उन्नाव मामला: कुलदीप सेंगर को फांसी दिलाने की याचिका खारिज, दिल्ली हाईकोर्ट ने 1,945 दिनों की देरी को माना ‘घोर लापरवाही’

दिल्ली हाईकोर्ट ने सोमवार को उन्नाव बलात्कार पीड़िता की उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें उसने अपने पिता की कस्टोडियल डेथ (हिरासत में मौत) के मामले में पूर्व भाजपा विधायक कुलदीप सेंगर और अन्य दोषियों के लिए मौत की सजा की मांग की थी। हाईकोर्ट ने अपील दायर करने में हुई 1,945 दिनों की भारी देरी को माफ करने से इनकार करते हुए इसे ‘जानबूझकर की गई निष्क्रियता और लापरवाही’ का मामला बताया।

जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर डुडेजा की बेंच ने कहा कि पीड़िता ट्रायल कोर्ट के 2020 के फैसले के खिलाफ अपील करने में हुई देरी का कोई “ठोस कारण” बताने में विफल रही है। पीड़िता ने मांग की थी कि कुलदीप सेंगर, उसके भाई जयदीप सेंगर और अन्य दोषियों की 10 साल की सजा को बढ़ाकर मृत्युदंड में बदला जाए और उनकी दोषसिद्धि को ‘गैर-इरादतन हत्या’ से बदलकर ‘हत्या’ की श्रेणी में लाया जाए।

अदालत ने पाया कि पीड़िता अन्य संबंधित कानूनी कार्यवाहियों में सक्रिय रूप से भाग ले रही थी और उसके पास वकील की कानूनी सलाह भी उपलब्ध थी। बेंच ने टिप्पणी की कि पीड़िता ने “निर्धारित समय सीमा के भीतर अपील के वैधानिक उपाय का लाभ न उठाने का सचेत निर्णय लिया।”

देरी के लिए दिए गए तर्कों—जैसे वित्तीय तंगी, रहने की समस्या, शारीरिक कमजोरी और धमकियों—को अदालत ने साक्ष्यों के अभाव में अपर्याप्त माना। बेंच ने कहा, “देरी को माफ करने के आवेदन पर विचार करते समय ये आधार भरोसा पैदा नहीं करते। ये दावे अस्पष्ट हैं, किसी दस्तावेजी प्रमाण द्वारा समर्थित नहीं हैं और यह भी स्पष्ट नहीं करते कि ऐसी परिस्थितियां कब तक बनी रहीं।”

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इतने लंबे समय बाद अपील स्वीकार करना अभियुक्तों के अधिकारों के खिलाफ होगा, क्योंकि उन्हें लंबे समय तक कानूनी अनिश्चितता और कठोर दंड की संभावना का सामना करना पड़ेगा।

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यह मामला 9 अप्रैल 2018 को पीड़िता के पिता की हिरासत में हुई मौत से जुड़ा है। उन्हें शस्त्र अधिनियम (आर्म्स एक्ट) के तहत गिरफ्तार किया गया था और पुलिस बर्बरता के कारण हिरासत में उनकी मृत्यु हो गई थी। आरोप था कि यह गिरफ्तारी सेंगर के प्रभाव में की गई थी।

13 मार्च 2020 को ट्रायल कोर्ट ने कुलदीप सेंगर और उसके भाई जयदीप सेंगर को गैर-इरादतन हत्या (IPC की धारा 304) के लिए 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। ट्रायल कोर्ट ने तब कहा था कि परिवार के एकमात्र कमाने वाले की हत्या के लिए “कोई नरमी” नहीं दिखाई जा सकती, लेकिन चूंकि हत्या का स्पष्ट ‘इरादा’ साबित नहीं हुआ था, इसलिए उन्हें हत्या (धारा 302) का दोषी नहीं माना गया था।

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सुनवाई के दौरान पीड़िता के वकील महमूद प्राचा ने तर्क दिया कि पीड़िता अत्यंत प्रतिकूल परिस्थितियों में रह रही थी और यह किसी “चमत्कार” से कम नहीं है कि वह अन्य मामलों की पैरवी कर पाई।

वहीं, जयदीप सेंगर की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रमोद कुमार दुबे और कुलदीप सेंगर की ओर से अधिवक्ता कन्हैया सिंघल ने दलील दी कि यह मामला जानबूझकर की गई निष्क्रियता का उदाहरण है और 5 साल की देरी को माफ करने का कोई कानूनी आधार नहीं है। सीबीआई ने कोर्ट को बताया कि उसने ट्रायल कोर्ट के 2020 के फैसले को स्वीकार कर लिया है और इस अपील पर निर्णय लेना अदालत के विवेक पर छोड़ दिया है।

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उल्लेखनीय है कि कुलदीप सेंगर 2017 के बलात्कार मामले में पहले से ही उम्रकैद की सजा काट रहा है।

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