घातक दुर्घटना दावों को याचिका नहीं, बल्कि सिविल सूट के रूप में दर्ज किया जाना चाहिए: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि ‘घातक दुर्घटना अधिनियम, 1855’ (Fatal Accidents Act, 1855) की धारा 1A के तहत दायर ‘घातक दुर्घटना मूल याचिका’ (FAOP) में पारित डिक्री के खिलाफ सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 96 के तहत अपील सुनवाई योग्य है। जस्टिस रवि नाथ तिलहरी और जस्टिस बालाजी मेडमल्ली की खंडपीठ ने कहा कि अधिनियम के तहत “कार्रवाई” (Action) और “मुकदमा” (Suit) शब्द एक-दूसरे के पर्यायवाची हैं और ऐसी कार्यवाही में सिविल सूट की सभी विशेषताएं मौजूद होती हैं। इसी के साथ हाईकोर्ट ने सामान्य निर्देश जारी किए कि भविष्य में 1855 के अधिनियम के तहत सभी दावों को मूल वाद (Original Suit) के रूप में दर्ज किया जाए, न कि FAOP के रूप में।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला विशाखापत्तनम के प्रधान जिला न्यायाधीश की अदालत में दायर मूल याचिका संख्या 55/2018 (FAOP) से शुरू हुआ था। याचिकाकर्ताओं (वर्तमान अपील में प्रतिवादी संख्या 1 और 2) ने 5 अक्टूबर 2016 को एक दुर्घटना में अपने बेटे की मृत्यु के बाद ₹20,00,000 के मुआवजे की मांग की थी। जिला न्यायाधीश ने 19 नवंबर 2025 को दावे को स्वीकार करते हुए 9% वार्षिक ब्याज के साथ पूरी राशि मंजूर कर दी थी।

जब इस फैसले के खिलाफ ‘सिविल मिसलेनियस अपील’ (CMA) दायर की गई, तो रजिस्ट्री ने इसकी पोषणीयता (Maintainability) और कोर्ट फीस के मूल्यांकन को लेकर आपत्ति जताई। इसके बाद अपीलकर्ता ने मामले को धारा 96 CPC के तहत ‘अपील सूट’ (AS) के रूप में फिर से प्रस्तुत किया। हालांकि, रजिस्ट्री इस बात पर संशय में थी कि क्या धारा 96 के तहत अपील—जो किसी मुकदमे (Suit) की डिक्री के खिलाफ होती है—एक “मूल याचिका” (Original Petition) में पारित आदेश के खिलाफ मान्य हो सकती है।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता के वकील श्री जी. रमेश बाबू ने तर्क दिया कि भले ही कार्यवाही को FAOP का नाम दिया गया था, लेकिन जिला न्यायाधीश ने धारा 1A के तहत दावे का न्यायनिर्णयन किया और एक औपचारिक डिक्री तैयार की। उन्होंने दलील दी कि चूंकि अपीलकर्ता के खिलाफ डिक्री पारित की गई थी, इसलिए धारा 96 CPC के तहत अपील सुनवाई योग्य है। उन्होंने गौहाटी हाईकोर्ट के श्रीमती माया रानी घोष बनाम त्रिपुरा राज्य मामले का हवाला देते हुए कहा कि अपील को स्वीकार न करने की रजिस्ट्री की आपत्ति गलत थी।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने निर्णय के लिए दो मुख्य बिंदु तय किए: क्या घातक दुर्घटना अधिनियम के तहत FAOP में पारित डिक्री के खिलाफ धारा 96 CPC के तहत अपील की जा सकती है, और इस पर देय कोर्ट फीस क्या होगी।

