‘दिशाहीन हो गई है झारखंड पुलिस’: जांच में विफलता और ‘गंभीर निष्क्रियता’ पर हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी

झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य पुलिस की कार्यप्रणाली पर बेहद सख्त रुख अपनाते हुए सोमवार को कहा कि पुलिस अपनी “दिशा खो चुकी है।” अदालत ने जांच के गिरते स्तर पर गहरी चिंता जताते हुए कहा कि पुलिस की इस विफलता से आम जनता का कानूनी तंत्र पर भरोसा कम हो रहा है।

जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद की पीठ ने यह टिप्पणी उस समय की, जब वे सोनू यादव नामक व्यक्ति द्वारा दायर एक अपील पर सुनवाई कर रहे थे। अदालत ने न केवल पुलिस की कार्यक्षमता पर सवाल उठाए, बल्कि हाल के कई मामलों को उदाहरण के तौर पर पेश किया जहां पुलिस की सुस्ती उजागर हुई थी।

सुनवाई के दौरान जस्टिस प्रसाद ने पुलिस की ‘गंभीर निष्क्रियता’ पर नाराजगी जाहिर की। अदालत ने कहा कि स्थिति ऐसी हो गई है कि अब लगभग हर आपराधिक जांच को आगे बढ़ाने के लिए हाईकोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ रहा है और विशिष्ट निर्देश देने पड़ रहे हैं। अदालत के अनुसार, यह दर्शाता है कि पुलिस स्वतंत्र और प्रभावी जांच करने में सक्षम नहीं दिख रही है।

पीठ ने पुलिस की विफलता को रेखांकित करने के लिए तीन प्रमुख मामलों का हवाला दिया:

  • कोकर का मामला: कोकर से लापता 18 महीने के मासूम का अब तक सुराग न लग पाना।
  • बोकारो कंकाल केस: एक लापता लड़की के मामले में पुलिस को घटना के सात महीने बाद जाकर कंकाल मिला।
  • 2020 बोकारो हत्याकांड: एक युवती के लापता होने का मामला, जिसमें हाईकोर्ट की निगरानी शुरू होने के बाद ही यह खुलासा हो सका कि उसकी हत्या की जा चुकी है।
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यह पूरा मामला सोनू यादव की उस याचिका से जुड़ा था, जिसमें उसने अपनी आठ साल की सजा को निलंबित करने की मांग की थी। साहिबगंज सत्र न्यायालय ने यादव को एक गवाह की हत्या के मामले में दोषी करार दिया था। आरोप है कि यादव और उसके साथियों ने उस गवाह को मौत के घाट उतार दिया था, जिसने उनके खिलाफ एक हमले के पुराने मामले में गवाही दी थी। हाईकोर्ट ने अपराध की गंभीरता को देखते हुए सोनू यादव की सजा निलंबित करने की अर्जी को सिरे से खारिज कर दिया।

व्यवस्था में सुधार और जवाबदेही तय करने के उद्देश्य से हाईकोर्ट ने साहिबगंज के पुलिस अधीक्षक (SP) को इस मामले में विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने का आदेश दिया है।

अदालत की इन टिप्पणियों को झारखंड पुलिस प्रशासन के लिए एक बड़े झटके के तौर पर देखा जा रहा है। यह स्पष्ट संदेश है कि न्यायपालिका अब जांच में किसी भी तरह की लापरवाही या ढिलाई को बर्दाश्त नहीं करेगी।

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