बांग्लादेश भेजे गए ‘भारतीय नागरिकों’ की वापसी का मामला: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को दिया अंतिम अवसर

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को केंद्र सरकार को अपना रुख स्पष्ट करने के लिए आखिरी मौका दिया है। यह मामला उन लोगों की वापसी से जुड़ा है, जिन्हें पिछले साल कथित तौर पर भारतीय नागरिक होने के बावजूद जबरन बांग्लादेश भेज दिया गया था।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम. पांचोली की बेंच ने स्पष्ट किया कि यदि अगली तारीख तक केंद्र अपना जवाब दाखिल नहीं करता है, तो अदालत अंतिम सुनवाई की दिशा में आगे बढ़ेगी। चीफ जस्टिस ने मामले की गंभीरता को देखते हुए कहा, “मैं इस याचिका पर जल्द सुनवाई की तारीख तय करूंगा।”

यह विवाद पिछले साल 27 जून, 2024 को दिल्ली के रोहिणी इलाके से कई परिवारों को बांग्लादेश भेजे जाने से शुरू हुआ था। ये परिवार दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम करते थे और उनका दावा है कि वे पिछले दो दशकों से राजधानी में रह रहे थे। उनके अनुसार, 18 जून को पुलिस ने उन्हें “अवैध प्रवासी” होने के संदेह में हिरासत में लिया और महज नौ दिनों के भीतर उन्हें सीमा पार भेज दिया गया।

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यह कानूनी लड़ाई तब सुप्रीम कोर्ट पहुंची जब केंद्र सरकार ने कलकत्ता हाईकोर्ट के 26 सितंबर, 2025 के आदेश को चुनौती दी। हाईकोर्ट ने सुनाली खातून, स्वीटी बीबी और उनके परिवारों को वापस भेजने के फैसले को “अवैध” बताते हुए रद्द कर दिया था। हाईकोर्ट ने अधिकारियों द्वारा दिखाई गई “जल्दबाजी” की भी कड़ी आलोचना की थी।

सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले 3 दिसंबर, 2024 को “मानवीय आधार” पर गर्भवती सुनाली खातून और उनके आठ वर्षीय बच्चे को भारत आने की अनुमति दी थी। अदालत ने पश्चिम बंगाल सरकार को निर्देश दिया था कि वह बीरभूम जिले में सुनाली को प्रसव और अन्य सभी आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं मुफ्त उपलब्ध कराए।

शुक्रवार की सुनवाई के दौरान, सुनाली के पिता भोडू शेख की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल और संजय हेगड़े ने दलील दी कि केंद्र द्वारा इस मामले में अपना रुख स्पष्ट न करना “अनुचित” है। उन्होंने बताया कि सुनाली के पति और अन्य सदस्य अब भी बांग्लादेश में हैं और अपने गृह जिले बीरभूम लौटने का इंतजार कर रहे हैं।

केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मानवीय राहत और नागरिकता के कानूनी सवाल के बीच स्पष्ट अंतर रखा। उन्होंने तर्क दिया कि सरकार इन लोगों के भारतीय नागरिक होने के दावे का विरोध करेगी और उनके अनुसार ये सभी बांग्लादेशी नागरिक हैं। केंद्र ने महिला और बच्चे को केवल मानवीय आधार पर प्रवेश की अनुमति दी है।

हालांकि, बेंच ने नागरिकता के दावों को गंभीर माना। जस्टिस जोयमाल्य बागची ने टिप्पणी की कि यदि सुनाली खातून यह साबित कर देती हैं कि वह पश्चिम बंगाल के निवासी भोडू शेख की बेटी हैं, तो उनकी भारतीय नागरिकता स्थापित करने के लिए यह पर्याप्त होगा।

इस मामले ने निर्वासन (Deportation) की प्रक्रियाओं पर भी सवाल खड़े किए हैं। गृह मंत्रालय के 2025 के एक मेमो के अनुसार, किसी भी संदिग्ध विदेशी नागरिक को वापस भेजने से पहले संबंधित राज्य या केंद्र शासित प्रदेश सरकार द्वारा जांच की जानी अनिवार्य है।

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कलकत्ता हाईकोर्ट ने पाया था कि दिल्ली के अधिकारियों ने इन नियमों की अनदेखी की। हाईकोर्ट ने कहा कि दिल्ली स्थित फॉरेनर रीजनल रजिस्ट्रेशन ऑफिस (FRRO) द्वारा दिखाई गई “अति-उत्सुकता” देश के न्यायिक वातावरण को प्रभावित करती है और यह सरकार के अपने दिशा-निर्देशों का उल्लंघन है।

अब सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को अपना पक्ष रखने का अंतिम मौका दिया है, जिसके बाद ही इस जटिल कानूनी और मानवीय मुद्दे पर अंतिम फैसला लिया जाएगा।

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