सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को ₹3,600 करोड़ के अगस्तावेस्टलैंड वीवीआईपी चॉपर घोटाले के कथित बिचौलिए क्रिश्चियन मिशेल जेम्स की रिहाई की मांग वाली याचिका को दूसरी बेंच के पास भेज दिया है। मिशेल ने अपनी याचिका में हिरासत में बने रहने को चुनौती दी है और भारत-यूएई प्रत्यर्पण संधि के कुछ प्रावधानों पर सवाल उठाए हैं।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने कार्यवाही के दौरान पाया कि इस आरोपी से जुड़ी पिछली याचिकाओं पर जस्टिस विक्रम नाथ की अध्यक्षता वाली बेंच ने सुनवाई की थी।
चीफ जस्टिस ने निर्देश देते हुए कहा, “इस मामले को जस्टिस विक्रम नाथ की अध्यक्षता वाली बेंच के पास भेजा जाए।”
ब्रिटिश नागरिक मिशेल ने दिल्ली हाईकोर्ट के 8 अप्रैल के उस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है, जिसमें उसकी रिहाई की अर्जी खारिज कर दी गई थी। हाईकोर्ट ने कहा था कि मिशेल की याचिका में कोई दम नहीं है, जिसे दिसंबर 2018 में दुबई से भारत प्रत्यर्पित किया गया था।
अपनी मौजूदा याचिका में, मिशेल ने निचली अदालत के 7 अगस्त, 2025 के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 436A के तहत उसकी रिहाई की मांग को ठुकरा दिया था। मिशेल का तर्क है कि 4 दिसंबर, 2025 तक उसने जेल में सात साल पूरे कर लिए हैं। उसके मुताबिक, यह उन अपराधों के लिए अधिकतम संभव सजा है जिनके लिए उसे प्रत्यर्पित किया गया था, इसलिए अब उसे हिरासत में रखना अवैध है।
इसके अलावा, मिशेल ने 1999 की भारत-यूएई प्रत्यर्पण संधि के अनुच्छेद 17 की वैधता को भी चुनौती दी है। यह प्रावधान भारत जैसे अनुरोध करने वाले देश को न केवल उस विशिष्ट अपराध के लिए, बल्कि उससे जुड़े अन्य अपराधों के लिए भी प्रत्यर्पित व्यक्ति पर मुकदमा चलाने की अनुमति देता है। मिशेल के वकीलों का तर्क है कि किसी व्यक्ति पर केवल उन्हीं अपराधों के लिए मुकदमा चलना चाहिए जिनके लिए उसका प्रत्यर्पण हुआ है।
दिल्ली हाईकोर्ट ने पहले याचिका खारिज करते हुए कहा था कि मिशेल उन मुद्दों को दोबारा उठा रहा है जिन पर सुप्रीम कोर्ट पहले ही विचार कर चुका है। कोर्ट ने कहा कि मिशेल का प्रत्यर्पण अगस्तावेस्टलैंड मामले की पृष्ठभूमि से जुड़े अपराधों के लिए हुआ था, जो पूरी तरह से संधि के दायरे में आते हैं।
2018 में प्रत्यर्पण के बाद, सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने मिशेल को गिरफ्तार किया था। इस मामले में जांच के दायरे में आए तीन कथित बिचौलियों में मिशेल के अलावा गुइडो हेश्के और कार्लो गेरोसा शामिल हैं।
दिलचस्प बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी 2025 में सीबीआई मामले में और हाईकोर्ट ने मार्च 2025 में ईडी मामले में मिशेल को जमानत दे दी थी। इसके बावजूद वह जेल में है क्योंकि वह अदालतों द्वारा तय की गई जमानत की शर्तों को पूरा नहीं कर पाया है।
निचली अदालत ने सीबीआई मामले में 5 लाख रुपये का निजी मुचलका और इतनी ही नकद जमानत राशि जमा करने को कहा था। वहीं, ईडी मामले में हाईकोर्ट ने 5 लाख रुपये का निजी मुचलका और 10 लाख रुपये की नकद जमानत राशि तय की थी। कोर्ट ने यह भी साफ किया था कि पासपोर्ट एक्सपायर होने के कारण वह बिना पासपोर्ट जमा किए रिहा हो सकता है, लेकिन संबंधित अधिकारियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि वह देश छोड़कर न जाए।
सीबीआई की चार्जशीट के अनुसार, 8 फरवरी 2010 को हुए इस वीवीआईपी चॉपर सौदे से सरकारी खजाने को करीब 398.21 मिलियन यूरो (लगभग ₹2,666 करोड़) का नुकसान हुआ था। यह सौदा 12 AW-101 हेलीकॉप्टरों की आपूर्ति के लिए था।
वहीं, ईडी ने 2016 की चार्जशीट में आरोप लगाया था कि मिशेल को इस सौदे के बदले अगस्तावेस्टलैंड से लगभग 30 मिलियन यूरो (करीब ₹225 करोड़) मिले थे।

