कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक पति को अपनी पत्नी, जो क्रिटिकल केयर मेडिसिन की विशेषज्ञ डॉक्टर है, को ₹12,000 प्रति माह अंतरिम भरण-पोषण देने के आदेश को रद्द कर दिया है। दंड प्रक्रिया संहिता (Cr.P.C.) की धारा 482 के तहत अपने अंतर्निहित क्षेत्राधिकार का उपयोग करते हुए, जस्टिस उदय कुमार ने टिप्पणी की कि सामाजिक न्याय से जुड़े कानूनों के दुरुपयोग और “व्यावसायिक परजीवीवाद” (professional parasitism) को रोकने के लिए उच्च योग्यता प्राप्त पेशेवर की “कमाने की क्षमता” की जांच करना अनिवार्य है। हालांकि, कोर्ट ने दंपति की नाबालिग बेटी के लिए ₹8,000 प्रति माह के भरण-पोषण को बरकरार रखा और स्पष्ट किया कि बच्चे का भरण-पोषण का अधिकार माता-पिता के विवादों से स्वतंत्र है।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता, जो कलकत्ता इलेक्ट्रिक सप्लाई कॉर्पोरेशन (CESC) में एक इंजीनियर है, का विवाह 19 मार्च 2014 को हुआ था। पत्नी एक MBBS और DNB विशेषज्ञ डॉक्टर हैं और वुडलैंड्स तथा आर.एन. टैगोर जैसे प्रतिष्ठित अस्पतालों में सीनियर रजिस्ट्रार के रूप में कार्य कर चुकी हैं। मार्च 2021 में आपसी मतभेदों के कारण दोनों अलग हो गए, जिसके बाद पत्नी ने घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण (P.W.D.V.) अधिनियम, 2005 के तहत कार्यवाही शुरू की।
1 जून, 2022 को बनगांव के न्यायिक मजिस्ट्रेट ने एक अंतरिम आदेश के माध्यम से पति को पत्नी के लिए ₹12,000 और नाबालिग बेटी के लिए ₹8,000 भुगतान करने का निर्देश दिया था। याचिकाकर्ता ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए तर्क दिया कि पत्नी ने अपनी पेशेवर स्थिति और कमाई की क्षमता को छिपाया है।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता (पति) के लिए: विद्वान वकील श्री प्रीतम चौधरी ने तर्क दिया कि मजिस्ट्रेट का आदेश “प्रक्रियात्मक शून्यता” (procedural nullity) है क्योंकि यह घरेलू घटना रिपोर्ट (DIR) दर्ज होने के दिन ही पारित कर दिया गया था, जो कि रजनीश बनाम नेहा मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा अनिवार्य की गई संपत्तियों और देनदारियों के हलफनामे (Affidavits of Assets and Liabilities) के आदान-प्रदान के नियम का उल्लंघन है। उन्होंने कहा कि एक विशेषज्ञ डॉक्टर होने के नाते पत्नी को “भरण-पोषण करने में असमर्थ” नहीं माना जा सकता और उनकी बेरोजगारी का दावा एक सोची-समझी साजिश है।
प्रतिवादी संख्या 2 (पत्नी) के लिए: विद्वान वकील श्री शिबाजी कुमार दास ने दलील दी कि यह पुनरीक्षण आवेदन (Revision) अपील की वैधानिक प्रक्रिया से बचने का एक प्रयास है। उन्होंने तर्क दिया कि पेशेवर डिग्रियां होने मात्र से “वास्तविक बेरोजगारी” की सच्चाई नहीं बदल जाती। उन्होंने दावा किया कि पति द्वारा किए गए उत्पीड़न और बच्चे की देखभाल की जिम्मेदारी के कारण पत्नी को अपनी प्रैक्टिस छोड़नी पड़ी।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
कोर्ट ने इस मामले में क्षेत्राधिकार, प्रक्रियात्मक उचितता और “कमाई की क्षमता” के सिद्धांत पर ध्यान केंद्रित किया।
