लोकायुक्त की नियुक्ति में देरी पर उत्तराखंड हाईकोर्ट सख्त; सचिव को व्यक्तिगत रूप से पेश होने की चेतावनी

हाईकोर्ट ने लोकायुक्त की नियुक्ति में विफल रहने पर राज्य सरकार से 24 घंटे के भीतर जवाब मांगा है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि एक खाली संस्था पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, जबकि भ्रष्टाचार के मामलों की जांच के लिए कोई स्वतंत्र निकाय मौजूद नहीं है।

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने बुधवार को लोकायुक्त की नियुक्ति के लिए सर्च कमेटी की बैठक आयोजित करने में राज्य सरकार की विफलता पर कड़ी नाराजगी जताई। मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने सरकार को जवाब दाखिल करने के लिए केवल 24 घंटे का समय दिया है। हाईकोर्ट ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार अपना जवाब दाखिल करने में विफल रहती है, तो संबंधित सचिव को 15 मई को सुबह 11 बजे व्यक्तिगत रूप से कोर्ट के समक्ष उपस्थित होना होगा।

यह निर्देश 2021 में दायर एक जनहित याचिका (PIL) की सुनवाई के दौरान दिए गए। याचिकाकर्ता ने राज्य में निष्पक्ष जांच तंत्र सुनिश्चित करने के लिए रिक्त लोकायुक्त पद को तत्काल भरने की मांग की है। याचिका में इस बात पर जोर दिया गया है कि पद रिक्त होने के बावजूद, लोकायुक्त संस्थान पर राज्य के खजाने से सालाना लगभग 2 से 3 करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं।

याचिकाकर्ता का तर्क है कि लोकायुक्त की अनुपस्थिति के कारण उत्तराखंड में राजपत्रित अधिकारियों (Gazetted Officers) के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले दर्ज करने के लिए कोई स्वतंत्र संस्था नहीं है। वर्तमान में, राज्य की जांच एजेंसियां सरकार के नियंत्रण में काम करती हैं और इन अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए सरकार की पूर्व अनुमति अनिवार्य है। याचिका के अनुसार, हाल ही में राज्य में कई घोटाले सामने आए हैं, लेकिन स्वतंत्र निकाय न होने से न्याय प्रक्रिया बाधित हो रही है।

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने नियुक्ति प्रक्रिया पूरी करने के लिए एक बार फिर अतिरिक्त समय की मांग की। हालांकि, खंडपीठ ने पिछली समय-सीमाओं के पालन न होने पर सवाल उठाए। कोर्ट ने नोट किया कि सरकार ने पहले इस प्रक्रिया के लिए छह महीने का समय मांगा था, लेकिन कोर्ट ने केवल तीन महीने की मोहलत दी थी।

हाईकोर्ट ने पहले सरकार को 3 अप्रैल को प्रस्तावित सर्च कमेटी की बैठक के निर्णयों के संबंध में हलफनामा दाखिल करने को कहा था। सरकार ने अदालत को सूचित किया कि कोरम पूरा न होने के कारण वह बैठक नहीं हो सकी। इस विफलता के बाद कोर्ट ने मामले को चार सप्ताह के लिए स्थगित कर दिया था, लेकिन इसके बावजूद आदेशों का पालन नहीं किया गया।

हाईकोर्ट के इस सख्त रुख ने राज्य प्रशासन पर सर्च कमेटी के काम में तेजी लाने के लिए भारी दबाव डाल दिया है। 24 घंटे की समय-सीमा और सचिव की व्यक्तिगत पेशी की चेतावनी देकर कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि वह भ्रष्टाचार विरोधी लोकपाल की स्थापना में किसी भी तरह की देरी को बर्दाश्त नहीं करेगा।

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इस मामले की अगली सुनवाई 15 मई को होगी, जहां सरकार के जवाब या सचिव की उपस्थिति से यह तय होगा कि प्रशासनिक पारदर्शिता के लिए जारी इस कानूनी लड़ाई का अगला कदम क्या होगा।

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