‘मैं भी एक शबरी हूं’: सुप्रीम कोर्ट में गूंजा रामायण का प्रसंग, धार्मिक भेदभाव पर 9 जजों की बेंच में हुई तीखी बहस

सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को सबरीमाला मंदिर विवाद और धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव के मामले में एक भावनात्मक और कानूनी मोड़ देखने को मिला। नौ जजों की संविधान बेंच के सामने सुनवाई के दौरान रामायण की ‘शबरी’ का जिक्र करते हुए लैंगिक समानता और आस्था के बीच के संघर्ष को रेखांकित किया गया।

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली इस बेंच में जस्टिस बी वी नागरत्ना, जस्टिस एम एम सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, जस्टिस प्रसन्ना बी वराले, जस्टिस आर महादेवन और जस्टिस जोयमाल्य बागची शामिल हैं।

दिन की कार्यवाही समाप्त होने से पहले, वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने बिंदू अम्मिनी और कनकदुर्गा (जिन्होंने 2018 के फैसले के बाद मंदिर में प्रवेश किया था) की ओर से दलीलें पेश कीं। उन्होंने रामायण के उस प्रसंग को याद किया जहां शबरी ने भगवान राम की प्रतीक्षा में अपना जीवन व्यतीत कर दिया था।

जयसिंह ने कहा कि शबरी एक आदिवासी महिला थीं, जिन्होंने निस्वार्थ भाव से राम को जूठे बेर खिलाए थे ताकि वे सुनिश्चित कर सकें कि प्रभु को केवल मीठे फल ही मिलें। उन्होंने तर्क दिया कि जब लक्ष्मण ने इस पर आपत्ति जताई, तो राम ने कहा था कि वह शबरी की आस्था और प्रेम का सम्मान कर रहे हैं।

अदालत में अपनी बात रखते हुए वकील ने कहा, “शबरी कौन थी? वह एक महिला थी। उसने भगवान राम को बेर अर्पित किए। राम ने उसके प्रेम को स्वीकार किया। लेकिन सबरीमाला में आप मुझे बाहर रख रहे हैं… मैं भी एक शबरी हूं।”

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इस भावुक दलील के बीच जस्टिस अरविंद कुमार ने हल्के-फुल्के अंदाज में टिप्पणी की कि पौराणिक कथाओं के अनुसार “शबरी की आयु 50 वर्ष से अधिक थी,” जो कि सबरीमाला मंदिर में प्रतिबंधित आयु वर्ग (10 से 50 वर्ष) से बाहर है।

यह नौ जजों की बेंच केवल सबरीमाला तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सात ऐसे बुनियादी सवालों पर विचार कर रही है जो भारत में धार्मिक स्वतंत्रता के भविष्य को तय करेंगे:

  • अनुच्छेद 25 का दायरा: धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार की सीमा और विस्तार क्या है?
  • अधिकारों का टकराव: अनुच्छेद 25 (व्यक्तिगत अधिकार) और अनुच्छेद 26 (धार्मिक संप्रदायों के अधिकार) के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए?
  • संवैधानिक नैतिकता: क्या संविधान में वर्णित ‘नैतिकता’ शब्द का अर्थ ‘संवैधानिक नैतिकता’ से है?
  • न्यायिक समीक्षा: अदालतें किसी धार्मिक प्रथा की न्यायिक समीक्षा किस हद तक कर सकती हैं?
  • जनहित याचिका (PIL) का अधिकार: क्या वह व्यक्ति जो किसी खास धर्म या संप्रदाय से नहीं जुड़ा है, उसकी धार्मिक प्रथाओं को अदालत में चुनौती दे सकता है?
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विवाद की शुरुआत सितंबर 2018 में हुई थी, जब पांच जजों की बेंच ने 4:1 के बहुमत से सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को हटा दिया था। तब कोर्ट ने माना था कि यह सदियों पुरानी प्रथा असंवैधानिक है।

इसके बाद 14 नवंबर, 2019 को तत्कालीन CJI रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली बेंच ने इस मामले को व्यापक कानूनी स्पष्टता के लिए एक बड़ी बेंच (नौ जजों की बेंच) को भेज दिया था। अब यह बेंच तय करेगी कि क्या धार्मिक ‘परंपराएं’ समानता के मौलिक अधिकार से ऊपर हो सकती हैं या ‘संवैधानिक नैतिकता’ ही सर्वोच्च रहेगी।

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