बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) ने भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत को पत्र लिखकर आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के जस्टिस तरलादा राजशेखर राव से न्यायिक कार्य वापस लेने की मांग की है। यह कदम हाल ही में एक सुनवाई के दौरान जज और एक वकील के बीच हुए तीखे विवाद का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद उठाया गया है।
घटनाक्रम
यह मामला एक रिट याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आया, जिसमें याचिकाकर्ता ने अपने खिलाफ जारी लुक आउट सर्कुलर (LOC) और पासपोर्ट जब्त किए जाने की कार्रवाई को चुनौती दी थी। सुनवाई के दौरान, जब जज ने एक पुराने फैसले का संदर्भ लेने के लिए मामले को स्थगित करने का संकेत दिया, तब स्थिति तनावपूर्ण हो गई।

वीडियो और रिपोर्टों के अनुसार, कोर्ट रूम में बहस के दौरान जस्टिस राव वकील के व्यवहार से असंतुष्ट दिखे। जज ने वकील की वरिष्ठता और उनके पेशेवर आचरण पर सवाल उठाते हुए पुलिस को बुलाया और मौखिक रूप से वकील को 24 घंटे की हिरासत में लेने का निर्देश दे दिया।
हाईकोर्ट की टिप्पणियां
जज ने कार्यवाही के दौरान वकील के आचरण को ‘अकर्मण्य’ (indolent) बताया। स्थिति को दर्ज करने के लिए कोर्ट ने वहां मौजूद अन्य वकीलों से अपने नाम बताने को कहा, ताकि उन्हें आधिकारिक आदेश में गवाह के रूप में शामिल किया जा सके।
हालांकि वकील ने अपनी शारीरिक पीड़ा का हवाला देते हुए हाथ जोड़कर माफी मांगी और उदारता की गुहार लगाई, लेकिन शुरुआत में कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाए रखा। जज ने यहां तक कहा कि यदि वकील आदेश से असंतुष्ट हैं, तो वे बार एसोसिएशन के साथ मिलकर धरना भी दे सकते हैं।
ताजा अपडेट और हस्तक्षेप
वकील को हिरासत में लेने का आदेश आधिकारिक रूप से हस्ताक्षरित नहीं किया गया था। हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के तत्काल हस्तक्षेप के बाद, जज ने अपना निर्णय बदल दिया और वकील को पुलिस हिरासत में भेजने का निर्देश रद्द कर दिया। पासपोर्ट और एलओसी से जुड़े मुख्य मामले को अब गर्मियों की छुट्टियों के बाद सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया है।
बार काउंसिल ऑफ इंडिया की प्रतिक्रिया
बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने इस पूरी घटना पर गहरा ऐतराज जताया है। बीसीआई के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा ने मुख्य न्यायाधीश को लिखे पत्र में कहा कि इस तरह की घटनाएं वकीलों, विशेषकर युवा वकीलों के मनोबल पर बुरा प्रभाव डालती हैं। परिषद का तर्क है कि इस प्रकार का व्यवहार न्यायिक गरिमा के अनुकूल नहीं है और मांग की है कि जांच होने तक जस्टिस राव को न्यायिक कार्यों से दूर रखा जाए।
बीसीआई का मानना है कि भले ही वकील की गिरफ्तारी नहीं हुई, लेकिन अदालत में उनके साथ किया गया व्यवहार और जेल भेजने की धमकी देना ही अपने आप में एक गंभीर मुद्दा है जिसके लिए प्रशासनिक हस्तक्षेप आवश्यक है।

