छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि स्वापक औषधि और मनःप्रभावी पदार्थ (NDPS) अधिनियम, 1985 की धारा 42, 50 और 52-ए के पालन में हुई प्रक्रियात्मक कमियां अभियोजन के मामले को तब तक पूरी तरह से खारिज नहीं करतीं, जब तक कि मादक पदार्थ की बरामदगी, कब्जा और कस्टडी की कड़ी (चैन ऑफ कस्टडी) ठोस साक्ष्यों से साबित हो रही हो। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने कहा कि अपराध के ठोस प्रमाणों को केवल प्रक्रियात्मक तकनीकी आधार पर तब तक नहीं नकारा जा सकता, जब तक कि आरोपी को उससे किसी गंभीर नुकसान (Prejudice) होने की बात साबित न हो जाए।
मामले की पृष्ठभूमि
अपीलकर्ता शेख रहमान कुरैशी को 4 मई 2024 को रायपुर के तेलीबांधा थाना क्षेत्र से गिरफ्तार किया गया था। पुलिस को मुखबिर से गुप्त सूचना मिली थी कि काशीराम नगर ओवरब्रिज के नीचे एक व्यक्ति मादक पदार्थ बेचने की फिराक में है। तलाशी के दौरान उसके पास मौजूद एक काले रंग के बैग से “स्पास्मो प्रोक्सीवन प्लस” कैप्सूल के 25 स्ट्रिप (कुल 600 कैप्सूल) बरामद किए गए। फोरेंसिक जांच में इन कैप्सूलों में डायसाइक्लोमाइन, ट्रामाडोल और एसिटामिनोफेन जैसे प्रतिबंधित मनःप्रभावी पदार्थों की पुष्टि हुई।
15 सितंबर 2025 को विशेष न्यायाधीश (एनडीपीएस एक्ट), रायपुर ने अपीलकर्ता को धारा 22(सी) के तहत दोषी ठहराते हुए 15 साल के सश्रम कारावास और 1.50 लाख रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई। अपीलकर्ता ने इस सजा को हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए प्रक्रियात्मक नियमों के उल्लंघन का आरोप लगाया था।
पक्षों के तर्क
अपीलकर्ता की ओर से: अपीलकर्ता के वकील श्री अली अफज़ल मिर्ज़ा ने दलील दी कि पूरा मामला प्रक्रियात्मक खामियों के कारण दूषित है। उनके मुख्य तर्क थे:
- धारा 52-ए और 55 का उल्लंघन: जब्ती सूची (इन्वेंट्री) में उचित विवरण नहीं था और 600 में से केवल 48 कैप्सूलों का ही सैंपल लिया गया, जो कानूनी रूप से प्रतिनिधि सैंपल नहीं माना जा सकता।
- छेड़छाड़ की आशंका: मलखाना रजिस्टर में ओवरराइटिंग थी और जब्ती के समय सील को मलखाने में जमा नहीं किया गया था।
- धारा 50 का उल्लंघन: आरोपी को राजपत्रित अधिकारी या मजिस्ट्रेट के सामने तलाशी लेने के उसके अधिकार के बारे में सही ढंग से सूचित नहीं किया गया।
- देरी: एफएसएल (FSL) को सैंपल भेजने में हुई देरी और सैंपलिंग की तारीखों में विसंगतियों पर भी सवाल उठाए गए।
राज्य की ओर से: सरकारी वकील श्री शालीन सिंह बघेल ने सजा का समर्थन करते हुए कहा कि निचली अदालत का फैसला मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्यों पर आधारित है। उन्होंने तर्क दिया कि:
- बरामदगी बैग से हुई थी, न कि व्यक्तिगत शरीर की तलाशी से, इसलिए धारा 50 लागू नहीं होती।
- धारा 52-ए के प्रावधानों का पर्याप्त रूप से पालन किया गया था और कस्टडी की कड़ी पूरी तरह सुरक्षित थी।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियाँ
हाईकोर्ट ने अपीलकर्ता द्वारा उठाए गए कानूनी बिंदुओं का विस्तृत विश्लेषण किया। जांच अधिकारी की योग्यता पर कोर्ट ने पाया कि राज्य सरकार की अधिसूचनाओं के अनुसार सब-इंस्पेक्टर को एनडीपीएस मामलों की जांच का अधिकार प्राप्त है।
धारा 43 बनाम धारा 42: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चूंकि जब्ती सार्वजनिक स्थान (ओवरब्रिज के नीचे) पर हुई और आरोपी उस समय वहां मौजूद था, इसलिए एनडीपीएस एक्ट की धारा 43 लागू होती है। कोर्ट ने कहा:
“सार्वजनिक स्थान पर हुई जब्ती के मामले में धारा 42 की वे कठोरताएं (सूचना का लिखित रिकॉर्ड और वरिष्ठों को भेजना) उस तरह से अनिवार्य नहीं हैं, जैसे कि किसी बंद परिसर की तलाशी के मामले में होती हैं।”
धारा 50 (व्यक्तिगत तलाशी): धारा 50 के उल्लंघन के तर्क को खारिज करते हुए खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के स्टेट ऑफ हिमाचल प्रदेश बनाम पवन कुमार (2005) जैसे फैसलों का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा:
“आरोपी द्वारा ले जाए जा रहे बैग, ब्रीफकेस या किसी कंटेनर की तलाशी को व्यक्तिगत शरीर की तलाशी नहीं माना जा सकता, इसलिए ऐसी स्थिति में धारा 50 के प्रावधान लागू नहीं होंगे।”
धारा 52-ए (अनिवार्य सुरक्षा उपाय): कोर्ट ने जोर देकर कहा कि धारा 52-ए एक प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय है, न कि कोई पत्थर की लकीर। भारत आम्बले बनाम छत्तीसगढ़ राज्य (2025) के हालिया फैसले का संदर्भ देते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की:
“धारा 52ए के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पालन न करना केवल उन्हीं मामलों में घातक हो सकता है जहां ऐसी विसंगति मामले की जड़ को प्रभावित करती हो… जोर प्रक्रियात्मक तकनीकीताओं के बजाय ठोस न्याय (Substantive Justice) पर होना चाहिए।”
हाईकोर्ट ने पाया कि इन्वेंट्री मजिस्ट्रेट के सामने तैयार की गई थी और कस्टडी की चैन पूरी तरह से सुरक्षित थी। एफएसएल रिपोर्ट ने स्पष्ट कर दिया था कि जब्त कैप्सूल प्रतिबंधित पदार्थ थे।
निर्णय
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष आरोपी के पास से प्रतिबंधित सामग्री की बरामदगी और उसके ‘सचेत कब्जे’ (Conscious Possession) को साबित करने में सफल रहा है। कोर्ट ने कहा कि एनडीपीएस एक्ट की धारा 35 और 54 के तहत कानूनी धारणा अपीलकर्ता के खिलाफ थी, जिसे वह झुठला नहीं सका।
अपील में कोई दम न पाते हुए हाईकोर्ट ने इसे खारिज कर दिया और निचली अदालत द्वारा दी गई 15 साल की सजा को बरकरार रखा।
केस विवरण ब्लॉक:
- केस शीर्षक: शेख रहमान कुरैशी बनाम छत्तीसगढ़ राज्य
- केस संख्या: सीआरए (CRA) नंबर 2151 ऑफ 2025
- पीठ: चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल
- दिनांक: 27.04.2026

