इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अपीलीय अदालत द्वारा अतिरिक्त साक्ष्य स्वीकार करने से इनकार करने के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश XLI नियम 27(2) के तहत अतिरिक्त साक्ष्य स्वीकार करते समय कारण दर्ज करना अनिवार्य है, लेकिन साक्ष्य अस्वीकार करते समय विस्तृत आदेश की आवश्यकता नहीं होती, बशर्ते अदालत ने दस्तावेजों की प्रासंगिकता पर विचार किया हो।
संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस मनीष कुमार निगम ने कहा कि अतिरिक्त साक्ष्य स्वीकार करने या न करने का अपीलीय अदालत का विशेषाधिकार स्थापित न्यायिक सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए और जब तक यह मनमाना न पाया जाए, इसमें हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिए।
मामले की पृष्ठभूमि
विवाद 1998 में श्रीमती नम्रता सारस्वत (प्रतिवादी) द्वारा भूपेंद्र सिंह (याचिकाकर्ता) के खिलाफ गाजियाबाद में एक आवासीय भूखंड की बिक्री के समझौते (दिनांक 14 अक्टूबर, 1992) के विशिष्ट अनुपालन (Specific Performance) के लिए दायर एक मुकदमे से शुरू हुआ था। ट्रायल कोर्ट ने 2010 में मुकदमे को आंशिक रूप से डिक्री करते हुए ब्याज के साथ बयाना राशि वापस करने का आदेश दिया था, लेकिन विशिष्ट अनुपालन की डिक्री देने से इनकार कर दिया था।
प्रतिवादी ने इस निर्णय के विरुद्ध अपील (सिविल अपील संख्या 117/2010) दायर की। अपीलीय कार्यवाही के दौरान, याचिकाकर्ता ने अतिरिक्त साक्ष्य के रूप में 17 दस्तावेज पेश करने के लिए आदेश XLI नियम 27 CPC के तहत एक आवेदन दिया। ये दस्तावेज मुख्य रूप से गाजियाबाद विकास प्राधिकरण (GDA) द्वारा एक सहकारी समिति और बाद में याचिकाकर्ता को भूमि के आवंटन और सीमांकन से संबंधित थे।
अपर जिला न्यायाधीश, गाजियाबाद ने 4 जनवरी, 2025 को इस आवेदन को खारिज कर दिया, जिसके बाद हाईकोर्ट में यह याचिका दायर की गई।
पक्षों के तर्क
याचिकाकर्ता की ओर से: वकील श्री ऋत्विक उपाध्याय ने तर्क दिया कि इन दस्तावेजों का विवाद पर “सीधा और महत्वपूर्ण प्रभाव” था और सही निर्णय के लिए ये आवश्यक थे। उन्होंने दलील दी कि निचली अपीलीय अदालत आवेदन खारिज करने के पर्याप्त कारण दर्ज करने में विफल रही, विशेष रूप से सुप्रीम कोर्ट के संजय कुमार सिंह बनाम झारखंड राज्य (2022) के फैसले के आलोक में, जो ऐसे साक्ष्य स्वीकार करने पर जोर देता है जो “मामले पर संदेह के बादल हटाते हों।”
प्रतिवादी की ओर से: प्रतिवादी की ओर से पेश सुश्री विशाखा पांडे ने तर्क दिया कि आवेदन आदेश XLI नियम 27(1) की शर्तों को पूरा नहीं करता था। उन्होंने कहा कि “अतिरिक्त साक्ष्य” का अर्थ पहले से मौजूद कुछ साक्ष्यों के पूरक के रूप में होता है, जबकि ट्रायल कोर्ट में याचिकाकर्ता के साक्ष्य पेश करने का अवसर पहले ही बंद हो चुका था। उन्होंने यह भी कहा कि यह तय करना अदालत का विशेषाधिकार है कि क्या निर्णय सुनाने के लिए साक्ष्य की “आवश्यकता” है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने CPC की धारा 107 और आदेश XLI नियम 27 के वैधानिक ढांचे का परीक्षण किया। हाईकोर्ट ने गौर किया कि नियम 27(1) एक निषेधात्मक शर्त के साथ शुरू होता है: “अपील के पक्षकार अपीलीय अदालत में अतिरिक्त साक्ष्य पेश करने के हकदार नहीं होंगे,” जो दर्शाता है कि साक्ष्य स्वीकार करना एक अपवाद है, नियम नहीं।
