एकल स्वामित्व वाली फर्म के चेक बाउंस मामले में हस्ताक्षर न करने वाली पत्नी पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता: कलकत्ता हाईकोर्ट

कलकत्ता हाईकोर्ट ने निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट (NI Act) की धारा 138 के तहत चेक अनादरण (dishonour) के एक मामले में एकल स्वामित्व वाली फर्म (sole proprietorship) के मालिक की पत्नी के खिलाफ शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल “प्रभुत्व और नियंत्रण” के अस्पष्ट आरोपों के आधार पर हस्ताक्षर न करने वाले जीवनसाथी पर आपराधिक दायित्व नहीं थोपा जा सकता।

न्यायमूर्ति उदय कुमार ने माना कि एक एकल स्वामित्व वाली फर्म की अपने मालिक से अलग कोई कानूनी पहचान नहीं होती है। उन्होंने कहा कि निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 141 के तहत ‘परोक्ष दायित्व’ (vicarious liability) के सिद्धांत को मालिक के जीवनसाथी तक नहीं बढ़ाया जा सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता, एन. ममता नागेश ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 528 के तहत हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उन्होंने ‘इंडिट्रेड फिनकॉर्प लिमिटेड’ द्वारा दायर एक शिकायत के आधार पर कोलकाता के 7वें न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष लंबित कार्यवाही को रद्द करने की मांग की थी।

शिकायत के अनुसार, ‘धात्री फ्यूल्स’ (Dhathri Fuels) नामक एक व्यावसायिक प्रतिष्ठान को शिकायतकर्ता NBFC द्वारा वाणिज्यिक ऋण सुविधा दी गई थी। कथित तौर पर देयता के भुगतान के लिए 18 जनवरी, 2022 को एक चेक जारी किया गया था, लेकिन बैंक में पेश करने पर वह “अपर्याप्त धन” के कारण बाउंस हो गया।

अदालत ने पाया कि जीएसटी पंजीकरण प्रमाणपत्र और बैंक रिकॉर्ड के अनुसार ‘धात्री फ्यूल्स’ एक एकल स्वामित्व वाली फर्म थी, जिसका स्वामित्व विशेष रूप से याचिकाकर्ता के पति जी.वी. नागेश के पास था। याचिकाकर्ता न तो फर्म में भागीदार थी, न ही बैंक खाते की अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता, और न ही चेक पर उसके हस्ताक्षर थे।

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याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि उसे मुख्य आरोपी (उसके पति) पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के लिए अनावश्यक रूप से इस मामले में घसीटा गया था।

नोटिस के बावजूद शिकायतकर्ता की अनुपस्थिति

हाईकोर्ट ने दर्ज किया कि बार-बार अवसर दिए जाने के बावजूद शिकायतकर्ता अदालत में पेश नहीं हुआ। डाक रिपोर्ट में “पता छोड़ दिया” (Addressee Left) अंकित था।

न्यायमूर्ति उदय कुमार ने जनरल क्लॉज एक्ट की धारा 27 और साक्ष्य अधिनियम की धारा 114 का हवाला देते हुए माना कि इसे ‘तामील’ (deemed service) माना जाएगा। अदालत ने कहा कि कोई भी पक्ष बिना नया पता दिए परिसर खाली करके कानूनी कार्यवाही को विफल नहीं कर सकता।

धारा 138 NI एक्ट के तहत दायित्व पर अदालत का रुख

अदालत ने कहा कि धारा 138 के तहत आपराधिक दायित्व सख्ती से चेक जारी करने वाले (drawer), हस्ताक्षरकर्ता और खाताधारक तक ही सीमित है। सुप्रीम कोर्ट के ‘जुगेश सहगल बनाम शमशेर सिंह गोगी’ मामले का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि धारा 138 की अनिवार्य शर्तों में से एक यह है कि चेक उसी खाते से जारी होना चाहिए जो आरोपी द्वारा संचालित हो।

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न्यायमूर्ति उदय कुमार ने टिप्पणी की:

“याचिकाकर्ता बैंक खाते के लिए पूरी तरह से अजनबी है।”

अदालत ने आगे कहा:

“हस्ताक्षर न करने वाले व्यक्ति को यह साबित करने के लिए मुकदमे की कठोरता से गुजरने के लिए मजबूर करना कि उसने कुछ गलत नहीं किया, न्याय की स्पष्ट विफलता है।”

एकल स्वामित्व पर धारा 141 लागू नहीं होती

अदालत ने धारा 141 के तहत ‘परोक्ष दायित्व’ लागू करने के शिकायतकर्ता के प्रयास को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि एकल स्वामित्व वाली फर्म कोई अलग कानूनी इकाई नहीं है, इसलिए वह धारा 141 के तहत “कंपनी” की परिभाषा में नहीं आती है।

‘बिजय कुमार मोनी बनाम परेश मन्ना’ मामले का हवाला देते हुए अदालत ने कहा:

“एकल स्वामित्व वाली फर्म NI एक्ट की धारा 141 के अर्थ में ‘कंपनी’ नहीं है।”

निर्णय में यह भी कहा गया कि किसी जीवनसाथी पर केवल वैवाहिक संबंध या व्यावसायिक मामलों पर नियंत्रण के “निराधार दावों” के आधार पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।

त्रुटिपूर्ण मांग नोटिस अभियोजन के लिए घातक

हाईकोर्ट ने धारा 138 के तहत जारी वैधानिक मांग नोटिस में भी एक गंभीर त्रुटि पाई। बाउंस हुए चेक की राशि ₹36,07,687 थी, जबकि मांग नोटिस में केवल ₹7,607 की मांग की गई थी।

अदालत ने माना कि कानून के अनुसार नोटिस में उसी राशि की मांग की जानी चाहिए जो चेक पर अंकित हो। त्रुटिपूर्ण नोटिस के कारण अभियोजन कानूनी रूप से टिकने योग्य नहीं रहा। न्यायमूर्ति ने निष्कर्ष निकाला कि इस मामले में वैधानिक नोटिस “शुरुआत से ही शून्य” (void ab initio) है।

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मजिस्ट्रेट के ‘गेटकीपिंग’ कर्तव्य की विफलता

अदालत ने यह भी कहा कि मजिस्ट्रेट ने धारा 202 CrPC (अब धारा 225 BNSS) के तहत अनिवार्य जांच नहीं की। यह जांच उस स्थिति में अनिवार्य है जब आरोपी अदालत के क्षेत्रीय क्षेत्राधिकार से बाहर रहता हो। याचिकाकर्ता कर्नाटक की स्थायी निवासी थी, जबकि शिकायत कोलकाता में दर्ज की गई थी।

कार्यवाही रद्द

अदालत ने माना कि याचिकाकर्ता के खिलाफ कार्यवाही जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। हाईकोर्ट ने पुनरीक्षण याचिका (revision petition) को स्वीकार करते हुए याचिकाकर्ता के खिलाफ कार्यवाही रद्द कर दी। साथ ही, उसके खिलाफ जारी सभी समन, वारंट और लुक-आउट सर्कुलर भी निरस्त कर दिए गए।

मामले का विवरण:

  • केस का नाम: एन. ममता नागेश बनाम पश्चिम बंगाल राज्य और अन्य।
  • केस नंबर: CRR 2270 of 2025
  • पीठ: न्यायमूर्ति उदय कुमार
  • निर्णय की तिथि: 8 मई, 2026

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