नाबालिग के मामले में सहमति का कोई महत्व नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट ने रेप की सजा बरकरार रखी, अपहरण के आरोपों को किया रद्द

दिल्ली हाईकोर्ट ने अपहरण और रेप के मामले में दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति की अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376(2)(n) के तहत दुष्कर्म की सजा को बरकरार रखा है। हालांकि, हाईकोर्ट ने अपहरण और व्याहरण (abduction) के आरोपों में दी गई सजा को रद्द कर दिया है। जस्टिस चंद्रशेखरन सुधा ने कहा कि यद्यपि साक्ष्यों से यह संकेत मिलता है कि नाबालिग पीड़िता अपनी मर्जी से दोषी के साथ गई थी, लेकिन कानून में उसकी सहमति का कोई महत्व नहीं है क्योंकि घटना के समय वह सहमति देने की कानूनी उम्र से कम थी।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 20 जनवरी 2014 को गोकलपुरी पुलिस स्टेशन में पीड़िता के पिता द्वारा दर्ज कराई गई एक FIR से शुरू हुआ था। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि आरोपी सुहैल ने पीड़िता (जिसकी उम्र उस समय लगभग 15 वर्ष और 6 महीने थी) को उसके माता-पिता के कानूनी संरक्षण से अगवा किया और उसे दिल्ली तथा उत्तर प्रदेश के रामपुर के होटलों में ले गया, जहाँ उसने उसकी इच्छा के विरुद्ध शारीरिक संबंध बनाए।

11 नवंबर 2016 को कड़कड़डूमा कोर्ट के एडिशनल सेशंस जज ने आरोपी को IPC की धारा 363 (अपहरण), 366 (अवैध संबंध बनाने के लिए अपहरण) और 376(2)(n) (रेप) के साथ-साथ POCSO एक्ट की धारा 6 के तहत दोषी ठहराया था। उसे 7 से 10 साल तक के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई थी, जिसे आरोपी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता/आरोपी के वकील ने तर्क दिया कि अभियोजन पक्ष पीड़िता के नाबालिग होने को निर्णायक रूप से साबित करने में विफल रहा। उन्होंने तर्क दिया कि जन्म प्रमाण पत्र (Ext. PW5/A) विश्वसनीय नहीं है। बचाव पक्ष ने यह भी दलील दी कि 2007 में रजोदर्शन (menarche) होने के आधार पर पीड़िता 2016 तक वयस्क हो गई होगी। इसके अतिरिक्त, यह भी कहा गया कि पीड़िता के बयान विरोधाभासी थे और वह अपनी मर्जी से आरोपी के साथ गई थी।

दूसरी ओर, एडिशनल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर और पीड़िता के वकील ने तर्क दिया कि नगर निगम द्वारा जारी जन्म प्रमाण पत्र नाबालिग होने का पुख्ता सबूत है। उन्होंने कहा कि एक बार नाबालिग होना साबित हो जाने के बाद सहमति का प्रश्न अप्रासंगिक हो जाता है। खुद आरोपी ने भी धारा 313 के तहत दिए गए अपने बयान में शारीरिक संबंध बनाने की बात स्वीकार की थी, हालांकि उसने इसे आपसी सहमति से बताया था।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने सबसे पहले अपहरण से जुड़े साक्ष्यों की जांच की। जस्टिस सुधा ने पीड़िता की गवाही में महत्वपूर्ण विसंगतियों को नोट किया और बताया कि पीड़िता ने खुद स्वीकार किया था कि वह अपने भाई द्वारा पीटे जाने के बाद निराशा में खुद आरोपी के पास गई थी।

हाईकोर्ट ने कहा:

“उसकी गवाही को पूरी तरह पढ़ने पर अभियोजन पक्ष के बहला-फुसलाकर ले जाने या अपहरण के दावों पर संदेह पैदा होता है… उसने आगे स्वीकार किया कि रामपुर जाने से ठीक पहले उसके भाई ने उसे पीटा था और निराशा के कारण उसने खुद आरोपी को फोन किया और पूछा कि क्या वह 2 से 3 दिनों के लिए उसके साथ आ सकती है।”

इन स्वीकारोक्तियों के आधार पर हाईकोर्ट ने अपहरण के मामले को “काफी संदिग्ध” माना और कहा कि ट्रायल कोर्ट ने अपीलकर्ता को धारा 363 और 366 के तहत दोषी ठहराने में गलती की है।

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रेप की सजा के संबंध में हाईकोर्ट ने पीड़िता की उम्र पर ध्यान केंद्रित किया। कोर्ट ने जुवेनाइल जस्टिस एक्ट, 2015 की धारा 94 का हवाला दिया, जो नगर निकायों के जन्म प्रमाण पत्र को प्राथमिकता देती है। कोर्ट ने पुष्टि की कि पीड़िता की जन्म तिथि 22 जुलाई 1998 थी, जिससे घटना के समय उसकी उम्र 15 साल 6 महीने साबित होती है।

रजोदर्शन (menarche) जैसे जैविक संकेतों के आधार पर दी गई बचाव पक्ष की दलील को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा:

“रजोदर्शन की शुरुआत हर व्यक्ति में अलग-अलग होती है… और इसलिए, इसे उम्र निर्धारण के लिए एक विश्वसनीय या कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त तरीका नहीं माना जा सकता है, विशेष रूप से तब जब जन्म प्रमाण पत्र जैसे दस्तावेजी सबूत उपलब्ध हों।”

सहमति के मुद्दे पर हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि भले ही पीड़िता के साथ “जबरदस्ती” का दावा संदिग्ध हो और कृत्य आपसी सहमति से प्रतीत होता हो, लेकिन कानून स्पष्ट है:

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“जैसा कि आरोपी द्वारा कहा गया है, यह निश्चित रूप से आपसी सहमति से किया गया कृत्य प्रतीत होता है, लेकिन चूंकि पीड़िता अपराध के समय नाबालिग थी, इसलिए उसकी सहमति का कोई महत्व नहीं है। अतः धारा 375 के तहत दुष्कर्म का अपराध निश्चित रूप से बनता है।”

निर्णय

दिल्ली हाईकोर्ट ने अपील को आंशिक रूप से स्वीकार किया। कोर्ट ने IPC की धारा 363 और 366 के तहत दोषसिद्धि और सजा को रद्द कर दिया। हालांकि, हाईकोर्ट ने IPC की धारा 376(2)(n) के तहत आरोपी की दोषसिद्धि और 10 साल के कठोर कारावास की सजा को बरकरार रखा।

मामले का विवरण

केस का शीर्षक: सुहैल बनाम राज्य (Suhail v. State)

केस संख्या: CRL.A. 240/2017

पीठ: जस्टिस चंद्रशेखरन सुधा

दिनांक: 4 मई, 2026

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