महाराष्ट्र सरकार ने बॉम्बे हाईकोर्ट को सूचित किया है कि मुस्लिम समुदाय को 5 प्रतिशत आरक्षण देने वाला 2014 का अध्यादेश अपनी घोषणा के कुछ ही महीनों बाद समाप्त हो गया था। सरकार के अनुसार, चूंकि इसे कभी कानून (Act) का रूप नहीं दिया गया, इसलिए इस साल फरवरी में जारी किया गया सरकारी प्रस्ताव (GR) तकनीकी रूप से किसी मौजूदा आरक्षण को रद्द नहीं करता है।
यह दलील राज्य सरकार ने अधिवक्ता सैयद एजाज नकवी द्वारा दायर एक याचिका के जवाब में दिए गए हलफनामे में पेश की। याचिकाकर्ता ने 17 फरवरी, 2024 के सरकारी प्रस्ताव को चुनौती देते हुए इसे “नस्लीय भेदभाव” और मुस्लिम समुदाय के संवैधानिक हितों के खिलाफ बताया था।
इस मामले की जड़ें जुलाई 2014 में हैं, जब तत्कालीन कांग्रेस-राकांपा सरकार ने मराठा समुदाय के लिए 16 प्रतिशत और मुस्लिम समुदाय के लिए 5 प्रतिशत आरक्षण की घोषणा की थी। इसे सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग की श्रेणी में रखा गया था।
हालांकि बॉम्बे हाईकोर्ट ने उस समय नौकरियों में आरक्षण पर रोक लगा दी थी, लेकिन शिक्षण संस्थानों में 5 प्रतिशत को जारी रखने की अनुमति दी थी। वर्तमान सरकार का तर्क है कि क्योंकि उस अध्यादेश को राज्य विधानमंडल द्वारा कभी पारित नहीं कराया गया, इसलिए दिसंबर 2014 तक उसकी कानूनी वैधता स्वतः ही समाप्त हो गई।
सामाजिक न्याय और विशेष सहायता विभाग द्वारा दायर हलफनामे में सरकार ने भेदभाव के सभी आरोपों को “निराधार और लापरवाह” बताते हुए खारिज कर दिया। सरकार ने स्पष्ट किया कि बिना किसी वैधानिक आधार (Statutory Backing) के कोई भी आरक्षण जारी नहीं रह सकता।
सरकार के हलफनामे की मुख्य बातें:
- अध्यादेश की समाप्ति: जुलाई 2014 का अध्यादेश दिसंबर 2014 में समाप्त हो गया और उसके बाद इसे किसी वैध कानून द्वारा प्रतिस्थापित नहीं किया गया।
- कानूनी अधिकार का अभाव: चूंकि अध्यादेश लैप्स हो गया है, इसलिए उस पुराने कार्यकारी आदेश के आधार पर अब किसी भी अधिकार का दावा नहीं किया जा सकता।
- संवैधानिक सीमाएं: हलफनामे में कहा गया कि भारत का संविधान केवल धर्म के आधार पर आरक्षण देने की परिकल्पना नहीं करता है।
- शक्तियों का पृथक्करण: राज्य ने तर्क दिया कि कोर्ट विधायिका को कानून बनाने या किसी समाप्त हो चुके अध्यादेश को पुनर्जीवित करने का निर्देश नहीं दे सकता।
फरवरी में जारी नए सरकारी प्रस्ताव (GR) के माध्यम से, विशेष पिछड़ा वर्ग (A) के तहत मुस्लिम समूह को मिलने वाले 5 प्रतिशत आरक्षण से संबंधित 2014 के सभी पिछले निर्णयों और परिपत्रों को आधिकारिक रूप से रद्द कर दिया गया है।
इस आदेश के बाद, राज्य ने इस श्रेणी के तहत मुस्लिमों को जाति और नॉन-क्रीमी लेयर प्रमाणपत्र जारी करना बंद कर दिया है। सरकार का मानना है कि यह कदम पूरी तरह से “कानूनी और वैध” है।
अधिवक्ता नकवी ने इस जीआर को रद्द करने की मांग की है। अब इस मामले की सुनवाई जस्टिस आर. आई. चागला और जस्टिस अद्वैत सेठना की बेंच 4 मई को करेगी।

