यूपी के मदरसों की जांच में NHRC के क्षेत्राधिकार पर इलाहाबाद हाईकोर्ट में मतभेद; जस्टिस श्रीधरन ने ‘गैर-मानवाधिकार’ मुद्दों में हस्तक्षेप पर उठाए सवाल

इलाहाबाद हाईकोर्ट की एक डिवीजन बेंच के सदस्यों के बीच उत्तर प्रदेश के 588 मदरसों में वित्तीय और बुनियादी ढांचे की अनियमितताओं की जांच करने के राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के अधिकार को लेकर मतभेद सामने आया है। जहां जस्टिस अतुल श्रीधरन ने उन मामलों में NHRC के “दखल” पर सवाल उठाए जो प्रथम दृष्टया मानवाधिकारों से संबंधित नहीं हैं, वहीं जस्टिस विवेक सरण ने असहमति जताते हुए कहा कि NHRC सहित सभी पक्षों को सुने बिना ऐसी प्रतिकूल टिप्पणियां नहीं की जानी चाहिए थीं।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला NHRC के समक्ष दायर एक शिकायत से शुरू हुआ था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि उत्तर प्रदेश में 588 मदरसे अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के अधिकारियों की मिलीभगत से चल रहे हैं। शिकायतकर्ता का आरोप था कि ये संस्थान बुनियादी मानकों को पूरा न करने, रिश्वत के माध्यम से “अनपढ़” शिक्षकों की भर्ती करने और भवन, फर्नीचर व हॉस्टल जैसे बुनियादी ढांचे की कमी के बावजूद सरकारी अनुदान प्राप्त कर रहे हैं।

इस पर कार्रवाई करते हुए, NHRC ने 28 फरवरी, 2025 को महानिदेशक (D.G.), आर्थिक अपराध शाखा (EOW), उत्तर प्रदेश सरकार को आरोपों की जांच करने और कार्रवाई रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया था। ‘टीचर्स एसोसिएशन मदारिस अरबिया’ ने हाईकोर्ट में इस हस्तक्षेप को चुनौती दी।

जस्टिस अतुल श्रीधरन की टिप्पणियां

27 अप्रैल, 2026 को सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ता ने स्थगन (adjournment) की मांग की, जिसका राज्य सरकार ने विरोध किया। NHRC के आदेश का परीक्षण करते हुए जस्टिस श्रीधरन ने आयोग के हस्तक्षेप पर आश्चर्य व्यक्त किया।

उन्होंने उल्लेख किया कि मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की धारा 2(1)(d) के तहत, “मानवाधिकार” विशेष रूप से जीवन, स्वतंत्रता, समानता और गरिमा से संबंधित अधिकारों के रूप में परिभाषित हैं। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:

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“संबंधित कानून यह बहुत स्पष्ट करता है कि मानवाधिकार आयोग, चाहे वह राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग हो या राज्य मानवाधिकार आयोग, केवल उन्हीं मानवाधिकारों के उल्लंघन का संज्ञान लेने के लिए सशक्त हैं जैसा कि उक्त कानून में परिभाषित है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और राज्य मानवाधिकार आयोग को यह समझना चाहिए कि वे कानून के तहत कोई ट्रिब्यूनल नहीं हैं जो मुकदमों की सुनवाई कर सकें।”

जस्टिस श्रीधरन ने प्रशासनिक मामलों में रुचि दिखाने और वास्तविक मानवाधिकार मुद्दों की अनदेखी करने के लिए NHRC की आलोचना करते हुए कहा:

“उन मामलों में स्वतः संज्ञान लेने के बजाय जिनमें मुस्लिम समुदाय के सदस्यों पर हमले किए जाते हैं और कभी-कभी पीट-पीटकर हत्या (lynching) कर दी जाती है… मानवाधिकार आयोग उन मामलों में दखल देते हुए दिखाई देते हैं जो प्रथम दृष्टया उनसे संबंधित नहीं हैं। इस कोर्ट को ऐसी किसी घटना की जानकारी नहीं दी गई है जिसमें NHRC ने उन स्थितियों में स्वतः संज्ञान लिया हो जहां निगरानी समूह (vigilantes) कानून को अपने हाथ में लेते हैं और साधारण नागरिकों को परेशान करते हैं… या जहां किसी दूसरे धर्म के व्यक्ति के साथ सार्वजनिक स्थान पर कॉफी पीना भी एक डरावना कृत्य बन जाता है।”

जस्टिस श्रीधरन ने आगे कहा कि मदरसों के संबंध में आरोप संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट के क्षेत्राधिकार में आते हैं और इनमें कानून द्वारा परिभाषित मानवाधिकार शामिल नहीं हैं।

जस्टिस विवेक सरण का अलग मत

एक अलग आदेश में, जस्टिस विवेक सरण केवल स्थगन देने के निर्णय पर सहमत हुए, लेकिन जस्टिस श्रीधरन द्वारा की गई टिप्पणियों पर कड़ी असहमति दर्ज की।

जस्टिस सरण ने रेखांकित किया कि ये टिप्पणियां तब की गईं जब याचिकाकर्ता के वकील बहस नहीं कर रहे थे और NHRC का प्रतिनिधित्व भी कोर्ट में नहीं था। उन्होंने कहा:

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“मेरा दृढ़ मत है कि यदि मामले के गुण-दोष या NHRC की भूमिका को प्रभावित करने वाला कोई भी आदेश पारित किया जाना था, तो संबंधित सभी पक्षों को सुना जाना चाहिए था… पक्षों की अनुपस्थिति में, किसी भी प्रतिकूल टिप्पणी की आवश्यकता नहीं थी।”

जस्टिस सरण ने स्पष्ट रूप से नोट किया, “चूंकि पैराग्राफ नंबर 6 और 7 में विभिन्न तथ्यों का उल्लेख किया गया है, जिनसे मैं सहमत नहीं हूं, इसलिए मैं जस्टिस अतुल श्रीधरन द्वारा दिए गए आदेश से भिन्न मत रखता हूं।”

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निष्कर्ष

NHRC के आचरण को लेकर मतभेद के बावजूद, बेंच ने स्थगन स्वीकार कर लिया और NHRC को नोटिस जारी कर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने इस मामले को एक अन्य संबंधित मामले के साथ जोड़ने का निर्देश दिया और अगली सुनवाई 11 मई, 2026 के लिए तय की है। मामले में पहले से दिया गया अंतरिम आदेश अगली सुनवाई तक जारी रहेगा।

मामले का विवरण:

  • केस टाइटल: टीचर्स एसोसिएशन मदारिस अरबिया एवं 2 अन्य बनाम राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग एवं 8 अन्य
  • केस नंबर: WRIT-C संख्या 32051/2025
  • बेंच: जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस विवेक सरण
  • दिनांक: 27 अप्रैल, 2026

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