कारण दर्ज करने की आवश्यकता पर हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:
“कानून की आवश्यकता यह है कि अतिरिक्त साक्ष्य स्वीकार करते समय अपीलीय अदालत के लिए कारण दर्ज करना आवश्यक है। यह सच है कि प्रत्येक न्यायिक आदेश कारणों पर आधारित होना चाहिए, लेकिन मेरे विचार में अतिरिक्त साक्ष्य के आवेदन को खारिज करते समय अदालत को बहुत विस्तृत कारण देने की आवश्यकता नहीं है…”
जस्टिस निगम ने जोर दिया कि “कानून का पर्याप्त अनुपालन तब माना जाएगा यदि आदेश से यह झलकता हो कि अदालत ने मामले के तथ्यों, रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्य और अपीलीय चरण में पेश किए जाने वाले साक्ष्य की प्रासंगिकता पर अपना दिमाग लगाया है।”
दस्तावेजों की योग्यता पर हाईकोर्ट ने पाया कि 17 मदों में से कई (आवंटन पत्र, सीमांकन ज्ञापन) प्रासंगिक नहीं थे क्योंकि याचिकाकर्ता ने अपने लिखित बयान में बिक्री के समझौते को पहले ही स्वीकार कर लिया था। हाईकोर्ट ने कहा:
“ये दस्तावेज मुकदमे के निपटारे के लिए बिल्कुल भी प्रासंगिक नहीं हैं क्योंकि वादी ने स्वयं मुकदमे में यह दलील दी है कि आवंटन के बाद बिक्री का समझौता निष्पादित किया गया था, जिससे याचिकाकर्ता ने इनकार नहीं किया है… इसलिए पिछली कोई भी कार्यवाही प्रासंगिक नहीं है।”
नियम 27(1) के खंड (बी) के तहत अदालत की “आवश्यकता” के संबंध में हाईकोर्ट ने परसोतिम ठाकुर बनाम लाल मोहर ठाकुर (1931) के प्रिवी काउंसिल मामले का हवाला दिया:
“इसकी आवश्यकता अदालत को निर्णय सुनाने में सक्षम बनाने के लिए या किसी अन्य ठोस कारण के लिए हो सकती है, लेकिन दोनों ही मामलों में यह अदालत की आवश्यकता होनी चाहिए… इस विवेक के प्रयोग का उचित अवसर तब होता है… ‘जब रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्य के परीक्षण पर कोई अंतर्निहित कमी या दोष स्पष्ट हो जाए।'”
अदालत ने आगे स्पष्ट किया कि “अतिरिक्त साक्ष्य” शब्द का अर्थ यह नहीं है कि पक्षकार ने निचली अदालत में कुछ साक्ष्य अवश्य दिए हों, जैसा कि जयपुर विकास प्राधिकरण बनाम कैलाश पति देवी (1997) में तय किया गया है।
निर्णय
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि निचली अपीलीय अदालत ने आवेदन को खारिज करने के लिए “ठोस कारण” दिए थे और दस्तावेज विवाद के लिए आवश्यक नहीं थे। हाईकोर्ट ने कहा कि वरिष्ठ अदालत को ऐसे विवेकाधीन अधिकार में तब तक हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए जब तक कि वह मनमाना न हो।
4 जनवरी, 2025 के आदेश में कोई अवैधता या मनमानापन न पाते हुए हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।
मामले का विवरण:
- केस शीर्षक: भूपेंद्र सिंह बनाम श्रीमती नम्रता सारस्वत
- केस संख्या: मैटर्स अंडर आर्टिकल 227 संख्या 1527/2025
- पीठ: जस्टिस मनीष कुमार निगम
- दिनांक: 23 अप्रैल, 2026

