।

जज ने कहा, “मुझे इस याचिका की मेंटेनबिलिटी पर संदेह है। अंतरिम राहत के लिए आपको पहले यह साबित करना होगा कि यह याचिका सुनवाई योग्य है। ऐसा लगता है कि यह ‘लिमिटेशन’ (कानूनी समय सीमा) की अड़चनों से बचने की एक कोशिश है।”

अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने पक्ष रखा। उन्होंने अदालत को बताया कि कांग्रेस फरवरी 1946 से इस भवन के हिस्सों पर काबिज है और 1956 में इसका औपचारिक आवंटन हुआ था।

याचिका में पार्टी ने निम्नलिखित महत्वपूर्ण तथ्य पेश किए:

  • वित्तीय भुगतान: पार्टी ने 1959 में भारत सरकार को बिक्री राशि के रूप में $Rs 6.1$ लाख का भुगतान किया था।
  • अतिरिक्त शुल्क: पार्टी ने ‘चेंज ऑफ यूजर’ के लिए $Rs 96,962$ का अतिरिक्त प्रीमियम और $Rs 4,849$ का वार्षिक भू-राजस्व भी चुकाया है।
  • सुप्रीम कोर्ट का आदेश: 2014 के एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि 1969 के पार्टी विभाजन से पहले की सभी संपत्तियों और निधियों पर याचिकाकर्ता का ही अधिकार है।
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कांग्रेस का कहना है कि 1969 के विभाजन और परिसर में रहने वाले किरायेदारों के साथ चले लंबे विवादों के कारण ‘सेल डीड’ की प्रक्रिया पांच दशकों से अटकी हुई है। सिंघवी ने जोर देकर कहा, “मेरे पास 70 साल का कब्जा है, सभी दस्तावेज हैं और सभी भुगतान किए जा चुके हैं। प्रशासन को इसे किसी और को आवंटित नहीं करना चाहिए।”

दिल्ली हाई कोर्ट अब इस मामले पर 14 सितंबर को अगली सुनवाई करेगा। कोर्ट का मुख्य ध्यान इस बात पर होगा कि क्या कांग्रेस की यह याचिका कानूनी रूप से टिक पाएगी या पार्टी को नए सिरे से दीवानी मुकदमा दायर करना होगा।

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