2003 के रामावतार जग्गी हत्याकांड में अमित जोगी की उम्रकैद की सजा पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक

छत्तीसगढ़ के प्रथम मुख्यमंत्री स्वर्गीय अजीत जोगी के पुत्र और जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जे) के अध्यक्ष अमित जोगी को गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी कानूनी राहत मिली है। शीर्ष अदालत की तीन न्यायाधीशों वाली पीठ ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के उस हालिया फैसले पर रोक लगा दी है, जिसमें जोगी को एनसीपी नेता रामावतार जग्गी की 2003 में हुई हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी।

सुप्रीम कोर्ट के इस अंतरिम आदेश के बाद, हाईकोर्ट द्वारा जोगी को जेल अधिकारियों के समक्ष आत्मसमर्पण करने के निर्देश पर भी फिलहाल रोक लग गई है। अब इस मामले पर शीर्ष अदालत में आगे विचार किया जाएगा।

यह मामला 4 जून 2003 का है, जब छत्तीसगढ़ के तत्कालीन मुख्यमंत्री अजीत जोगी के कार्यकाल के दौरान एनसीपी नेता रामावतार जग्गी की हत्या कर दी गई थी। इस मामले की जांच पहले राज्य पुलिस ने की थी, लेकिन बाद में इसे केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को सौंप दिया गया।

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सीबीआई ने अमित जोगी समेत 28 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी। 31 मई 2007 को एक निचली अदालत ने अपना फैसला सुनाते हुए 28 आरोपियों को दोषी ठहराया था, लेकिन अमित जोगी को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया था।

पिछले महीने इस मामले में तब नया मोड़ आया जब सीबीआई की अपील पर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने मामले की कार्यवाही फिर से शुरू की। हाईकोर्ट ने जोगी के बरी होने के फैसले को पलटते हुए उन्हें दोषी करार दिया और उम्रकैद की सजा सुनाई।

अमित जोगी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक तन्खा और कपिल सिब्बल ने अदालत में पैरवी की। उन्होंने हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए सजा और दोषसिद्धि दोनों पर रोक लगाने की मांग की।

दूसरी ओर, पीड़ित परिवार के सदस्य की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा और गोपाल शंकरनारायणन ने इस याचिका का कड़ा विरोध किया। हालांकि, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने दलीलों पर गौर करने के बाद सजा पर रोक लगाने का निर्णय लिया।

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हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाने के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने जोगी की याचिका पर सीबीआई को नोटिस भी जारी किया है। इस आदेश के बाद अमित जोगी तब तक हिरासत से बाहर रहेंगे जब तक शीर्ष अदालत उनकी दोषसिद्धि के खिलाफ अपील की मेरिट पर विस्तार से सुनवाई नहीं कर लेती।

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