बॉम्बे हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: निर्माण पूरा होने के बाद सैन्य प्रतिष्ठानों से ‘NOC’ की मांग गलत; इमारतों को OC देने का निर्देश

बॉम्बे हाईकोर्ट ने संपत्ति के अधिकार को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई निर्माण कार्य वैध और स्वीकृत नक्शों के आधार पर काफी हद तक पूरा हो चुका है, तो अधिकारी बाद में रक्षा प्रतिष्ठानों से अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) की मांग नहीं कर सकते। हाईकोर्ट ने आईएनएस (INS) त्राता के पास स्थित एक आवासीय परियोजना को ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट (OC) जारी करने का निर्देश देते हुए नौसेना की एनओसी की शर्त को “मनमाना और अवैध” करार दिया है।

इस मामले में मुख्य कानूनी सवाल यह था कि क्या नियोजन प्राधिकरण और नौसेना अधिकारी, वर्षों तक निर्माण की अनुमति देने के बाद, परियोजना के अंतिम चरण में सुरक्षा एनओसी की मांग कर निर्माण कार्य रोक सकते हैं। हाईकोर्ट ने इस मामले में राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं और संविधान के अनुच्छेद 300A के तहत संपत्ति के अधिकार के बीच संतुलन की समीक्षा की।

यह याचिका टेक्नो फ्रेशवर्ल्ड एलएलपी (Techno Freshworld LLP) द्वारा दायर की गई थी, जो मध्य मुंबई के वर्ली में स्थित ‘प्रभादेवी इंद्रप्रस्थ सहकारी गृहनिर्माण संस्था’ का विकास कर रहे हैं। इस परियोजना में दो आवासीय इमारतें शामिल हैं, जिनमें से एक 72 मूल निवासियों (किरायेदारों) के पुनर्वास के लिए है।

परियोजना की शुरुआत से ही, राज्य सरकार के नियोजन प्राधिकरण म्हाडा (MHADA) ने समय-समय पर कमेंसमेंट सर्टिफिकेट (CC) जारी किए और उन्हें नवीनीकृत किया। हालांकि, अक्टूबर 2025 में जब एक इमारत पूरी हो चुकी थी और दूसरी का काम अंतिम चरण में था, तब म्हाडा ने “काम रोकने” (Stop Work) का नोटिस जारी कर दिया। म्हाडा ने इस आधार पर ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट (OC) देने से इनकार कर दिया कि डेवलपर के पास पास में स्थित नौसेना प्रतिष्ठान ‘INS त्राता’ से अनिवार्य एनओसी नहीं है।

याचिकाकर्ता (टेक्नो फ्रेशवर्ल्ड एलएलपी) की ओर से दलील दी गई कि उन्होंने नियोजन प्राधिकरण द्वारा दी गई मंजूरी और स्वीकृत नक्शों के अनुसार ही काम किया है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि म्हाडा ने पूरे निर्माण कार्य के दौरान कभी भी नौसेना की एनओसी का मुद्दा नहीं उठाया और अब अंतिम समय में इसे रोकना गलत है।

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प्रतिवादी (म्हाडा और रक्षा प्राधिकरण) ने तर्क दिया कि INS त्राता की निकटता के कारण सुरक्षा जोखिम और खतरे की संभावना है। अधिकारियों का कहना था कि संवेदनशील सैन्य प्रतिष्ठानों के आसपास की इमारतों के लिए सुरक्षा एनओसी एक अनिवार्य आवश्यकता है ताकि आधार की सुरक्षा और अखंडता सुनिश्चित की जा सके।

जस्टिस जी. एस. कुलकर्णी और जस्टिस आरती साठे की खंडपीठ ने अधिकारियों की इस मांग के समय और इसके चयनात्मक होने पर सवाल उठाए। हाईकोर्ट ने कहा कि यदि सुरक्षा को लेकर कोई वास्तविक चिंता थी, तो उसे निर्माण शुरू होने से पहले ही उठाया जाना चाहिए था।

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हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा:

“यदि सुरक्षा चिंताओं और खतरे की आशंका को लेकर रक्षा विभाग के तर्क का वास्तव में कोई आधार है, तो कानून के तहत आवश्यक सभी कदम किसी भी निर्माण गतिविधि (सैन्य प्रतिष्ठानों के पास) की शुरुआत में ही उठाए जाने चाहिए।”

हाईकोर्ट ने अधिकारियों के “लापरवाह रवैये” की आलोचना करते हुए कहा कि जब निर्माण कार्य कानूनी अनुमतियों के आधार पर अपने अंतिम चरण (fag end) में पहुंच चुका है, तब इसे रोकना अनुचित है। हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि INS त्राता के पास पहले से ही कई इमारतें मौजूद हैं, जिनमें से कुछ बिना एनओसी के बनी हैं।

हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:

“हमारी राय है कि नौसेना अधिकारियों द्वारा एनओसी की आवश्यकता को चयनात्मक रूप से थोपा नहीं जा सकता।” अदालत ने आगे कहा कि ऐसी एनओसी की मांग “गैर-मनमानी, निष्पक्ष और तर्कसंगत” होनी चाहिए।

इसके अलावा, हाईकोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 300A का हवाला देते हुए कहा कि संपत्ति के अधिकार में तब तक हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता जब तक कि कानून इसकी अनुमति न देता हो। हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता की इमारतें उन निर्धारित मानकों के दायरे से बाहर थीं जहां एनओसी अनिवार्य होती है।

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हाईकोर्ट ने अक्टूबर 2025 के काम रोकने के नोटिस और म्हाडा द्वारा ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट (OC) को खारिज करने वाले पत्र को रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि म्हाडा द्वारा कमेंसमेंट सर्टिफिकेट जारी करना वैध था, जबकि एनओसी न होने के आधार पर ओसी से इनकार करना मनमाना था।

हाईकोर्ट ने अधिकारियों को दोनों इमारतों के लिए ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट जारी करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाने का निर्देश दिया ताकि डेवलपर और 72 मूल किरायेदारों के अधिकारों की रक्षा हो सके।

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