1. प्रक्रियात्मक खामियों पर: कोर्ट ने कहा कि वैधानिक अपील (Section 29) का विकल्प होने मात्र से हाईकोर्ट की अंतर्निहित शक्तियों पर रोक नहीं लगती, विशेषकर तब जब प्रक्रिया में स्पष्ट अवैधता हो। प्रभु चावला बनाम राजस्थान राज्य का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट द्वारा रजनीश बनाम नेहा के निर्देशों का पालन न करना आदेश को कानूनी रूप से कमजोर बनाता है।
कोर्ट ने टिप्पणी की:
“रजनीश बनाम नेहा में स्थापित अनिवार्य प्रकटीकरण व्यवस्था की अवहेलना में पारित अंतरिम भरण-पोषण आदेश केवल विवेक की त्रुटि नहीं, बल्कि क्षेत्राधिकार की विकृति (jurisdictional perversity) है।”
2. ‘कमाने की क्षमता’ और विशेषज्ञ पेशेवर: कोर्ट ने पत्नी के उस दावे की जांच की जिसमें उन्होंने खुद को “भरण-पोषण करने में असमर्थ” बताया था। कोर्ट ने पाया कि पत्नी ने अपनी DNB विशेषज्ञता और पूर्व अनुभव को छिपाया। ममता ममगैन बनाम पवन कुमार मामले का संदर्भ देते हुए कोर्ट ने कहा:
“कानून किसी उच्च योग्य व्यक्ति को खाली बैठने और दूसरे जीवनसाथी पर वित्तीय बोझ बनने की अनुमति नहीं देता है, विशेष रूप से तब जब उनके पास विशेषज्ञ और उच्च मांग वाले कौशल हों।”
जस्टिस कुमार ने यह भी स्पष्ट किया कि “कमाई की क्षमता” पर विचार करना अंतरिम चरण में भी अनिवार्य है। कोर्ट ने कहा कि क्रिटिकल केयर जैसे क्षेत्र में मांग हमेशा रहती है और पत्नी का पूरी तरह से पेशेवर कार्य से पीछे हटना उनके दावे की सत्यता पर संदेह पैदा करता है।
3. नाबालिग बच्चे का कल्याण: कोर्ट ने पत्नी और बच्चे के अधिकारों के बीच एक स्पष्ट अंतर रेखा खींची। ‘पेरेंस पैट्रिया’ (Parens Patriae) के सिद्धांत का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि बच्चे का भरण-पोषण पिता का “पूर्ण और गैर-हस्तांतरणीय दायित्व” है। कोर्ट ने ₹8,000 की राशि को एक इंजीनियर-डॉक्टर दंपति के सामाजिक-आर्थिक स्तर के अनुरूप उचित माना।
हाईकोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने पुनरीक्षण आवेदन का निपटारा करते हुए निम्नलिखित निर्देश दिए:
- पत्नी को ₹12,000 प्रति माह देने का आदेश रद्द किया जाता है और मामले को मजिस्ट्रेट के पास पुनर्विचार के लिए वापस भेजा जाता है।
- मजिस्ट्रेट यह सुनिश्चित करेंगे कि दोनों पक्ष रजनीश बनाम नेहा के प्रारूप के अनुसार अपनी संपत्तियों और देनदारियों का हलफनामा दाखिल करें।
- मजिस्ट्रेट को यह तय करना होगा कि पत्नी की बेरोजगारी “वैवाहिक क्रूरता का परिणाम है या भरण-पोषण के दावे को बढ़ाने के लिए एक रणनीतिक कदम।”
- बेटी के लिए ₹8,000 प्रति माह के भरण-पोषण को बरकरार रखा गया है। पति को निर्देश दिया गया है कि वह जून 2026 से चार किश्तों में बकाया राशि का भुगतान करे।
- पत्नी के व्यक्तिगत भरण-पोषण के लिए पहले से भुगतान की गई किसी भी राशि का समायोजन मजिस्ट्रेट द्वारा निर्धारित अंतिम राशि के साथ किया जाएगा।
मामले का विवरण:
- केस टाइटल: ज्योतिर्मय बिस्वास बनाम पश्चिम बंगाल राज्य एवं अन्य
- केस नंबर: CRR 3578 OF 2022
- पीठ: जस्टिस उदय कुमार
- दिनांक: 5 मई, 2026

