जांच के दौरान गिरफ्तारी न होना और फरार होने का कम जोखिम साइबर धोखाधड़ी मामले में अग्रिम जमानत का आधार: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साइबर धोखाधड़ी और फर्जीवाड़ा (इम्पर्सनेशन) के एक मामले में आरोपी महिला, श्रीमती यासमीन को अग्रिम जमानत प्रदान की है। जस्टिस अवनीश सक्सेना की पीठ ने पाया कि आरोपी का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है और जांच के दौरान उसे गिरफ्तार नहीं किया गया था, जो उसे भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 482 के तहत राहत देने का पर्याप्त आधार है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 18 जून, 2024 को दर्ज की गई एक प्राथमिकी (FIR) से संबंधित है। शिकायतकर्ता का आरोप था कि 31 मई, 2024 को उसे इंडसइंड बैंक का फर्जी अधिकारी बनकर किसी अज्ञात व्यक्ति ने फोन किया और बैंक विवरण हासिल कर लिए। इसके बाद शिकायतकर्ता के खाते से ₹3,24,764/- अवैध रूप से निकाल लिए गए।

पुलिस जांच में यह बात सामने आई कि उक्त राशि विभिन्न खातों में भेजी गई थी, जिसमें से ₹15,000/- आवेदक श्रीमती यासमीन के खाते में जमा हुए थे। इस आधार पर थाना साइबर क्राइम, आगरा में आईपीसी की धारा 419, 420 और आईटी एक्ट की धारा 66C/66D के तहत केस दर्ज किया गया।

पक्षकारों के तर्क

आवेदक की ओर से अधिवक्ता सुश्री शबिस्ता परवीन ने दलील दी कि उनकी मुवक्किल स्वयं एक पीड़ित है जिसे धोखेबाज व्यक्तियों द्वारा मोहरे के रूप में इस्तेमाल किया गया है। कोर्ट को बताया गया कि आवेदक का पूर्व में कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है और पूरी जांच प्रक्रिया के दौरान उसे गिरफ्तार नहीं किया गया था। गिरफ्तारी की आशंका को देखते हुए उन्होंने ट्रायल लंबित रहने के दौरान अग्रिम जमानत की मांग की।

राज्य की ओर से अपर शासकीय अधिवक्ता (AGA) ने जमानत अर्जी का विरोध किया और इसे गंभीर मामला बताया।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण और कानूनी नजीरें

कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि अग्रिम जमानत के सिद्धांतों को माननीय उच्चतम न्यायालय ने कई ऐतिहासिक निर्णयों में निर्धारित किया है। इसमें मुख्य रूप से निम्नलिखित केसों का उल्लेख किया गया:

  1. गुरबख्श सिंह सिब्बिया बनाम पंजाब राज्य (1980) 2 SCC 565
  2. सिद्धाराम सतलिंगप्पा म्हात्रे बनाम महाराष्ट्र राज्य (2011) 1 SCC 694
  3. सुशीला अग्रवाल और अन्य बनाम राज्य (एनसीटी दिल्ली) और अन्य (2020) 5 SCC 1
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जस्टिस अवनीश सक्सेना ने कहा कि अग्रिम जमानत देते समय कोर्ट को आरोपों की गंभीरता के साथ-साथ आरोपी के फरार होने की संभावना (फ्लाइट रिस्क), कस्टोडियल पूछताछ की जरूरत और जांच में सहयोग जैसे पहलुओं का मूल्यांकन करना चाहिए। वर्तमान मामले में कोर्ट ने पाया कि आवेदक के फरार होने की आशंका कम है और उसने ट्रायल में सहयोग का आश्वासन दिया है।

कोर्ट का निर्णय

अर्जी स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि श्रीमती यासमीन को ट्रायल कोर्ट या जांच अधिकारी के समक्ष 30 दिनों के भीतर पेश होने पर जमानत पर रिहा किया जाए। इसके लिए उन्हें ₹25,000/- का व्यक्तिगत बंधपत्र और इतनी ही राशि की दो जमानतें प्रस्तुत करनी होंगी।

कोर्ट ने जमानत के साथ कुछ शर्तें भी निर्धारित की हैं:

  • आवेदक गवाहों को डराने या साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ करने का प्रयास नहीं करेगी।
  • ट्रायल के दौरान मामले के महत्वपूर्ण चरणों जैसे आरोप तय होने और धारा 351 BNSS के तहत बयान दर्ज होने पर वह व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहेगी।
  • गवाहों की मौजूदगी के दौरान बिना ठोस कारण के स्थगन (adjournment) नहीं मांगा जाएगा।
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कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ये टिप्पणियां केवल जमानत के निस्तारण के लिए हैं और इनका ट्रायल के गुण-दोषों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

केस विवरण:

  • केस शीर्षक: श्रीमती यासमीन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
  • केस संख्या: क्रिमिनल मिस. अग्रिम जमानत आवेदन (BNSS की धारा 482 के तहत) संख्या 4345/2026
  • पीठ: जस्टिस अवनीश सक्सेना
  • दिनांक: 13 मई, 2026

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