सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) अधिनियम, 2008 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली एक महत्वपूर्ण याचिका पर विचार करने के लिए सहमति दे दी है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने मामले में उठाए गए सवालों को “अत्यधिक महत्वपूर्ण” बताते हुए केंद्र सरकार और एनआईए को नोटिस जारी कर उनका जवाब मांगा है।
यह याचिका 2008 के उस कानून को रद्द करने की मांग करती है, जिसके तहत 26/11 के मुंबई हमलों के बाद देश की प्रमुख आतंकवाद विरोधी जांच एजेंसी के रूप में एनआईए का गठन किया गया था। याचिका में मुख्य रूप से यह तर्क दिया गया है कि केंद्र ने पुलिस शक्तियों वाली एक संघीय एजेंसी बनाकर अपनी विधायी क्षमता का उल्लंघन किया है, क्योंकि भारतीय संविधान के अनुसार ‘पुलिस’ राज्य सूची (State List) का विषय है।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे ने दलील दी कि यह अधिनियम संविधान के अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता) का उल्लंघन करता है और केंद्र के पास इसे बनाने की विधायी क्षमता नहीं थी। उन्होंने एजेंसी के ढांचे पर सवाल उठाते हुए पूछा कि जब संविधान ने पुलिस से संबंधित अधिकार राज्यों को दिए हैं, तो केंद्र सरकार की कोई एजेंसी पुलिस की शक्तियों के साथ कैसे काम कर सकती है?
सुनवाई का एक मुख्य बिंदु राज्य की सहमति के बिना प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज करने और मामलों को अपने हाथ में लेने की एनआईए की शक्ति रही। अधिनियम की धारा 3 का हवाला देते हुए बेंच ने एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी से पूछा:
“बिना पुलिस स्टेशन हुए, क्या एनआईए एफआईआर दर्ज कर सकती है?”
कोर्ट ने अधिनियम की धारा 6(5) का भी उल्लेख किया, जो केंद्र सरकार को यह शक्ति देती है कि वह किसी भी अनुसूचित अपराध की जांच के लिए एनआईए को ‘सुओ मोटो’ (स्वत: संज्ञान) निर्देश दे सके। बेंच ने कानून अधिकारी को विशेष रूप से एफआईआर के स्वत: पंजीकरण की वैधता पर कोर्ट की सहायता करने का निर्देश दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिवादियों को अपना जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया है। इसके बाद याचिकाकर्ता के पास प्रत्युत्तर (rejoinder) दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय होगा।
इस मामले की अगली सुनवाई 14 जुलाई को तय की गई है। इस केस का फैसला भारत के संघीय ढांचे और आंतरिक सुरक्षा मामलों में केंद्र की भूमिका पर दूरगामी प्रभाव डाल सकता है।

