ट्रांसजेंडर संशोधन अधिनियम 2026 की संवैधानिक वैधता को चुनौती: राजस्थान हाईकोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब

राजस्थान हाईकोर्ट ने ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2026 के प्रावधानों को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका (PIL) पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि ये नए संशोधन ट्रांसजेंडर समुदाय के मौलिक अधिकारों, गोपनीयता और आत्म-पहचान के अधिकार के खिलाफ हैं।

मंगलवार को सुनवाई के दौरान, कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा और न्यायाधीश शुभा मेहता की खंडपीठ ने केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता सचिव तथा केंद्रीय कानून सचिव को नोटिस जारी कर उनका पक्ष मांगा है। यह याचिका एनजीओ ‘नई भोर संस्था‘ द्वारा दायर की गई है, जिसमें तर्क दिया गया है कि 2026 के संशोधन ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की गरिमा और उनकी व्यक्तिगत स्वायत्तता का उल्लंघन करते हैं।

2026 का यह संशोधन विधेयक इसी साल 25 मार्च को संसद द्वारा पारित किया गया था और 30 मार्च को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने इसे अपनी स्वीकृति दी थी। इस नए कानून ने 2019 के मूल अधिनियम में कई बड़े बदलाव किए हैं, जो विवाद की मुख्य वजह बने हैं:

  • स्व-पहचान के अधिकार का अंत: अब व्यक्ति अपनी पहचान स्वयं निर्धारित नहीं कर सकता; इसके स्थान पर अनिवार्य मेडिकल बोर्ड प्रमाणन की प्रक्रिया शुरू की गई है।
  • अनिवार्य मेडिकल बोर्ड: लिंग की पहचान के लिए मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) की अध्यक्षता वाले मेडिकल बोर्ड द्वारा शारीरिक परीक्षण को अनिवार्य बनाया गया है।
  • मजिस्ट्रेट की भूमिका: मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट मजिस्ट्रेट को सौंपी जाएगी, जिसके बाद ही पहचान प्रमाण पत्र जारी हो सकेगा।
  • पहचान का सीमित दायरा: याचिका के अनुसार, कानून ने ‘ट्रांस-मेन’, ‘ट्रांस-वुमेन’ और ‘जेंडरक्वीर’ जैसी श्रेणियों को हटाकर केवल “पारंपरिक” सामाजिक-सांस्कृतिक पहचानों पर ध्यान केंद्रित किया है।
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याचिकाकर्ताओं का कहना है कि अनिवार्य शारीरिक परीक्षण “मेडिकल गेटकीपिंग” जैसा है, जो निजता के अधिकार का सीधा उल्लंघन है। उनका तर्क है कि मेडिकल बोर्ड के माध्यम से लिंग निर्धारण की प्रक्रिया समुदाय के व्यक्तिगत अनुभवों और उनकी स्वायत्तता को नजरअंदाज करती है।

इसके अलावा, याचिका में नए अपराधों और उनके लिए तय की गई सख्त सजाओं पर भी सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि ये अपराध “अस्पष्ट” रूप से परिभाषित हैं, जिससे भविष्य में अधिकारियों द्वारा इनके दुरुपयोग की संभावना बढ़ जाती है।

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यह मामला ट्रांसजेंडर अधिकारों के संबंध में केंद्र सरकार की बदलती नीति की न्यायिक समीक्षा के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण है। 2019 के अधिनियम को जहां अधिकारों की दिशा में एक प्रगतिशील कदम माना गया था, वहीं 2026 के इन संशोधनों का समुदाय द्वारा कड़ा विरोध किया जा रहा है। अब राजस्थान हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार से इन संशोधनों की संवैधानिक वैधता पर अपना औपचारिक रुख स्पष्ट करने को कहा है।

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