देश में दवाओं और टीकों के क्लीनिकल ट्रायल की प्रक्रिया को नियंत्रित करने वाले 2024 के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को महत्वपूर्ण रुख अपनाया। कोर्ट ने एक स्वयंसेवी संस्था (NGO) को उन खामियों पर एक संयुक्त दस्तावेज (कंपोजिट डॉक्यूमेंट) पेश करने का निर्देश दिया है, जो कथित तौर पर मरीजों की सुरक्षा और मुआवजे की प्रक्रिया को कमजोर करती हैं। अदालत इस बात की पड़ताल कर रही है कि क्या मौजूदा नियम बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों के शोषण से भारतीय नागरिकों की रक्षा करने में सक्षम हैं।
जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ एनजीओ ‘स्वास्थ्य अधिकार मंच’ द्वारा 2012 में दायर एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में आरोप लगाया गया है कि विदेशी दवा कंपनियां भारत के गरीब नागरिकों को बिना उचित सुरक्षा मानकों के ‘गिनी पिग’ की तरह इस्तेमाल कर रही हैं।
मामले की जड़ में ‘न्यू ड्रग्स एंड क्लीनिकल ट्रायल्स (संशोधन) नियम’ हैं, जिन्हें केंद्र सरकार ने 2024 में अधिसूचित किया था। सरकार का दावा है कि ये नियम वैश्विक मानकों के अनुरूप हैं और इससे दवाओं की मंजूरी की प्रक्रिया तेज होगी। हालांकि, याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि नियमों में अभी भी कई ऐसे ‘लूपहोल्स’ हैं जो मरीजों के जीवन को खतरे में डालते हैं।
एनजीओ की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता संजय पारिख ने स्पष्ट किया कि वे नियमों को पूरी तरह से चुनौती नहीं दे रहे हैं, बल्कि उन कमियों की ओर ध्यान दिला रहे हैं जिनके कारण मरीजों के नामांकन (एनरोलमेंट) में पारदर्शिता की कमी है। उन्होंने अदालत को बताया कि ट्रायल के दौरान अब तक लगभग 8,000 मौतें हो चुकी हैं, और पीड़ितों के आश्रितों को आज भी उचित मुआवजे का इंतजार है।
केंद्र सरकार ने दलील दी कि 2019 में बने और 2024 में अधिसूचित नियमों के बाद अब यह याचिका निष्प्रभावी हो गई है। सरकार के अनुसार, नए नियमों का उद्देश्य है:
- टीकों और नई दवाओं के परीक्षण की प्रक्रिया को सरल बनाना।
- मरीजों की सुरक्षा से जुड़े प्रोटोकॉल को मजबूत करना।
- अंतरराष्ट्रीय नियामक मानकों का पालन सुनिश्चित करना।
सरकार ने यह भी कहा कि इन नियमों ने 2013 के उन पुराने प्रावधानों की जगह ली है, जिन्हें अदालत ने पहले अपर्याप्त माना था।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने जोर देकर कहा कि भारत में होने वाले क्लीनिकल ट्रायल का प्राथमिक उद्देश्य देश के नागरिकों का स्वास्थ्य लाभ होना चाहिए। पीठ ने दोहराया कि विकास के नाम पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों को गरीब देशों के नागरिकों का शोषण करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
अदालत ने अब याचिकाकर्ताओं से अब तक उठाए गए कदमों और 2024 के नियमों में मौजूद तकनीकी खामियों पर एक विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। मामले की अगली सुनवाई 27 अप्रैल को होगी।

