केरल हाईकोर्ट ने मंदिरों के उत्सवों, विशेष रूप से आगामी ‘त्रिशूर पूरम’ के दौरान हाथियों को परेड में शामिल करने और उनकी सुरक्षा को लेकर शुक्रवार को राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने इस मामले में राज्य सरकार के साथ-साथ पूरम का आयोजन करने वाले प्रमुख मंदिरों—पारमेकावु और तिरुवंबादी देवस्वोम—से भी जवाब तलब किया है।
यह कार्रवाई त्रिशूर के निवासी वी.के. वेंकिटाचलम द्वारा दायर एक जनहित याचिका (PIL) पर हुई है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि धार्मिक उत्सवों के नाम पर हाथियों के साथ क्रूरता की जा रही है और मौजूदा सुरक्षा नियमों का खुलेआम उल्लंघन हो रहा है।
जस्टिस जियाद रहमान और जस्टिस के.वी. जयकुमार की खंडपीठ ने इस जनहित याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार तो कर लिया, लेकिन फिलहाल कोई कड़ा निर्देश जारी करने से परहेज किया।
अदालत ने स्पष्ट किया कि इसी तरह का एक मामला वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट में भी विचाराधीन है। क्षेत्राधिकार के टकराव से बचने के लिए हाईकोर्ट ने कहा कि फिलहाल इस स्तर पर कोई नया निर्देश देना उचित नहीं होगा। कोर्ट ने अब इस मामले की अगली सुनवाई 25 मई के लिए तय की है।
याचिकाकर्ता वेंकिटाचलम ने अदालत को बताया कि केरल में बंदी हाथी (प्रबंधन और रखरखाव) नियम, 2012 और साल 2013 के सरकारी सर्कुलर के रूप में एक मजबूत कानूनी ढांचा मौजूद है। इसके बावजूद, त्रिशूर पूरम जैसे बड़े आयोजनों में इनका पालन नहीं किया जा रहा है।
याचिका में हाथियों की स्थिति पर निम्नलिखित चिंताएं जताई गई हैं:
- शोर और तनाव: हाथियों को बहुत करीब से होने वाली तेज आवाज वाली आतिशबाजी के बीच रखा जाता है, जिससे वे तनाव में आ जाते हैं।
- सुरक्षा दूरी का अभाव: भारी भीड़ के बीच हाथियों और लोगों के बीच जो अनिवार्य दूरी होनी चाहिए, उसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।
- भीषण गर्मी की मार: दोपहर की चिलचिलाती धूप और गर्मी के दौरान भी हाथियों की परेड कराई जाती है, और उन्हें पर्याप्त आराम, भोजन या पानी नहीं दिया जाता।
2013 के सरकारी सर्कुलर के अनुसार, हाथियों को ऐसी किसी भी स्थिति में नहीं रखा जाना चाहिए जिससे उन्हें डर, तनाव या चोट पहुंचे। याचिकाकर्ता ने मांग की है कि उत्सव के दौरान इन नियमों को सख्ती से लागू किया जाए ताकि बेजुबान जानवरों को पीड़ा से बचाया जा सके।
त्रिशूर पूरम केरल की संस्कृति का एक अटूट हिस्सा है, जिसमें सजे-धजे हाथियों का जुलूस मुख्य आकर्षण होता है। हालांकि, परंपरा और पशु कल्याण के बीच का यह संघर्ष अक्सर कानूनी गलियारों तक पहुंचता रहा है। चूंकि अगली सुनवाई 25 मई को है, तब तक इस साल का त्रिशूर पूरम (26 अप्रैल) संपन्न हो चुका होगा। अब देखना यह है कि राज्य सरकार और देवस्वोम इस संवेदनशील मुद्दे पर कोर्ट में क्या पक्ष रखते हैं।