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खंडपीठ ने CPC की धारा 2(2) के तहत “डिक्री” की परिभाषा की जांच की, जिसमें कहा गया है कि डिक्री के लिए किसी मुकदमे में पक्षों के अधिकारों का अंतिम निर्धारण आवश्यक है। “सूट” (Suit) की परिभाषा पर कोर्ट ने प्रिवी काउंसिल के हंसराज गुप्ता बनाम ऑफिशियल लिक्विडेटर्स मामले का संदर्भ दिया, जिसमें कहा गया था कि सूट एक ऐसी सिविल कार्यवाही है जो वाद-पत्र (Plaint) की प्रस्तुति से शुरू होती है।

घातक दुर्घटना अधिनियम, 1855 का विश्लेषण करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि इसकी धारा 1A “कार्रवाई या मुकदमा” (Action or Suit) शब्दों का उपयोग करती है और धारा 3 स्पष्ट रूप से कहती है कि इसके लिए एक “वाद-पत्र” (Plaint) दाखिल किया जाएगा। हाईकोर्ट ने कहा:

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“1855 का अधिनियम मुआवजे के लिए मौलिक अधिकार प्रदान करता है और ‘कार्रवाई’ या ‘मुकदमे’ के माध्यम से उपचार की व्यवस्था करता है… इसके न्यायनिर्णयन के लिए नियमित सिविल कोर्ट के अलावा किसी विशेष मंच जैसे ट्रिब्यूनल या कोर्ट का गठन नहीं किया गया है।”

हाईकोर्ट ने आगे कहा कि “कार्रवाई” (Action) को पारंपरिक रूप से “मुकदमे” (Suit) के समान ही समझा गया है। सुप्रीम कोर्ट के दशरथ रूपसिंह राठौड़ बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले का उल्लेख करते हुए खंडपीठ ने कहा:

“‘कार्रवाई’ (Action) शब्द को पारंपरिक रूप से ‘मुकदमे’ (Suit) के पर्यायवाची के रूप में या अधिकारों के प्रवर्तन के लिए अदालत में सामान्य कार्यवाही के रूप में समझा गया है।”

हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि केवल इसलिए अंतर नहीं किया जाना चाहिए कि मामला O.S. के बजाय FAOP के रूप में पंजीकृत है, बशर्ते उसमें डिक्री के सभी गुण मौजूद हों।

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हाईकोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि धारा 96 CPC के तहत अपील सुनवाई योग्य है। भविष्य के भ्रम को दूर करने के लिए हाईकोर्ट ने निम्नलिखित अनिवार्य निर्देश जारी किए:

  1. घातक दुर्घटना अधिनियम, 1855 की धारा 1A के तहत दावों को उनके क्षेत्रीय और आर्थिक क्षेत्राधिकार के आधार पर सिविल कोर्ट में ही पेश किया जाना चाहिए।
  2. ऐसी कार्यवाहियों को मूल वाद (Original Suit – O.S.) के रूप में दर्ज किया जाएगा, न कि घातक दुर्घटना मूल याचिका (FAOP) के रूप में।
  3. रजिस्ट्री और ट्रायल कोर्ट्स को निर्देश दिया जाता है कि वे ऐसे दावों के लिए FAOP स्वीकार न करें।
  4. वर्तमान में लंबित सभी FAOPs को मूल वाद (O.S.) में परिवर्तित किया जाएगा और उन्हें नए नंबर दिए जाएंगे।
  5. कोर्ट फीस का भुगतान ‘आंध्र प्रदेश कोर्ट फीस और सूट वैल्यूएशन एक्ट, 1956’ के अनुसार किया जाना चाहिए।

खंडपीठ ने रजिस्ट्रार (न्यायिक) को निर्देश दिया कि वे राज्य की सभी निचली अदालतों में इन निर्देशों के कार्यान्वयन के लिए आवश्यक कदम उठाएं।

केस विवरण:

केस का शीर्षक: बीरेंद्र प्रसाद जैन बनाम माचा रामा कृष्णा और 3 अन्य
केस संख्या: सिविल मिसलेनियस अपील (SR). संख्या 9643/2026
पीठ: जस्टिस रवि नाथ तिलहरी और जस्टिस बालाजी मेडमल्ली
दिनांक: 29.04.2026

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