दिव्यांग कैदियों के अधिकारों पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला; व्यापक कार्ययोजना तैयार करने के निर्देश

जेल की सलाखें किसी भी व्यक्ति के मौलिक संवैधानिक अधिकारों को कम नहीं कर सकतीं। इस महत्वपूर्ण टिप्पणी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को देशभर की जेलों में बंद दिव्यांग कैदियों के अधिकारों और गरिमा की सुरक्षा के लिए एक व्यापक कार्ययोजना तैयार करने का आदेश दिया।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा कि दिव्यांग कैदियों के साथ होने वाला व्यवहार “मानवीय और अधिकार-आधारित दृष्टिकोण” (rights-based approach) पर आधारित होना चाहिए। कोर्ट ने यह भी सुनिश्चित करने को कहा कि इन कैदियों को उनकी विशिष्ट जरूरतों के अनुसार सहायक उपकरण और गतिशीलता सहायता (mobility aids) उपलब्ध कराई जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा) के तहत मिलने वाले मौलिक अधिकार जेल के भीतर भी प्रभावी रहते हैं।

बेंच ने अपने आदेश में कहा:

“दिव्यांग कैदियों के अधिकारों को इस तरह से मान्यता दी जानी चाहिए और लागू किया जाना चाहिए जो मानवीय और अधिकार-आधारित दृष्टिकोण के अनुरूप हो। यह सुनिश्चित करना अनिवार्य है कि कारावास किसी भी तरह से संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत प्राप्त मौलिक सुरक्षा को कम या बाधित न करे।”

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कोर्ट ने यह माना कि दिव्यांग कैदियों की हिरासत की स्थिति और संस्थागत सुरक्षा से जुड़े मुद्दों को ‘हाई-पावर्ड कमेटी’ (High-Powered Committee) द्वारा सबसे प्रभावी ढंग से सुलझाया जा सकता है।

फरवरी 2026 में गठित यह समिति, जिसके कार्यकारी अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस एस रवींद्र भट हैं, पहले से ही राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों (UTs) के जेल नियमों में सामंजस्य बिठाने के लिए काम कर रही है।

इस विशेष कार्य के लिए समिति की विशेषज्ञता बढ़ाने हेतु कोर्ट ने निर्देश दिया कि:

  • दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग के सचिव (या अतिरिक्त सचिव स्तर के उनके प्रतिनिधि) इसमें शामिल हों।
  • सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग या समाज कल्याण विभाग के सचिव भी समिति की कार्यवाही का हिस्सा बनें।
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बेंच ने जमीनी स्तर पर बदलाव लाने के लिए कई निर्देश जारी किए:

  1. एक्शन प्लान: समिति को दिव्यांग कैदियों के लिए सहायक उपकरण, व्हीलचेयर और अन्य आवश्यक उपकरण प्रदान करने के लिए एक “व्यापक और लागू करने योग्य कार्ययोजना” तैयार करनी होगी।
  2. विशेषज्ञों की सलाह: समिति इस क्षेत्र में काम करने वाली विशेषज्ञ संस्थाओं, नागरिक समाज संगठनों और विशेषज्ञों की सहायता लेने के लिए स्वतंत्र है।
  3. अनुपालन हलफनामा: सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को छह सप्ताह के भीतर समिति के समक्ष अपना अनुपालन हलफनामा पेश करने का निर्देश दिया गया है।
  4. हितधारकों की भागीदारी: याचिकाकर्ताओं और हस्तक्षेपकर्ताओं को समिति की कार्यवाही में भाग लेने और अपना पक्ष रखने की अनुमति दी गई है।
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अदालत ने सेमी-ओपन या ओपन जेलों की भूमिका पर भी चर्चा की, जहाँ कैदियों को दिन के समय काम करने की अनुमति होती है। कोर्ट ने कहा कि ऐसी व्यवस्थाएं मनोवैज्ञानिक दबाव को कम करने और समाज में कैदियों के पुनर्वास के लिए महत्वपूर्ण हैं, इसलिए इनमें दिव्यांगों के लिए सुलभता सुनिश्चित करना आवश्यक है।

समिति को चार महीने के भीतर प्रगति रिपोर्ट, आने वाली चुनौतियों और भविष्य के कदमों के बारे में एक समेकित रिपोर्ट पेश करने को कहा गया है। कोर्ट ने सभी राज्य सरकारों को समिति के साथ पूर्ण सहयोग करने और समय पर डेटा व रसद सहायता उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है।

मामले की अगली सुनवाई अब 1 सितंबर को होगी।

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