हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने जमीन के मालिकाना हक और कब्जे से जुड़ी एक रेगुलर सेकंड अपील (Regular Second Appeal) को खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट ने दो अधीनस्थ अदालतों द्वारा दिए गए एक जैसे (समवर्ती) फैसलों की पुष्टि करते हुए स्पष्ट किया कि अपीलकर्ता सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 100 के तहत ‘कानून का कोई भी सारवान प्रश्न’ (Substantial Question of Law) पेश करने में विफल रहा है। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि सेकंड अपील के स्तर पर तथ्यों से जुड़े विवादों का पुन: विश्लेषण नहीं किया जा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद बिलासपुर के बामटा गांव में 0-3 बीघा जमीन के मालिकाना हक और स्थायी निषेधाज्ञा को लेकर शुरू हुआ था। अपीलकर्ता बिशम लाल गर्ग का दावा था कि उन्होंने 16 नवंबर 1993 को एक सेल डीड के माध्यम से यह भूमि खरीदी थी और तब से वही इसके मालिक और काबिज हैं।
अपीलकर्ता ने आरोप लगाया कि प्रतिवादी संख्या 1 (हरदेई) ने राजस्व अधिकारियों के साथ मिलीभगत करके जुलाई 1998 में उनकी जमीन से 0-1 बीघा हिस्सा काटकर अपने नाम पर म्यूटेशन (संख्या 287) दर्ज करवा लिया। बाद में हरदेई ने यह जमीन जनवरी 2001 में प्रतिवादी संख्या 2 को बेच दी। अपीलकर्ता ने इस म्यूटेशन और सेल डीड को शून्य घोषित करने और वैकल्पिक रूप से जमीन का कब्जा वापस दिलाने की मांग करते हुए मुकदमा दायर किया था।
सिविल जज (सीनियर डिवीजन), बिलासपुर ने 6 दिसंबर 2007 को इस मुकदमे को खारिज कर दिया था। इसके बाद जिला जज, बिलासपुर ने भी 24 दिसंबर 2024 को इस फैसले पर अपनी मुहर लगा दी। इन दोनों फैसलों को चुनौती देते हुए अपीलकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता के वकील, श्री परेश शर्मा ने तर्क दिया कि अधीनस्थ अदालतों के फैसले त्रुटिपूर्ण और तर्कहीन हैं। उन्होंने दलील दी कि अदालतों ने राजस्व रिकॉर्ड में किए गए अवैध बदलावों और अपीलकर्ता की जमीन को मनमाने ढंग से कम किए जाने के विवाद को ठीक से नहीं समझा।
वहीं, प्रतिवादियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्री संजीव कुठियाला ने अधीनस्थ अदालतों के फैसलों का बचाव किया। उन्होंने कहा कि ट्रायल कोर्ट और फर्स्ट अपीलेट कोर्ट (प्रथम अपीलीय अदालत) दोनों ने सबूतों का सही मूल्यांकन किया है। उन्होंने तर्क दिया कि चूंकि दो अदालतों के निष्कर्ष एक जैसे हैं, इसलिए हाईकोर्ट को सेकंड अपील में दखल नहीं देना चाहिए।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
जस्टिस रोमेश वर्मा की अध्यक्षता वाली हाईकोर्ट की पीठ ने पाया कि अपीलकर्ता का पूरा मामला इस दावे पर टिका था कि म्यूटेशन नंबर 287 के जरिए उसकी 1 बिस्वा जमीन कम कर दी गई। हालांकि, कोर्ट ने नोट किया कि अपीलकर्ता यह साबित करने के लिए कोई ‘ठोस और पुख्ता सबूत’ पेश नहीं कर सका कि जो जमीन प्रतिवादी संख्या 2 को बेची गई, वह वास्तव में उसी के खसरा नंबरों का हिस्सा थी।
जस्टिस वर्मा ने अपनी टिप्पणी में कहा:
“वादी यह स्थापित करने में असमर्थ रहा है कि राजस्व प्रविष्टियों में सुधार मुकदमे की जमीन से 1 बिस्वा काटकर किया गया था और इसे अवैध रूप से प्रतिवादी संख्या 1 के स्वामित्व और कब्जे में दिखाया गया था।”
हाईकोर्ट ने उल्लेख किया कि जहां अपीलकर्ता ने केवल मौखिक गवाही पर भरोसा किया, वहीं प्रतिवादियों ने दस्तावेजी सबूत (Ext. D-1 से D-10) पेश किए जो उनके मालिकाना हक और कब्जे की पुष्टि करते हैं।
सीपीसी की धारा 100 के दायरे पर चर्चा करते हुए कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के नजीर मोहम्मद बनाम जे. कमला और हीरो विनोट बनाम शेषम्मल जैसे महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला दिया। कोर्ट ने दोहराया कि सेकंड अपील केवल तभी सुनी जा सकती है जब उसमें कानून का कोई सारवान प्रश्न शामिल हो।
हाईकोर्ट ने अवलोकन किया:
“सेकंड अपील के चरण में तथ्यों को फिर से उठाना या हाईकोर्ट से सबूतों का पुन: विश्लेषण करने के लिए कहना संभव नहीं है… तथ्यों का शुद्ध निष्कर्ष सेकंड अपील में चुनौती देने योग्य नहीं है, भले ही सबूतों का मूल्यांकन त्रुटिपूर्ण हो या तथ्यों का निष्कर्ष गलत हो।”
कोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने अंततः निष्कर्ष निकाला कि अपीलकर्ता द्वारा उठाए गए सभी बिंदु पूरी तरह से तथ्यों पर आधारित थे। कोर्ट ने अधीनस्थ अदालतों के फैसलों में कोई भी विकृति (perversity) न पाते हुए अपील को मेरिट के आधार पर खारिज कर दिया।
मामले का विवरण
केस का शीर्षक: बिशम लाल गर्ग बनाम हरदेई एवं अन्य
केस संख्या: RSA संख्या 226/2025
पीठ: जस्टिस रोमेश वर्मा
दिनांक: 20 अप्रैल 2026

