आर्बिट्रल अवार्ड के खिलाफ कानूनी उत्तराधिकारी के पास आर्टिकल 227 नहीं, बल्कि आर्बिट्रेशन एक्ट की धारा 34 के तहत है उपचार: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि यदि कोई कानूनी उत्तराधिकारी (Legal Representative) किसी आर्बिट्रल अवार्ड (पंचाट निर्णय) से असंतुष्ट है, तो उसके लिए उचित उपचार आर्बिट्रेशन एंड कॉन्सिलिएशन एक्ट, 1996 की धारा 34 के तहत याचिका दायर करना है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविधान के आर्टिकल 227 या नागरिक प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 115 के तहत रिवीजन पिटीशन के माध्यम से इसे चुनौती नहीं दी जा सकती।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने मद्रास हाईकोर्ट के उस फैसले की पुष्टि की, जिसमें हाईकोर्ट ने वैधानिक उपचार की उपलब्धता के आधार पर सिविल रिवीजन पिटीशन को खारिज कर दिया था।

मामले की पृष्ठभूमि

विवाद की शुरुआत 20 अप्रैल, 2007 को श्री अप्पू जॉन और प्रतिवादी संख्या 1, एस. मुकनचंद बोथरा के बीच संपत्ति की बिक्री के लिए हुए एक ‘डीड ऑफ एग्रीमेंट फॉर सेल’ से हुई थी। 28 जुलाई, 2007 को अप्पू जॉन के निधन के बाद, प्रतिवादी संख्या 1 ने अप्पू जॉन के कानूनी प्रतिनिधि के रूप में प्रतिवादी संख्या 2 (ए. फिलिप) के खिलाफ आर्बिट्रेशन की कार्यवाही शुरू की।

21 फरवरी, 2011 को आर्बिट्रल अवार्ड पारित किया गया, जिसमें प्रतिवादी संख्या 2 को सेल डीड निष्पादित करने का निर्देश दिया गया। अपीलकर्ता, वी.के. जॉन का दावा है कि उन्हें इस कार्यवाही की जानकारी अगस्त 2012 में हुई। उन्होंने तर्क दिया कि ए. फिलिप को गलत तरीके से कानूनी उत्तराधिकारी दिखाया गया है, जबकि संपत्ति में उनका (अपीलकर्ता का) 1/3 हिस्सा है, जिसके लिए उन्हें एक विभाजन मुकदमे (Partition Suit) में डिक्री भी मिल चुकी है।

अपीलकर्ता ने इस अवार्ड को मद्रास हाईकोर्ट में आर्टिकल 227 के तहत चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने 3 फरवरी, 2023 को इसे खारिज करते हुए कहा था कि संपत्ति के उत्तराधिकारी के तौर पर उनके पास आर्बिट्रेशन एक्ट के तहत उपचार मौजूद है।

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पक्षों के तर्क

अपीलकर्ता के वकील ने दलील दी कि चूंकि वे मूल आर्बिट्रेशन कार्यवाही में पक्षकार नहीं थे, इसलिए वे धारा 34 का सहारा नहीं ले सकते। उन्होंने तर्क दिया कि आर्टिकल 227 के तहत रिवीजन ही उनके पास एकमात्र विकल्प था, क्योंकि आर्बिट्रेटर ने वास्तविक उत्तराधिकारियों की पहचान के लिए कोई जांच नहीं की थी।

वहीं, प्रतिवादी संख्या 3 ने भावेन कंस्ट्रक्शन बनाम एग्जीक्यूटिव इंजीनियर, सरदार सरोवर नर्मदा निगम लिमिटेड (2022) और रवि प्रकाश गोयल बनाम चंद्र प्रकाश गोयल (2008) के फैसलों का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि चूंकि अपीलकर्ता खुद को एकमात्र जीवित कानूनी उत्तराधिकारी बता रहे हैं, इसलिए उन्हें धारा 34 के तहत ही जाना चाहिए।

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कोर्ट द्वारा नियुक्त एमिची क्यूरी (Amici Curiae) ने कहा कि हालांकि पक्षकारों के बीच आर्बिट्रेशन एग्रीमेंट की बाध्यता पर सवाल हो सकते हैं, लेकिन मुख्य कानूनी मुद्दा सही फोरम के चुनाव का है।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने जोर दिया कि आर्बिट्रेशन एक्ट अपने आप में एक ‘पूर्ण कोड’ (Complete Code) है। धारा 34 का विश्लेषण करते हुए बेंच ने कहा कि इसमें ‘केवल’ (Only) शब्द का प्रयोग यह दर्शाता है कि विधायी मंशा न्यायिक हस्तक्षेप को अधिनियम द्वारा स्थापित प्रक्रियाओं तक ही सीमित रखने की है।

कोर्ट ने ‘पक्षकार’ (Party) शब्द की व्याख्या अधिनियम की धारा 2(1)(g) (कानूनी प्रतिनिधि की परिभाषा) और धारा 40 (जिसके अनुसार मृत्यु से आर्बिट्रेशन एग्रीमेंट समाप्त नहीं होता) के संदर्भ में की। बेंच ने कहा:

“हमारी दृष्टि में, जब अधिनियम की योजना किसी पक्षकार की मृत्यु की स्थिति में आर्बिट्रेशन की कार्यवाही की निरंतरता की ओर है, तो इसका स्वाभाविक परिणाम यह है कि मृत्यु पर कानूनी उत्तराधिकारी अधिनियम के उद्देश्यों के लिए पक्षकार के स्थान पर आ जाते हैं।”

बेंच ने आगे रवि प्रकाश गोयल मामले का संदर्भ देते हुए दोहराया:

“कानूनी प्रतिनिधि की परिभाषा इसलिए आवश्यक हुई क्योंकि ऐसे प्रतिनिधि आर्बिट्रेशन एग्रीमेंट को लागू करने के लिए हकदार और उससे बाध्य, दोनों होते हैं… जो व्यक्ति मृतक की संपत्ति का प्रतिनिधित्व करने का अधिकार रखता है, वह कानूनी प्रतिनिधि की स्थिति रखता है।”

कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि यदि कानूनी उत्तराधिकारी को धारा 34 के तहत चुनौती देने के अधिकार से वंचित किया जाता है, तो वह एक तरफ “कानून के तहत उपचारविहीन हो जाएगा और दूसरी तरफ उसे अवार्ड का पालन करने के लिए उत्तरदायी भी बना दिया जाएगा।”

कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के आदेश को सही ठहराते हुए अपील खारिज कर दी। हालांकि, कोर्ट ने अपीलकर्ता को आर्बिट्रेशन एक्ट के तहत अपने कानूनी अधिकारों का उपयोग करने की अनुमति दी है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि ऐसी कोई याचिका दायर की जाती है, तो उसकी समय सीमा (Limitation Period) इस निर्णय की तारीख (20 अप्रैल, 2026) से गिनी जाएगी।

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केस विवरण

  • केस शीर्षक: वी.के. जॉन बनाम एस. मुकनचंद बोथरा और एचयूएफ (मृत) कानूनी प्रतिनिधियों के माध्यम से एवं अन्य
  • केस संख्या: सिविल अपील संख्या _ ऑफ 2026 (@ SLP (C) No. 16162/2023)
  • बेंच: जस्टिस संजय करोल, जस्टिस विपुल एम. पंचोली
  • तारीख: 20 अप्रैल, 2026

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