बॉम्बे हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: वकील और पूर्व सैनिक को हथकड़ी लगाकर अपमानित करने पर सरकार को 1 लाख रुपये मुआवजे का निर्देश

बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच ने महाराष्ट्र सरकार को एक वकील और एक पूर्व सैनिक को 50-50 हजार रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है। कोर्ट ने माना कि पुलिस द्वारा इन नागरिकों को अवैध रूप से हथकड़ी लगाना और सार्वजनिक रूप से ले जाना “अवांछित अपमान और गरिमा के हनन” का मामला है, जो उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है।

इस मामले का मुख्य बिंदु यह था कि क्या पुलिस द्वारा उन व्यक्तियों को हथकड़ी लगाना और राज्य परिवहन की बस में ले जाना, जो न तो आदतन अपराधी थे और न ही उनके भागने का कोई खतरा था, संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है। कोर्ट को यह तय करना था कि क्या दोषी अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई पर्याप्त है या राज्य को याचिकाकर्ताओं की प्रतिष्ठा को हुई “कानूनी क्षति” के लिए मौद्रिक मुआवजा देना चाहिए।

यह घटना अगस्त 2010 की है। याचिकाकर्ता योगेश्वर कावड़े (वकील) और अविनाश दाते (पूर्व सैनिक), दाते की कार को हुए नुकसान की शिकायत दर्ज कराने अमरावती जिले के तलेगांव पुलिस स्टेशन गए थे। हालांकि, जिस व्यक्ति के खिलाफ वे शिकायत करने पहुंचे थे, उसने भी एक क्रॉस-शिकायत दर्ज करा दी, जिसमें उन पर मारपीट और धमकी देने का आरोप लगाया गया।

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याचिका के अनुसार, पुलिस ने कावड़े और दाते को आधी रात के बाद हिरासत में ले लिया, उनके कपड़े उतरवाए और उन्हें अंतःवस्त्रों में बैठने पर मजबूर किया। अगले दिन, दोनों को हथकड़ी लगाई गई और पुलिस स्टेशन से तहसीलदार के कार्यालय तक राज्य परिवहन की बस में ले जाया गया। उनकी हालत देखकर तहसीलदार ने तुरंत हथकड़ी हटाने का आदेश दिया और उन्हें जमानत दे दी।

याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि वे न तो आदतन अपराधी थे और न ही खूंखार मुजरिम, इसलिए हथकड़ी का उपयोग अवैध था और उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा पर सीधा हमला था। उन्होंने सरकारी मशीनरी द्वारा किए गए इस “अवांछित अपमान” के लिए न्यायिक उपचार की मांग की।

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जवाब में, अमरावती के पुलिस अधीक्षक ने कोर्ट को बताया कि संबंधित सहायक पुलिस निरीक्षक और दो कांस्टेबलों के खिलाफ आंतरिक जांच की जा चुकी है और आवश्यक प्रशासनिक कार्रवाई की गई है। राज्य का तर्क था कि दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जा चुकी है, इसलिए मामला यहीं समाप्त होना चाहिए।

जस्टिस उर्मिला जोशी-फाल्के और जस्टिस निवेदिता मेहता की बेंच ने इस बात पर जोर दिया कि पुलिस को अपने आदर्श वाक्य “सद्रक्षणाय खलनिग्रहणाय” (सज्जनों की रक्षा और दुष्टों का दमन) का सम्मान करना चाहिए। बेंच ने टिप्पणी की कि पुलिस की इस तरह की बदसलूकी “निजी व्यक्तियों से जुड़ी घटनाओं की तुलना में हमारी आपराधिक न्याय प्रणाली में विश्वास को कहीं अधिक कम कर देती है।”

कोर्ट ने कहा कि कानून का प्रशासन करने वालों का कर्तव्य न केवल आरोपी और पीड़ित के प्रति है, बल्कि राज्य और समाज के प्रति भी है। मुआवजे के मुद्दे पर जजों ने कहा:

“जहाँ मौलिक अधिकार का उल्लंघन होता है, वहां कोर्ट केवल यह घोषणा करके नहीं रुक सकता कि कार्रवाई की गई है। कोर्ट को आगे बढ़ना चाहिए और किए गए गलत कार्य के लिए दंडात्मक राहत (मुआवजा) देनी चाहिए।”

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बेंच ने आगे कहा कि दोनों को हथकड़ी लगाकर सार्वजनिक बस में ले जाना अपमान का एक जानबूझकर किया गया कृत्य था। कोर्ट ने कहा, “किए गए गलत कार्य को सुधारना और कानूनी चोट के लिए न्यायिक निवारण देना न्यायिक अंतरात्मा की मजबूरी है।”

हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के अधिकारों के उल्लंघन के लिए राज्य सरकार को उत्तरदायी ठहराया और आठ सप्ताह के भीतर प्रत्येक याचिकाकर्ता को 50,000 रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया। कोर्ट ने दोहराया कि इस तरह का “अपमान भारत के किसी भी नागरिक के साथ नहीं किया जा सकता।”

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